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सीतारामपुर जलाशय में पहली बार शुरू हुई केज पद्धति से मछली पालन

Updated at : 27 Jul 2025 2:49 PM (IST)
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Fish Farming

Fish Farming

Fish Farming: सीतारामपुर जलाशय में इस वर्ष पहली बार केज पद्धति से मत्स्य पालन किया जा रहा है. धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान योजना के तहत इस जलाशय में 8 लाभुकों को 32 केज उपलब्ध कराया गया है.

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Fish Farming | सरायकेला-खरसावां, शचींद्र दाश: सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया अंचल के सीतारामपुर जलाशय में इस वर्ष पहली बार केज पद्धति से मत्स्य पालन किया जा रहा है. वित्तीय वर्ष 2024-25 में धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान योजना के तहत इस जलाशय में 8 लाभुकों को 32 केज उपलब्ध कराया गया है. इस योजना का उद्देश्य मछली उत्पादन और उत्पादकता में गुणात्मक वृद्धि करना है, साथ ही आधुनिक तकनीक, आधारभूत संरचना और वैज्ञानिक मत्स्य प्रबंधन के माध्यम से इस क्षेत्र को सुदृढ़ बनाना है.

क्या है धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान योजना?

धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान योजना एक जन जातीय लाभुक जनित योजना है. इसके तहत अनुदान राशि कुल इकाई लागत का 90 प्रतिशत ( 60 प्रतिशत केंद्रांश व 40 प्रतिशत राज्यांश) तथा शेष 10 प्रतिशत राशि लाभुक अंशदान होता है. इस योजना से समुदाय आधारित गतिविधि भी सम्मलित है. वर्त्तमान में सीतारामपुर जलाशय में सीतारामपुर मत्स्यजीवी सहयोग समिति, सीतारामपुर, गम्हरिया कार्यरत हैं.

बांध निर्माण से 1300 परिवार हुए विस्थापित

करीब 70 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले सीतारामपुर जलाशय खरकाई नदी के किनारे निर्मित बांध है. इस बांध का निर्माण वर्ष 1960 में सिंचाई विभाग द्वारा कराया गया था. इसमें वर्ष 1963 से जल संग्रहण का कार्य शुरू हुआ. जलाशय निर्माण के बाद जल संग्रहण से लगभग 10 गांवों के करीब 1300 परिवार विस्थापित हुए. विस्थापन के पूर्व लोग आजीविका के लिए मुख्यतः खेती पर ही निर्भर थे, लेकिन जलाशय बनने के बाद विस्थापितों के लिये जीविकोपार्जन एक बड़ी समस्या बन गयी थी.

2007 में मछली पालन से जुड़े लोग

केज पद्धति से मछली पालन

जलाशय में जल संग्रहण के बाद लोगों को जीविकोपार्जन के लिए 2007 से मछली पालन के कार्य से जोड़ा गया. इस जलाशय में मत्स्य अंगुलिकाओं का संचयन किया जाता है. जलाशय किनारे बसे विस्थापित जीविकोपार्जन के लिए जलाशय में शिकारमाही का कार्य करते हैं.

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क्या है केज कल्चर तकनीक ?

केज कल्चर मछली पालन का वह तकनीक है, जिसमें जलाशय में निर्धारित जगह पर फ्लोटिंग केज यूनिट बनाए जाते हैं. सभी यूनिट एक दूसरे से जुड़े होते हैं. एक यूनिट में चार घेरा होते हैं. जीआई पाईप के बने घेरे के चारों और मजबूत जाल होता है, जिसे कछुआ या अन्य जलीय जीव काट नहीं सकते. पानी में तैरते हुए इसी जाल के घेरे में मछली पालन किया जाता है. इन जालों में अंगुलिकाओं की साईज की मछलियां पालने के लिए संचयन की जाती है, मछलियों को प्रतिदिन आहार दिया जाता है. केज कल्चर पद्धति से मत्स्य कृषकों को स्वावलम्बी/आत्म निर्भर बनाने हेतु योजनाओं का संचालन की जा रही है.

सीतारामपुर डैम में कई अन्य गतिविधियां संचालित

सीतारामपुर जलाशय में पूर्व से ही कई गतिविधियां संचालित हो रही हैं, जिनमें रिवराइन फिश फार्मिंग, मछली-सह-बत्तख पालन, गिल नेट के माध्यम से शिकारमाही, छाड़न निर्माण और पारंपरिक नाव योजना शामिल हैं. जलाशय में भारतीय मेजर कार्प और ग्रास कार्प जैसी प्रजातियों के बीज का भी संचयन किया जाता है. पूर्व में शिकारमाही में मछली की मात्रा कम होती थी, लेकिन अंगुलिकाओं के बेहतर संचयन और जलाशय में छाड़न के निर्माण से मत्स्य उत्पादन में 8 से 10 गुना तक की वृद्धि दर्ज की गयी है. समिति को झास्कोफिश द्वारा कार्यालय शेड और अन्य उपकरण भी प्रदान किए गए हैं, जिससे उनके कार्यों में सुविधा और गति आयी है.

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Dipali Kumari

लेखक के बारे में

By Dipali Kumari

नमस्कार! मैं दीपाली कुमारी, एक समर्पित पत्रकार हूं और पिछले 3 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हूं. वर्तमान में प्रभात खबर में कार्यरत हूं, जहां झारखंड राज्य से जुड़े महत्वपूर्ण सामाजिक, राजनीतिक और जन सरोकार के मुद्दों पर आधारित खबरें लिखती हूं. इससे पूर्व दैनिक जागरण आई-नेक्स्ट सहित अन्य प्रतिष्ठित समाचार माध्यमों के साथ भी कार्य करने का अनुभव है.

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