National Sports Day 2023: जब हिटलर के सामने जर्मनी को हराने के बाद भी मेजर ध्यानचंद की आंखों में थे आंसू

मेजर ध्यानचंद के दौर में भारत ने ओलंपिक में हॉकी के कई स्वर्ण पदक जीते. लेकिन, 1936 के बर्लिन ओलंपिक का स्वर्ण इनमें सबसे ज्यादा खास है. 1936 में 15 अगस्त के ही दिन भारत ने तानाशाह हिटलर के सामने दद्दा ध्यानचंद की अगुवाई में जर्मनी को 8-1 से हराकर स्वर्ण पदक जीता था.
National Sports Day 2023: मेजर ध्यानचंद (Major Dhyan Chand) के जन्मदिन पर आज उत्तर प्रदेश में कई आयोजन की तैयारी है. पूरा देश राष्ट्रीय खेल दिवस (National Sports Day 2023) पर हाकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद को याद कर रहा है, जिन्होंने पूरी दुनिया में भारत का परचम लहराया. अपनों के बीच ‘दद्दा’ के नाम से लोकप्रिय ध्यानचंद ने भारतीय हाकी को नई पहचान दिलाई. भारतीय हॉकी में ध्यानचंद ने जो इतिहास लिखा है, उसे आज भी याद कर भारतीय गर्व महसूस करते हैं.
उत्तर प्रदेश के झांसी जनपद में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मंगलवार को रानी लक्ष्मीबाई पार्क में मेजर ध्यानचंद की 25 फीट ऊंची मूर्ति का अनावरण और हॉकी म्यूजियम का शुभारंभ करेंगे. मेजर ध्यानचंद की मूर्ति और हॉकी म्यूजियम पूरे देश में खिलाड़ियों को प्रेरणा देने का काम करेगी. मेजर ध्यानचंद के सम्मान में उनकी कर्मभूमि रही झांसी में डिजिटल म्यूजियम बेहद खास है. रानी लक्ष्मीबाई पार्क में आधुनिक सुविधाओं और तकनीक से लैस इस म्यूजियम में पर्यटकों को मेजर ध्यानचंद के जीवन से जुड़ी हुए तमाम पहलू देखने को मिलेंगे.
मेजर ध्यानचंद ने हॉकी में भारत को ओलंपिक खेलों में स्वर्ण पदक दिलवाया था. इस वजह से हर साल उनके जन्मदिन 29 अगस्त को राष्ट्रीय खेल दिवस (National Sports Day) के रूप में मनाया जाता है. मेजर ध्यानचंद और उनकी हॉकी से जुड़े कई किस्से आज भी खिलाड़ियों के लिए मिसाल हैं. साथ ही इनसे पता चलता है कि मेजर ध्यानचंद में देशभक्ति का कितना जज्बा था.
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मेजर ध्यानचंद के दौर में भारत ने ओलंपिक में हॉकी के कई स्वर्ण पदक जीते. लेकिन, 1936 के बर्लिन ओलंपिक का स्वर्ण इनमें सबसे ज्यादा खास है. 1936 में 15 अगस्त के ही दिन भारत ने तानाशाह हिटलर के सामने दद्दा ध्यानचंद की अगुवाई में जर्मनी को 8-1 से हराकर स्वर्ण पदक जीता था.
दरअसल ध्यानचंद भारत को एम्सटर्डम 1928 और लांस एजिल्स 1932 ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीता चुके थे. बर्लिन ओलंपिक में ध्यानचंद भारतीय हॉकी टीम के कप्तान थे. बर्लिन ओलंपिक का फाइनल 14 अगस्त को खेला जाना था. लेकिन, बारिश की वजह से फाइनल 15 अगस्त को खेला गया. फाइनल में भारत और जर्मनी की टीम आमने-सामने थी. 15 अगस्त को खेले गए फाइनल में पहले हाफ में जर्मनी 1-0 से आगे थी. ऐसे में दूसरे हाफ में भारतीय टीम पर दवाब था.
फाइनल मैच के दूसरे हाफ में मेजर ध्यानचंद ने बिना जूतों के मैदान में उतरने का फैसला किया. हॉकी के जादूगर ने दूसरे हाफ में जो कमाल किया उसने हर किसी को हैरान कर दिया. ध्यानचंद ने दूसरे हाफ में गोल की झड़ी लगा दी. इसकी बदौलत भारत मुकाबला 8-1 से जीतने में सफल रहा. मैच जब खत्म हुआ तो हिटलर ध्यानचंद से काफी प्रभावित हो गए थे.
हिटलर ने ध्यानचंद से हाथ मिलाने के बजाय सैल्यूट किया. हिटलर ने ध्यानचंद से कहा, ‘जर्मन राष्ट्र आपको अपने देश भारत और राष्ट्रवाद के लिए सैल्यूट करता है. हिटलर ने ही उन्हें हॉकी का जादूगर का टाइटल दिया था. ध्यानचंद और हिटलर के बीच काफी देर तक बात हुई. हिटलर ने ध्यानचंद को अपनी सेना में सर्वोच्च रैंक का पद और जर्मनी के लिए खेलने का ऑफर दिया, जिसे ध्यानचंद ने ठुकरा दिया था.
