नौ माह से पेड़ के नीचे चल रहा है आंगनबाड़ी केंद्र
Updated at : 03 Feb 2016 8:21 AM (IST)
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सिमडेगा : अति उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र सदर प्रखंड के बीरू पंचायत के बुढ़ा पहाड़ पंडरीपानी में पिछले नौ माह से पेड़ के नीचे चल रहा है आंगनबाड़ी केंद्र. इससे आंगनबाड़ी के संचालन में सेविका, सहायिका के अलावा बच्चों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. बरसात के दिनों में तो स्थिति और […]
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सिमडेगा : अति उग्रवाद प्रभावित क्षेत्र सदर प्रखंड के बीरू पंचायत के बुढ़ा पहाड़ पंडरीपानी में पिछले नौ माह से पेड़ के नीचे चल रहा है आंगनबाड़ी केंद्र. इससे आंगनबाड़ी के संचालन में सेविका, सहायिका के अलावा बच्चों को भी काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.
बरसात के दिनों में तो स्थिति और भी दयनीय हो जाती है. सेविका को बच्चों को लेकर इधर उधर भटकना पड़ता है. कभी किसी घर में तो कभी किसी के बरामदे में रहना पड़ता है. हालांकि यहां पर आंगनबाड़ी केंद्र भवन का निर्माण वर्ष 2014 में शुरू किया गया था, किंतु निर्माण कार्य अब तक अधूरा पड़ा है. संवेदक फरार है. परिणाम स्वरूप बच्चे पेड़ के नीचे बैठ कर पढ़ने को विवश हैं.
सेविका के अनुसार यहां पर 2010 से 2015 तक किराये के खपरैल मकान में आंगनबाड़ी केंद्र चलाया जाता था. किंतु मकान मालिक द्वारा घर खाली करा दिया गया. इसके बाद से ही केंद्र का संचालन पेड़ के नीचे किया जा रहा है. भवन निर्माण कार्य पूरा कराने के लिए कई बार विभागीय पदाधिकारियों का ध्यान आकृष्ट कराया गया. किंतु नतीजा सिफर निकला.
केंद्र संचालन में हो रही है कठिनाई : सेविका
आंगनबाड़ी केंद्र की सेविका कमला होरो व सहायिका बसंती टोपनो का कहना है कि नौ माह से पेड़ के नीचे केंद्र का संचालन किया जा रहा है, किंतु इस ओर ध्यान देनेवाला कोई नहीं है.
किसी प्रकार बच्चों को पढ़ाया जाता है. इसके अलावा टीकारकण सहित अन्य कार्यक्रम के संचालन में भी कठिनाई होती है. भवन नहीं होने के कारण पोषाहार एवं अन्य सामग्रियों को भी सुरक्षित रखना भी मुश्किल हो गया है. बच्चों की संख्या में भी निरंतर कमी होती जा रही है. केंद्र में 22 बच्चे नामांकित हैं, किंतु 10-15 बच्चे ही उपस्थित होते हैं. अभिभावक बच्चों को भेजने से कतराते हैं. सेविका का कहना है कि भवन नहीं रहने के कारण पोषाहार बनाने में भी काफी दिक्कत होती है. पेड़ के नीचे ही पोषाहार बनाया जाता है.
पेयजल की है समस्या
यहां पर पेयजल की भी गंभीर समस्या है. बच्चों को पानी के लिए इधर उधर भटकना पड़ता है. गांव में लगा चापानल पिछले चार माह से खराब पड़ा है. लगभग आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक कुएं से पानी ला कर पोषाहार बनाया जाता है और उसी पानी को बच्चे पीते भी हैं.
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