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130 गांवों में 35 लाख पेड़ लगा चुकी हैं पद्मश्री चामी मुर्मू, 35 सालों से चला रहीं आंदोलन

Updated at : 08 Mar 2026 9:38 AM (IST)
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Womens Day Special

वर्ष 2024 में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू से पद्मश्री पुरस्कार लेती चामी मुर्मू. फोटो: प्रभात खबर

Womens Day Special: झारखंड में सरायकेला-खरसावां के राजनगर की पद्मश्री चामी मुर्मू पिछले 35 सालों से पर्यावरण संरक्षण में जुटी हैं. उन्होंने 130 गांवों में 35 लाख से अधिक पौधे लगाकर हरियाली का अभियान चलाया. ‘सहयोगी महिला बागरसाई’ संगठन के माध्यम से हजारों महिलाओं को जोड़कर पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण का आंदोलन खड़ा किया. इससे संबंधित पूरी खबर नीचे पढ़ें.

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सरायकेला से शचिंद्र कुमार दाश की रिपोर्ट

Womens Day Special: आज जब हम पर्यावरण संकट, जलवायु परिवर्तन और वनों की कटाई जैसी गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं, तब झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले की एक आदिवासी महिला ने असाधारण काम कर दिखाया है. धरती को फिर से हरा-भरा करने के लिए राजनगर प्रखंड की चामी मुर्मू पिछले 35 सालों से पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रही हैं. उन्होंने अब तक 130 गांवों में 35 लाख से अधिक पौधा लगा दिया है. जहां कभी सूखा और बंजर जमीन थी, वहां अब खेतों में पौधे लहलहा रहे हैं.

पर्यावरण संरक्षण को बनाया जनांदोलन

पद्श्री चार्मी मुर्मू ने न केवल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में काम किया, बल्कि महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाया. उन्होंने पर्यावरण संरक्षण को जनांदोलन बना दिया. चामी मुर्मू ने अपने प्रयासों से साबित किया कि परिवर्तन केवल बड़े शहरों से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे गांवों से भी शुरू हो सकता है. उनके इसी काम पर वर्ष 2024 में उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है. 52 साल की चामी मुर्मू को देश भर में ‘सरायकेला की सहयोगी’ के नाम से जाना जाता है. आदिवासी महिला चामी मुर्मू ने पर्यावरण और महिला सशक्तिकरण के क्षेत्र में काफी काम किया है.

24 महिलाओं से आंदोलन शुरू, आज हजारों का है नेटवर्क

साल 1989 में अपने क्षेत्र में हरियाली लाने के लिए उन्होंने पेड़ लगाने का काम शुरू किया. इसके बाद 1990 में चामी ने गांव की औरतों को साथ जोड़कर ‘सहयोगी महिला बागरसाई’ संगठन की नींव रखी. शुरुआत में सिर्फ 24 महिलाएं जुड़ीं. चामी ने उन्हें समझाया कि यदि वे एकजुट होकर काम करेंगी, तो कोई ताकत उन्हें रोक नहीं पाएगी. धीरे-धीरे संगठन बढ़ता गया और आज हजारों महिलाओं का मजबूत नेटवर्क है.

लकड़ी माफियाओं से मिली धमकी

चामी बताती है कि शुरुआत के दिनों में गांव के कई पुरुषों ने उनका विरोध किया. कई बार उन्हें अपमानित किया गया. लकड़ी माफिया ने धमकियां दीं, क्योंकि उनके हितों को नुकसान हो रहा था. लेकिन, चामी ने हार नहीं मानी. वह दिन-रात औरतों को साथ लेकर पेड़ लगातीं और जंगल की रखवाली करतीं. कई बार उन्होंने औरतों के साथ मिलकर लकड़ी चोरों और माफियाओं को रोका. इस संगठन का मकसद पेड़ लगाना, पानी बचाना, जैविक खेती को बढ़ावा देना और औरतों को आत्मनिर्भर बनाना था.