खास बात है कि भारत स्वर्ण पदक जरूर जीता था. लेकिन, गुलाम होने के कारण राष्ट्रीय ध्वज लहराता नहीं देख दद्दा का मन अंदर ही अंदर दु:खी था. हिटलर ने पदक विजेताओं को पार्टी दी थी, लेकिन दद्दा उसमें नहीं गए. वह खेल गांव में ही बैठ गए. उनकी आंखों में आंसू थे. जब टीम के एक साथी ने उनसे पूछा कि आज तो टीम जीती है तो फिर वह रो क्यों रहे हैं, इस पर दद्दा का जवाब था काश यहां यूनियन जैक यानी ब्रिटिश इंडिया का झंडा की जगह तिरंगा होता तो उन्हें बेहद खुशी होती.
देश के आजाद होने के बाद जब भारतीय टीम को लंदन ओलंपिक में खेलने के लिए जाना था, तब दद्दा की उम्र 43 वर्ष हो चुकी थी. हालांकि तब भी उनसे टीम में खेलने के लिए पूछा गया. लेकिन, दद्दा ने कहा कि अब युवाओं को मौका दिया जाना चाहिए. उन्होंने लंदन ओलंपिक में खेलने से इनकार कर दिया था. वहीं पूर्वी अफ्रीका ने 1948 में भारतीय टीम को अपने यहां खेलने का निमंत्रण दिया था. लेकिन, साथ में यह भी कहा था कि इस टीम में ध्यानचंद हर हाल में होने चाहिए. तब दद्दा इस दौरे पर गए और 43 की उम्र में भी उन्होंने उस दौरे में 52 गोल किए.
हॉकी के जादूगर मेजर ध्यानचंद के विश्व कप विजेता बेटे और अर्जुन अवार्डी अशोक ध्यानचंद कहते हैं कि भारतीय खेलों के इतिहास में महानतम खिलाड़ियों में मेजर ध्यानचंद का जिक्र सबसे पहले आता है, जिन्होंने एम्सटर्डम (1928), लॉस एंजीलिस (1932) और बर्लिन (1936) ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीते. माना जाता है कि घरेलू और इंटरनेशनल हॉकी में एक हजार से अधिक गोल मेजर ध्यानचंद ने दागे हैं.
अशोक ध्यानचंद वर्तमान में विश्व चैम्पियनशिप और ओलिंपिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले भालाफेंक खिलाड़ी नीरज चोपड़ा के प्रदर्शन से बेहद खुश हैं और कहते हैं कि नीरज भी उनके पिता की राह पर हैं.
नीरज चोपड़ा विश्व एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय खिलाड़ी बन गए. उन्होंने बुडापेस्ट में हुई चैम्पियनशिप में 88.17 मीटर दूर भाला फेंककर यह उपलब्धि हासिल की. इससे पहले वह टोक्यो ओलिंपिक गोल्ड, एशियाई खेल और राष्ट्रमंडल खेल (2018) स्वर्ण, चार डायमंड लीग व्यक्तिगत मीटिंग खिताब और पिछले साल डायमंड लीग चैम्पियंस ट्रॉफी जीत चुके हैं.
अशोक ध्यानचंद कहते हैं कि नीरज ने भारतीय एथलेटिक्स का कायाकल्प कर दिया. उसने एक पूरी पीढ़ी को प्रेरित किया है और भालाफेंक फाइनल में शीर्ष छह में तीन भारतीय होना गर्व की बात है. ध्यानचंद जी तो मील के पत्थर थे और आज के दौर में व्यक्तिगत खेलों में नीरज नई बुलंदियों को छू रहा है. हम चाहते हैं और भी खिलाड़ी आगे आएं और लगातार भारत का नाम रोशन करे. मुझे लगता है कि उनकी तरह भारतीय खेलों के युगपुरुष बनने की राह पर कोई है तो वह नीरज चोपड़ा है.
अशोक ने कहा कि भालाफेंक में भारत के बढ़ते दबदबे ने उन्हें भारतीय हॉकी के सुनहरे दिनों की याद दिला दी, जब भारत ने आठ बार ओलिंपिक स्वर्ण पदक जीते थे. उन्होंने कहा कि दद्दा ध्यानचंद के अलावा हमारे यहां लेज्ली क्लाउडियस (तीन ओलंपिक स्वर्ण, एक रजत), उधम सिंह (तीन ओलंपिक स्वर्ण, एक रजत), बलबीर सिंह सीनियर (तीन ओलंपिक स्वर्ण) जैसे महान हॉकी खिलाड़ी हुए जिनकी अलग ही विरासत थी. मुझे उन दिनों की याद ताजा हो गई. हॉकी की तरह भालाफेंक में भी भारत की तूती बोल रही है. भारतीय हॉकी टीम ने आखिरी बार ओलंपिक स्वर्ण मॉस्को में 1980 में जीता था. टोक्यो ओलंपिक 2021 में भारतीय पुरुष हॉकी टीम ने 41 साल का इंतजार खत्म करके कांस्य पदक हासिल किया.
