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World Tribal Day 2022: यूपी में पर्याप्त जनसंख्या होने पर भी प्रतिनिधित्व का इंतजार कर रहा आदिवासी समाज

Updated at : 08 Aug 2022 2:16 PM (IST)
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Tribal Communities

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भारत में आदिवासियों को हमेशा ही अधिकारों के लिए लड़ना पड़ता रहा है. यूं तो उनके लिए कई तरह की सरकारी योजनाओं को बनाया गया है मगर तरक्की की रफ्तार में वे पीछे छूट जाते हैं. साल 2022 में भारत के राष्ट्रपति के पद पर द्रौपदी मुर्मू निर्वाचित हुई हैं. अब आदिवासी समाज विकास की राह पाने की आस लगाए है.

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World Tribal Day 2022: आज विश्व आदिवासी दिवस है. हर साल 9 अगस्त को विश्व आदिवासी दिवस मनाया जाता है. आदिवासी समुदाय यानी अपनी विभिन्नताओं को समेटकर आधुनिकता की दौड़ में खुद को जिंदा रखने वाली जनसंख्या. भारत में आदिवासियों को हमेशा ही अधिकारों के लिए लड़ना पड़ता रहा है. यूं तो उनके लिए कई तरह की सरकारी योजनाओं को बनाया गया है मगर तरक्की की रफ्तार में वे पीछे छूट जाते हैं. साल 2022 में भारत देश के सर्वोच्च पद यानी राष्ट्रपति के पद पर द्रौपदी मुर्मू निर्वाचित हुई हैं. अब आदिवासी समाज खुद के लिए विकास की सुरक्षित राह पाने की आस लगाए हुए है.

यूपी में आदिवासी समाज की जनसंख्या 

जानकारी के मुताबिक, साल 2011 की जनगणना के अनुसार उत्तर प्रदेश में 11 लाख, 34 हजार, 273 आदिवासी रहते हैं. जिसमें भोतिया, बुक्सा, जन्नसारी, राजी, थारू, गोंड, धुरिया, नायक, ओझा, पाथरी,राज गोंड, खरवार, खैरवार, सहारिया, परहइया, बैगा, पंखा, अगारिया, पतारी,चेरो, भुइया और भुइन्या जैसे आदिवासी निवास करते हैं. उत्तर प्रदेश के सोनभद्र, मिर्जापुर, सिद्धार्थनगर, बस्ती, महाराजगंज, गोरखपुर, देवरिया, मऊ, आजमगढ़,जौनपुर, बलिया, गाजीपुर, वाराणसी और ललितपुर ऐसे जिले हैं जहां पर आदिवासी रहते हैं. इसके अलावा नेपाल से सटे उत्तर प्रदेश के तराई क्षेत्र लखीमपुर-खीरी, सिद्धार्थनगर, गोरखपुर और महराजगंज जिले में थारू जनजाति के लोग भी रहते हैं. मगर इन आदिवासियों का दर्द समय-समय पर यही निकलता है कि वे विकास की राह से खुद को वंचित पाते हैं.

उपेक्षित महसूस कर रहे

2011 की जनगणना के अनुसार प्रदेश में करीब साढ़े ग्यारह लाख आदिवासी आबादी है. जिसमें गोंड, थारू, सहरिया खैरवार खरवार बैगा समुदाय मुख्य रूप से पाए जाते हैं. आदिवासी समुदाय का फैलाव प्रदेश के 16 जिलों में है, लेकिन संख्या में कम होने के कारण चुनाव में इनकी कोई पूछ नहीं है. विधानसभा के चुनावों में हर राजनीतिक दल जाति विशेष को लेकर रणनीतियां बना रहे हैं ऐसे में आदिवासी समाज से आने वाले लोग अपने को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं.

‘…तब तक कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हो सकता’

आदिवासी समाज के लिए लंबे समय से कार्य कर रहे ग्रामीण पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता सौरभ शुक्ला बताते हैं कि आदिवासी समाज हर बार चुनावी मौसम में यह आस लगाए रहता है कि उसे प्रतिनिधित्व मिलेगा. उनके लिए कुछ विशेष योजनाओं की घोषणा की जाएगी मगर वे हमेशा ही खुद को छला हुआ महसूस करते हैं. वे यूपी में इतनी बड़ी संख्या में होने के बाद भी समाज में पिछड़ा मानते हैं. इसके पीछे वे कारण बताते हैं कि आदिवासी समाज को आज भी प्रतिनिधित्व करने के लिए कोई बड़ा और प्रभावी चेहरा नहीं मिल सका है. जब तक कोई उनकी बात को मजबूती से नहीं उठाएगा तब तक कोई बड़ा परिवर्तन नहीं हो सकता है.

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