आसान नहीं तृणमूल सांसदों का दलबदल! सांसदों की बगावत में बाधा बनेगा कानून

Published by : Mithilesh Jha Updated At : 08 Jun 2026 6:54 AM

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तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी.

TMC Anti Defection Law Hurdles Parliament: तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल में संभावित बगावत की खबरों के बीच टीएमसी नेताओं ने साफ किया है कि दलबदल-रोधी कानून के तहत सांसदों के पास अलग गुट बनाने का कोई अधिकार नहीं है. जानिए, क्या हैं कानूनी अड़चनें.

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TMC Anti Defection Law: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में बगावत की आग अब दिल्ली तक पहुंच गयी है. एक ओर ममता बनर्जी गुट का कहना है कि दिल्ली में टीएमसी को तोड़ना आसान नहीं होगा, तो दूसरी तरफ रीतब्रत बनर्जी का दावा है कि पार्टी के कई सांसद उनके संपर्क में हैं.

टीएमसी सांसदों में भी बगावत की सुगबुगाहट

रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में बंगाल विधानसभा में हुई ऐतिहासिक टूट के बाद अब दिल्ली के गलियारों में भी टीएमसी सांसदों के एक धड़े द्वारा अलग समूह बनाने की सुगबुगाहट तेज हो गयी है. ममता गुट का कहना है कि सांसदों के लिए कानूनी तौर पर बगावत इतनी आसान नहीं होने वाली.

एक्सपर्ट बोले- गंभीर कानूनी प्रक्रिया का करना होगा सामना

तृणमूल कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व और कानूनी विशेषज्ञों ने स्पष्ट कहा है कि संसद के भीतर अलग गुट बनाने के किसी भी प्रयास को दलबदल-रोधी कानून (Anti-Defection Law) के तहत गंभीर कानूनी और प्रक्रियात्मक बाधाओं का सामना करना पड़ेगा. पार्टी के रणनीतिकार अब बागियों को घेरने के लिए पूरी तरह से वैधानिक तैयारी में जुट गये हैं.

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19 सांसदों का जादुई आंकड़ा

तृणमूल कांग्रेस के भीतर जारी अंदरूनी सूत्रों के अनुसार, बागी नेता संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) में सांसदों का समर्थन जुटाने के लिए गुप्त बैठकें कर रहे हैं. वे इस फिराक में हैं कि आवश्यक संख्याबल जुटाकर संसद में एक अलग समूह के रूप में मान्यता की मांग की जाए. लेकिन पार्टी के वरिष्ठ नेताओं ने इस योजना की हवा निकाल दी है.

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दो-तिहाई का कड़ा नियम

तृणमूल कांग्रेस के पास वर्तमान में लोकसभा के भीतर कुल 28 सदस्य हैं. दलबदल-रोधी कानून के कड़े प्रावधानों के तहत, यदि किसी गुट को अपनी सदस्यता बचाकर पार्टी से अलग होना है, तो उसे संसदीय दल के कम से कम दो-तिहाई यानी न्यूनतम 19 सांसदों का खुला समर्थन हासिल करना ही होगा.

अलग समूह बनाने का कोई प्रावधान नहीं

पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने तकनीकी पहलू स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि बागी गुट 19 सांसदों की यह संख्या जुटा भी लेता है, तो भी वह संसद में ‘स्वतः’ एक अलग संसदीय समूह के रूप में कार्य करने का अधिकार नहीं पा सकता.

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TMC Anti Defection Law: विलय ही एकमात्र रास्ता

कानून के मुताबिक, अगर दो-तिहाई सांसद पार्टी छोड़ते भी हैं, तो उनके पास अपनी सांसदी बचाने का एकमात्र विकल्प किसी अन्य स्थापित राजनैतिक दल में अपना विलय (Merge) करना ही होगा. भारतीय संविधान के तहत संसद में सीधे तौर पर एक स्वतंत्र बागी समूह बनाने की कोई कानूनी अनुमति नहीं है.

लोकसभा अध्यक्ष भी नहीं बदल सकते संसदीय दल का नेता

राजनीतिक हलकों में यह अटकलें भी बेहद तेज थीं कि असंतुष्ट सांसद सीधे लोकसभा अध्यक्ष (Speaker) से संपर्क साधकर पार्टी के वर्तमान संसदीय नेतृत्व और नेता को बदलने की मांग कर सकते हैं.

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पार्टी अध्यक्ष का फैसला सर्वोपरि

सूत्रों के अनुसार, इस स्थिति में भी लोकसभा अध्यक्ष अपने स्तर पर कोई सीधा निर्णय नहीं ले सकते. संसदीय दल के नेता की नियुक्ति और चुनाव मूल राजनीतिक पार्टी द्वारा किया जाता है. इसलिए अगर टीएमसी के सांसद ऐसा कोई कदम उठाते हैं, तो किसी भी प्रकार का फेरबदल या बदलाव करने का अंतिम और कानूनी अधिकार केवल पार्टी अध्यक्ष (ममता बनर्जी) के पास ही सुरक्षित है.

‘इंडिया’ गठबंधन की बैठक से ध्यान भटकाने की चाल

तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का मानना है कि जान-बूझकर दिल्ली में इस तरह की अटकलों को हवा दी जा रही है, ताकि सोमवार को होने वाली विपक्षी गठबंधन इंडिया (INDIA) की बेहद महत्वपूर्ण बैठक से मीडिया और जनता का ध्यान भटकाया जा सके.

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राघव चड्ढा केस और विधानसभा मॉडल : 2 परिदृश्यों पर हो रही है चर्चा

राजनीतिक गलियारों में टीएमसी के भविष्य को लेकर मुख्य रूप से दो बड़े कानूनी परिदृश्यों और उदाहरणों पर चर्चा की जा रही है.

  • पहला परिदृश्य (बंगाल विधानसभा मॉडल): यह मॉडल पश्चिम बंगाल विधानसभा में रीतब्रत बनर्जी के नेतृत्व में हुई टूट के समान है, जहां विधायकों के एक बड़े वर्ग ने पार्टी के आधिकारिक नेतृत्व से पूरी तरह विद्रोह कर दिया था.
  • दूसरा परिदृश्य (आम आदमी पार्टी मॉडल): यह मॉडल आम आदमी पार्टी (AAP) के उस मामले के समान माना जा रहा है, जब राघव चड्ढा और राज्यसभा सदस्यों के एक समूह ने दलबदल-रोधी प्रावधानों के तकनीकी नियमों का पूरी तरह पालन करते हुए पार्टी छोड़ी थी और भाजपा में अपना विलय कर लिया था.

राजनीतिक और कानूनी घेराबंदी में जुटी तृणमूल कांग्रेस

तृणमूल के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि संसद के मानसून सत्र में अभी काफी समय शेष है, इसलिए इन पूरी प्रक्रियाओं में लंबा वक्त लग सकता है, क्योंकि इनमें भारी कानूनी पेचीदगियां शामिल हैं. बहरहाल, कालीघाट और दिल्ली में बैठे टीएमसी के आला नेता संसद के भीतर ऐसी किसी भी शर्मनाक स्थिति और टूट को जन्म लेने से पहले ही कुचलने के लिए हरसंभव राजनीतिक व कानूनी घेराबंदी में जुट गये हैं.

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मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 30 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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