40 साल बाद अपनों से मिले बिछड़े बुजुर्ग, आंखों में छलक पड़े खुशी के आंसू

Updated at : 06 Apr 2026 6:05 PM (IST)
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Novamundi News

नोवामुंडी में अपने परिजनों के साथ मदन साहू (बाएं से तीसरा). फोटो: प्रभात खबर

Novamundi News: झारखंड के नोवामुंडी में 40 साल बाद एक बुजुर्ग को उनके परिवार से मिलाया गया. डालसा चाईबासा की पहल और विभिन्न संस्थाओं के सहयोग से यह भावुक मिलन संभव हुआ. इस घटना ने मानवता, समन्वय और प्रयास की मिसाल पेश करते हुए समाज को एक प्रेरणादायक संदेश दिया है. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.

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नोवामुंडी से सुबोध मिश्रा की रिपोर्ट

Novamundi News: झारखंड के पश्चिम सिंहभूम जिले के नोवामुंडी से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जिसने हर किसी के दिल को छू लिया. 40 साल पहले अपने परिवार से बिछड़े बुजुर्ग मदन साहू आखिरकार अपने परिजनों से मिल गए. यह मिलन इतना भावुक था कि परिवार के सदस्यों की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े. यह घटना न सिर्फ एक परिवार के लिए सुखद पल बनी, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा का उदाहरण भी बन गई.

प्रभात खबर की रिपोर्ट से शुरू हुई खोज

इस पूरे मामले की शुरुआत नोवामुंडी थाना क्षेत्र में प्रकाशित एक खबर से हुई. खबर सामने आने के बाद जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डालसा) चाईबासा ने इस पर संज्ञान लिया. प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश सह डालसा अध्यक्ष मौहम्मद शाकिर के मार्गदर्शन और सचिव रवि चौधरी के नेतृत्व में पैरालीगल वालंटियर्स की टीम गठित की गई, जिसने बुजुर्ग की पहचान और उनके परिवार की तलाश का जिम्मा उठाया.

कड़ी मेहनत के बाद मिला परिवार का सुराग

पैरालीगल वालंटियर्स की टीम ने लगातार प्रयास और विभिन्न एजेंसियों के समन्वय से बुजुर्ग मदन साहू के परिजनों का पता लगाया. यह काम आसान नहीं था, क्योंकि चार दशक का लंबा समय बीत चुका था और संपर्क के सभी पुराने सूत्र टूट चुके थे. लेकिन टीम की लगन और समर्पण के चलते आखिरकार परिवार तक पहुंच संभव हो सकी.

भावुक पल, जब आमने-सामने आए अपने

जब मदन साहू अपने परिवार से मिले, तो वह पल बेहद भावुक था. उनके बेटे कुनू साहू ने कहा, “हमने कभी सोचा भी नहीं था कि 40 साल बाद अपने पिता को फिर से देख पाएंगे. डालसा की इस पहल ने हमारी जिंदगी में नई खुशी भर दी है.” परिवार के अन्य सदस्य भी इस मिलन से बेहद भावुक नजर आए और पूरे घर में खुशी का माहौल बन गया.

कई संस्थाओं ने निभाई अहम भूमिका

इस सफलता के पीछे कई संस्थाओं और लोगों का योगदान रहा. टाटा स्टील फाउंडेशन, नोवामुंडी पुलिस और अंचल कार्यालय ने इस मिशन में सक्रिय सहयोग दिया. इसके अलावा उमर सादिक, प्रमिला पात्रा, विनिता सांडिल, रेनु देवी, सोमा बोस, पूनम देवी, सूरज ठाकुर, रविकांत ठाकुर और संजय निषाद जैसे कई लोगों ने इस कार्य को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई.

डालसा की पहल बनी मिसाल

डालसा चाईबासा की यह पहल समाज के कमजोर और असहाय वर्गों के प्रति उसकी संवेदनशीलता को दर्शाती है. इस घटना ने यह साबित कर दिया कि अगर सही दिशा में प्रयास किया जाए, तो वर्षों पुरानी दूरी भी मिटाई जा सकती है. यह पहल न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता का उदाहरण है, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण की भी मिसाल है.

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समाज के लिए प्रेरणादायक संदेश

यह घटना समाज को एक सकारात्मक संदेश देती है कि संवेदनशीलता, समन्वय और इच्छाशक्ति के बल पर असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है. 40 साल का लंबा इंतजार खत्म होने के बाद जिस तरह एक परिवार फिर से एक हुआ, वह हर किसी के लिए उम्मीद और विश्वास का प्रतीक बन गया है. यह भावुक मिलन लंबे समय तक लोगों के दिलों में यादगार बना रहेगा और समाज को मानवीय मूल्यों की अहमियत का एहसास कराता रहेगा.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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