औरतों को दिलाया आत्मनिर्भरता का हक

चामी मानती हैं कि असली बदलाव तभी संभव है, जब महिलाएं सशक्त हों. उन्होंने गांव की हजारों औरतों को सेल्फ-हेल्प ग्रुप से जोड़ा. इन समूहों ने औरतों को छोटी बचत से लेकर जैविक खेती, जल संरक्षण और पर्यावरण की रक्षा करने के तरीके सिखाए. इनसे जुड़ी महिलाएं अब अपने पैरों पर खड़ी हैं. वे न सिर्फ अपने परिवार को बेहतर जीवन दे रही हैं, बल्कि समाज में अपनी पहचान भी बना रही हैं. आज उनके संगठन से जुड़ी 35,000 से अधिक महिलाएं आत्मनिर्भर बन चुकी हैं और नई पीढ़ी के लिए मिसाल पेश कर रही हैं. चामी मुर्मू के काम को देश के हर क्षेत्र में सराहा गया. 2020 में उन्हें तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविद के हाथों नारी शक्ति पुरस्कार से नवाजा गया. इस सम्मान ने उन्हें और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी. अंततः 2024 में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया.

पेड़ लगाने से ज्यादा जरूरी बचाना है: चामी मुर्मू

पद्मश्री चामी मुर्मू ने बताया कि पिछले 35 वर्षों में उन्होंने अपने सहयोगियों के साथ मिल कर करीब 130 गांवों में 35 लाख से अधिक पौधे लगा कर हरियाली लाने का प्रयास किया है. चामी मुर्मू के अनुसार, पौधा लगा देने भर ही काम नहीं चलता है. पौधारोपण करने के साथ साथ उन्हें बचाना ओर भी जरूरी है. साथ ही, जंगलों को संरक्षित करने की भी आवश्यकता है. इसके लिए जन भागिदारी जरूरी है. सिर्फ वन विभाग के भरोसे पेड़-पौधों को नहीं बचाया जा सकता है. इस दिशा में समाज को जागरुक होना होगा.

वन महोत्सव के नाम पर हो रहा कोरम पूरा

उन्होंने बताया कि जिस तेजी के साथ जनसंख्या बढ़ रही है और जंगलों का ह्रास हो रहा है, यह बहुत ही चिंताजनक है. अलग राज्य बनने के बाद जंगल और पेड़ पौधों को बचाने के लिए किए गए काम नाकाफी है. वन महोत्सव के नाम पर कागजों में कोरम पूरा करने से काम नहीं चलेगा. सरकार को चाहिए कि वन क्षेत्रों में पौधे लगाने से ज्यादा पौधों को बचाने और वन क्षेत्रों को संरक्षित करने पर ध्यान देना चाहिए. जहां भी पौधे लगाये जा रहे हैं, उनका सही देखभाल कर उन्हें बचाने की पहल होनी चाहिए.

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वनाधिकार कानून को बनाना होगा प्रभावी

उन्होंने कहा कि ग्राम सभाओं को अधिकार देने के साथ साथ वन समितियों की भी जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी. वनाधिकार कानून को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा. साथ ही, जल संरक्षण की दिशा में भी काम करना होगा. जंगलों की कटाई करने वालों पर कड़ी कार्रवाई करनी होगी. चामी मुर्मू के अनुसार, गर्मी के दिनों में आग लगने के कारण बड़ी संख्या में पेड़-पौधे बर्बाद हो जाते है. जंगल में आग से पेड़ पौधे बर्बाद न हो. इस दिशा में भी आवश्यक कदम उठाने की आवश्यकता है. सरकार को चाहिए कि वनों के महत्व के बारे में जनचेतना जागृत करे. साथ ही, सामाजिक वानिकी को प्रोत्साहन, वन संरक्षण एवं नियमों और कानूनों का कड़ाई से पालन कराने पर काम करें.

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KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

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