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मजदूर दिवस विशेष: गिग वर्कर्स अर्थव्यवस्था में निभा रहे अहम भूमिका, लेकिन नहीं मिलती उचित मजदूरी

Updated at : 30 Apr 2024 10:25 PM (IST)
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अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते गिग वर्कर्स कमेटी के पदाधिकारी

अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन करते गिग वर्कर्स कमेटी के पदाधिकारी

झारखंड की राजधानी रांची में करीब 20 से 25 हजार गिग वर्कर्स हैं. ये अर्थव्यवस्था में अहम भूमिका निभा रहे हैं, इसके बावजूद इन्हें उचित मजदूरी नहीं मिलती है.

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रांची, बिपिन सिंह: कोरोना महामारी के बाद सर्विस सेक्टर और लॉजिस्टिक्स सेगमेंट में डोर स्टेप डिलिवरी की मांग बढ़ी है. इस कारण गिग वर्कर की भी मांग बढ़ी है. इससे बड़े पैमाने पर डिजिटल युग में रोजगार प्लेटफॉर्म और इससे संबंधित गतिविधियों में तेजी इजाफा हुआ है. इसमें सीमित समय के लिए कर्मियों के साथ एक अस्थायी अनुबंध होता है, जिसकी शर्तें बहुत सीमित होती हैं. राजधानी रांची में करीब 20 से 25 हजार स्वतंत्र गिग वर्कर्स हैं. अर्थव्यवस्था में ये अहम भूमिका निभा रहे हैं.

सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती
हाल के दिनों में जोमैटो, स्विगी, उबर, ओला, अर्बन कंपनी, ब्लिंकिट, बिग बास्केट, दवा, भोजन और किराने का सामान वितरण, मरम्मत आदि का काम करते हैं, लेकिन संगठित क्षेत्र में काम करने के बावजूद इन्हें सामाजिक सुरक्षा नहीं मिलती है. इन्हें न तो शिफ्ट चुनने की आजादी है और न ही कोई छुट्टी मिलती है. सस्ते मजदूर की असीमित आपूर्ति ने ऐप आधारित प्लेटफॉर्म को एक तरफ तो मुनाफे की दौड़ में आगे लाकर खड़ा कर दिया. वहीं, दूसरी ओर यह प्लेटफॉर्म कामगारों के शोषण का नया अड्डा साबित हुआ है. हालांकि, शोषण के खिलाफ श्रमिक संगठन आवाज उठाने लगे हैं.

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अगले पांच साल में 2.35 करोड़ गिग देश में होंगे
विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान में भारत में करीब 0.8 करोड़ लोग गिग वर्कर के रूप में काम करते हैं और नीति आयोग की जून 2022 की रिपोर्ट इंडिया बूमिंग जिज और प्लेटफॉर्म इकोनॉमी में कहा गया है कि 2029-30 तक 2.35 करोड़ गिग वर्कर देश में होंगे. झारखंड में 12 लाख ऑनलाइन डिलिवरी वर्कर उत्पाद वर्कर और सर्विस वर्कर की श्रेणी में बंट कर कार्य कर रहे हैं.

आवश्यक योग्यता
दोपहिया वाहन चलाना, स्मार्ट फोन चलाने की दक्षता, अंग्रेजी की बुनियादी समझ एवं सेवा उद्योगों के लिए आवश्यक अन्य कौशल.

गिग श्रमिकों की मुख्य समस्या
डिलिवरी कर्मियों से बिना किसी सूचना-परामर्श के आइडी का निलंबन, न्यूनतम वेतन न होना, वेतन संरचना में कोई पारदर्शिता नहीं, वेतन में उतार-चढ़ाव, श्रमिकों के लिए कोई बुनियादी सुविधाएं नहीं, दैनिक काम की कोई गारंटी नहीं होने से दैनिक वेतन की भी कोई गारंटी नहीं है. कभी-कभी कर्मचारी पूरा दिन ऑर्डर के इंतजार में बिता देता हैं, लेकिन ऑर्डर नहीं मिलता है. स्वास्थ्य बीमा व सामाजिक सुरक्षा नहीं भी नहीं है. कंपनी की ओर से मोबाइल के जरिये हर गतिविधि पर नजर रखी जाती है. कंपनी का दावा है कि वह बारिश के घंटों के दौरान अतिरिक्त वेतन प्रदान करती है, लेकिन उनके पास मौसम निर्धारित करने के लिए कोई तंत्र नहीं है, जब तक कि कर्मचारी द्वारा स्वयं सत्यापित न किया जाये. वहीं, न्यूनतम फ्लोटिंग कैश के अभाव में कर्मचारी को आइडी निलंबन का सामना करना पड़ सकता है. दोपहिया, तीनपहिया व चारपहिया वाहन के लिए एग्रीगेटर कंपनी द्वारा किराये का 15-25% प्लेटफॉर्म शुल्क के रूप में लिया जाता है. गिग वर्कर बहुत कम मजदूरी, काम के अमानवीय घंटे, असुरक्षित स्थिति, सामाजिक सुरक्षा के अभाव में काम करने को मजबूर हैं.