मेजर ध्यानचंद की कर्मभूमि झांसी में जिस म्यूजियम का शुभारंभ किया जा रहा है, वह बेहद खास है. यहां एक मूविंग प्रोजेक्टर के जरिए मेजर ध्यानचंद के बचपन से लेकर उनके जीवन से जुड़े हर जरूरी पड़ाव को देख सकते हैं. यहां एक विशालकाय हॉकी और बॉल भी बनाई गई है. यह उसी हॉकी और बॉल की तरह है, जिससे मेजर ध्यानचंद खेला करते थे.
यहां डिजिटल स्क्रीन के माध्यम से देश के मशहूर हॉकी खिलाड़ियों के बारे में भी बताया जायेगा. यहां एक वर्चुअल हॉकी फील्ड भी बनाई गई है. इस वर्चुअल फील्ड में आप हॉकी खेल भी सकते हैं. यहां युवा खिलाड़ियों को यह जानकारी भी दी जाएगी की वह स्पोर्ट्स में अपना करियर कैसे बना सकते हैं.
यहां एक मिनी थियेटर भी बनाया गया है. इस थियेटर में मेजर ध्यानचंद के जीवन पर आधारित फिल्म दिखाई जायेगी. यहां होलोग्राम की माध्यम से आप मेजर ध्यानचंद के साथ सेल्फी भी ले सकते हैं. इसके साथ ही यहां मेजर ध्यानचंद के पुत्र अशोक ध्यानचंद लोगों को हॉकी के गुर भी सिखाएंगे. म्यूजियम के बाहर मेजर ध्यानचंद की मूर्ति भी लगाई है. यह मूर्ति दिल्ली के राष्ट्रीय स्टेडियम के बाहर लगी मूर्ति की तरह ही बनाई गई है. इसी म्यूजियम का उद्घाटन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ मेजर ध्यानचंद की जयंती पर करने जा रहे हैं.
संगम नगरी का लोकनाथ चौराहा और लोकनाथ गली कौन नहीं जानता. यहां की गलियों से देश के ऐसे दिग्गजों का नाम जुड़ा है, जिनकी पहचान राष्ट्र की सीमाओं से पार निकल गई. ऐसा ही एक नाम है हाकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद का. तब के इलाहाबाद और वर्तमान में प्रयागराज में जन्मे ध्यानचंद का बचपन लोकनाथ की गलियों में ही बीता था.
प्रयागराज में पुराने शहर लोकनाथ में रहकर मेजर ध्यानचंद ने कक्षा छह तक की पढ़ाई की थी. इसके बाद उनका परिवार झांसी चला गया. भारती भवन के पास एक किराए के घर में ध्यानचंद का परिवार रहता था. उनके पिता समेश्वर सिंह ब्रिटिश इंडियन आर्मी में सूबेदार थे. वह खुद हाकी के अच्छे खिलाड़ी थी. समेश्वर सिंह का तबादला झांसी होने के बाद पूरा परिवार झांसी चला गया. लोकनाथ में पहले कई व्यायामशाला थी और उसका असर मेजर ध्यानचंद पर भी पड़ा. वह भी कुश्ती के खेल को बहुत पंसद करते थे और खेलते खेलते व्यायामशाला में जाकर कुश्ती के दांव पेच देखा करते थे. बाद में परिवार के साथ झांसी जाने पर उनका रिश्ता हाकी के साथ जुड़ा.
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मेजर ध्यानचंद का जन्म 29 अगस्त 1905 को उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में ध्यान सिंह के रूप में हुआ था.
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वर्ष 1922 में ध्यानचंद भारतीय सेना का हिस्सा बने और एक सैनिक के रूप में देश की सेवा की.
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वर्ष 1956 में वह मेजर के पद से भारतीय सेना से सेवानिवृत हुए.
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ध्यानचंद ने हॉकी में अपना ऐसे कई करतब दिखाए जिसकी वजह से उन्हें हॉकी का जादूगर के खिताब से दिया गया.
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भारत ने 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक में ओलंपिक स्वर्ण पदक जीतने की पहली हैट्रिक हासिल की, जिसमें मेजर ध्यानचंद ने अहम भूमिका निभाई.
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1956 में ध्यानचंद को पद्म भूषण से सम्मानित किया गया.
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मेजर ध्यानचंद के निधन के बाद उनके सम्मान में भारतीय डाक विभाग ने डाक टिकेट जारी किया. साथ ही दिल्ली के राष्ट्रीय स्टेडियम का नाम बदलकर मेजर ध्यानचंद स्टेडियम किया गया.
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लेखक के बारे में
By Sanjay Singh
working in media since 2003. specialization in political stories, documentary script, feature writing.
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