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भारतीय राजनीति में दलित के घर भोजन का दांव!

Updated at : 06 Sep 2016 5:50 PM (IST)
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भारतीय राजनीति में दलित के घर भोजन का दांव!

गोरखपुर : कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आज उत्तर प्रदेश में चुनावी अभियान की शुरुआत की. वे अभी लगभग एक महीना उत्तर प्रदेश में बितायेंगे. पार्टी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर उनके लिए ‘खाट पंचायत’ जैसी योजना लेकर आये हैं. कांग्रेस पार्टी पिछले 27 सालों से प्रदेश की सत्ता से बाहर है, लेकिन इस बार […]

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गोरखपुर : कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आज उत्तर प्रदेश में चुनावी अभियान की शुरुआत की. वे अभी लगभग एक महीना उत्तर प्रदेश में बितायेंगे. पार्टी के चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर उनके लिए ‘खाट पंचायत’ जैसी योजना लेकर आये हैं. कांग्रेस पार्टी पिछले 27 सालों से प्रदेश की सत्ता से बाहर है, लेकिन इस बार वह वापसी के लिए एड़ी-चोटी एक कर रही है. हालांकि चुनावी रणनीतिकारों का मानना है कि सत्ता में कांग्रेस की वापसी संभव नहीं, हां यह संभव है कि वह हाशिये से बाहर आ जाये. उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्य है जो पूरे देश की दशा और दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाता है, इसलिए कांग्रेस यहां अपनी खोई जमीन वापस चाहती है. इसी चाहत के मद्देनजर आज कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी गोरखपुर के सहिजना गांव में एक दलित के यहां भोजन करेंगे. लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या मात्र दलित के यहां भोजन कर लेने भर से उनके वोट की गारंटी राजनीतिक दलों को मिल जाती है?

दलित के घर भोजन का सच

जब भी चुनाव नजदीक आता है, राजनीतिक नेता दलित के घर भोजन की राजनीति करने लगते हैं. राहुल गांधी आज दलित के घर भोजन करने वाले हैं, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कुछ महीनों पहले किया था. वे वाराणसी में एक दलित के घर भोजन कर आये थे, हालांकि उनका यह दांव उल्टा पड़ गया था क्योंकि इस आयोजन के कुछ ही दिनों बाद देश भर में दलित उत्पीड़न की इतनी घटनाएं हुईं कि भाजपा की भद्द पिट गयी और सरकार ‘डिफेंसिव मोड’ में आ गयी.

क्या वोट की गारंटी है दलित के घर भोजन

यह सवाल इसलिए क्योंकि बदलते सामाजिक दौर में भी दलितों को इस्तेमाल किया जा रहा है. विकास योजनाओं का लाभ उन्हें मिले या ना मिले, दलित वोट बैंक जरूर बन जाता है. जो लोग दलितों के नाम पर अपनी दुकानदारी चलाते हैं, उन्हें भी दलितों की चिंता नहीं है, जबकि वे उनके लिए कैडर वोटर हैं. उत्तर प्रदेश में दलित वोटर 20.5 प्रतिशत हैं. राजनीति के जानकारों का मामना है कि दलितों के पास विकल्प नहीं है जिसके कारण वे इस्तेमाल हो जाते हैं और दलित के घर भोजन का ‘ड्रामा हिट’ हो जाता है.

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