गिग कामगारों ने यूनियन बनाने का लिया निर्णय
सितंबर 2022 में गिग कामगारों के एक समूह ने अपना यूनियन बनाने का निर्णय लिया और भारतीय ट्रेड यूनियन केंद्र (सीटू) से संबद्ध अखिल भारतीय गिग कामगार संघ की झारखंड इकाई के अंतर्गत संगठित हुए. इस इकाई के पहले जनरल बॉडी बैठक में पदाधिकारी चुने गये एवं राज्य स्तरीय कमेटी का गठन किया गया.

झारखंड में कामगारों का आंदोलन
26 अक्टूबर 2022 को ऑल इंडिया गिग वर्कर्स यूनियन झारखंड के हस्तक्षेप पर जोमैटो के राष्ट्रीय और राज्य प्रबंधन को रांची जिला से संबंधित 10 सूत्री मांग पत्र और औद्योगिक विवाद अधिनियम 1947 के तहत हड़ताल का नोटिस सौंपा गया. इसकी प्रतिलिपि श्रम विभाग को भी दी गयी. इसके आलोक में डीएलसी, रांची की ओर से कंपनी और यूनियन को त्रिपक्षीय वार्ता के लिए 14 नवंबर को बुलाया गया था. यूनियन बनने से पहले भी गिग कामगार स्वतंत्र रूप से हड़ताल करते रहे हैं. सीटू राज्य महासचिव बिश्वजीत देब के नेतृत्व में तीन दिवसीय हड़ताल का समापन 6 दिसंबर 2022 को राजभवन मार्च के साथ किया गया था. इसके बाद एसडीएम के माध्यम से राज्य सरकार को ज्ञापन सौंपा गया था.

अंतिम चरण की त्रिपक्षीय वार्ता
ऑल इंडिया गिग वर्कर्स यूनियन और जोमैटो प्रबंधन के बीच श्रम विभाग में चल रही त्रिपक्षीय वार्ता का तीसरा चरण डोरंडा स्थित श्रम भवन में 30 जनवरी को हुआ. श्रम विभाग ने मामले को सुनवाई के लिए रेफर करने का फैसला किया. वार्ता की पूरी प्रक्रिया में कंपनी की पब्लिक पॉलिसी प्रमुख जसकिरन बेदी एवं स्थानीय प्रबंधन ने हिस्सा लिया था. यूनियन की तरफ से वार्ता में महासचिव प्रतीक मिश्रा, अध्यक्ष रोहित यादव और सीटू राज्य कमेटी सदस्य सुब्रतो विश्वास शामिल हुए थे.

परामर्शदातृ परिषद का गठन
झारखंड सरकार के श्रम विभाग ने गिग वकर्स के लिए न्यूनतम मजदूरी का दायरा तय करने के लिए परामर्शदातृ परिषद का गठन किया है. इसमें श्रम आयुक्त संजीव कुमार मिश्रा, न्यूनतम मजदूरी के निदेशक राजेश प्रसाद, नियोक्ता पक्ष से चेंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष किशोर मंत्री और यूनियन के प्रतिनिधि प्रतीक मिश्रा एवं सुब्रत विश्वास को शामिल किया गया है. कमेटी द्वारा वर्किंग कंडीशन के हिसाब से न्यूनतम मजदूरी की राशि तय की जायेगी.

क्या कहते हैं प्रतीक मिश्रा
ऑल इंडिया गिग वर्कर्स यूनियन झारखंड सह जिला मंत्री सीटू के महासचिव प्रतीक मिश्रा कहते हैं कि गिग वर्कर और ऐप आधारित कंपनियों को विनियमित करने के लिए कोई निर्धारित प्रक्रिया राज्य और केंद्र स्तर पर अब तक नहीं बनी है. इस तरह की कंपनियों का कहना है कि उसका कर्मचारी के साथ मालिक-श्रमिक संबंध नहीं है. ये बस एक ऐप आधारित कॉन्ट्रैक्ट है. यूनियन की ओर से हर बार इसका विरोध जताया गया है. झारखंड में श्रम विभाग ने संज्ञान लेते हुए गिग वर्कर्स को कानूनी एवं सामाजिक सुरक्षा देने की ओर कदम बढ़ाया है.

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