जर्जर हाल में है 50 साल पुराना डकरा का पवित्र गुरुद्वारा

Updated at : 19 Mar 2025 5:14 PM (IST)
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जर्जर हाल में है 50 साल पुराना डकरा का पवित्र गुरुद्वारा

डकरा, खलारी, मैक्लुस्कीगंज और बाजारटांड़ की बड़ी आबादी को ध्यान में रखकर डकरा में 50 साल पहले बनाया गया गुरुद्वारा देख-रेख और मरम्मत के अभाव में जीर्ण-शिर्ण हो गया है.

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ढह रही दीवार, खिड़की-दरवाजे को दीमक लग गये, छत का प्लास्टर गिर रहा

प्रतिनिधि, डकरा

डकरा, खलारी, मैक्लुस्कीगंज और बाजारटांड़ की बड़ी आबादी को ध्यान में रखकर डकरा में 50 साल पहले बनाया गया गुरुद्वारा देख-रेख और मरम्मत के अभाव में जीर्ण-शिर्ण हो गया है. खिड़की-दरवाजे को दीमक लग गये हैं. छत का प्लास्टर टूट कर गिर रहा है. बिजली तार की वायरिंग चारों तरफ खराब हो गयी है. बाथरूम में पानी का कनेक्शन कट गया है. इसके कारण बाथरूम बंद हो गया. आंगन का प्लास्टर टूट गया है. लंगर के लिए जहां प्रसाद तैयार किया जाता है वहां शेड नहीं रहने से चूल्हे पर काम करना मुश्किल होने लगा है. हाॅल में जहां दीवान साहब श्रृद्धालुओं को दर्शन देते हैं सिर्फ वहां की छत और सुखासन स्थान को किसी तरह मरम्मत कर गुरुद्वारे की प्रतिष्ठा को बचाकर रखा गया है. त्योहार के दिन लंगर चखने वालों को बैठने की व्यवस्था भी खराब हो गयी है. पूर्व में कभी-कभार सिख समुदाय के लोग मिलकर या सीसीएल प्रबंधन यहां जरुरत के हिसाब से कुछ काम कराता था, लेकिन अब क्षेत्र में सिख परिवार की संख्या सीमित हो गया और बाद में सीसीएल ने भी ध्यान देना बंद कर दिया. इसके कारण हजारों लोगों की आस्था का केंद्र रहा गुरुद्वारा परिसर खंडहर बनता जा रहा है.

1973 में नींव रखी गयी और 75 में हुई प्राण-प्रतिष्ठा

डकरा में रहने वाले सिख परिवार के सरदार अजीत सिंह, करनैल सिंह, चंदन सिंह, केहर सिंह, हरमेल सिंह, हरभजन सिंह, खलारी के प्यारा सिंह, चरणजीत सिंह, गुरुदयाल सिंह, जसवंत सिंह आदि ने मिलकर 1973 में गुरुद्वारा गुरु सिंह सभा की नींव रखी और 1975 में प्राण-प्रतिष्ठा हुई. इसके बाद यह गुरुद्वारा क्षेत्र का एक बड़ा धार्मिक केंद्र बन गया, जहां खलारी, बुढ़मू, मैक्लुस्कीगंज, चंदवा और आसपास के हजारों गांव के ग्रामीण यहां मत्था टेकने आने लगे.

50 की जगह मात्र 12 सिख परिवार

वर्ष 1970 के दशक में सिर्फ डकरा में 50 सिख परिवार रहते थे. वहीं, खलारी, मैक्लुस्कीगंज आदि क्षेत्रों के सिख परिवार जब गुरुद्वारा में जुटते थे तो यहां मेला जैसा दृश्य बन जाता था. लेकिन 1984 की त्रासदी, खलारी सीमेंट फैक्ट्री बंद होने, सीसीएल कर्मियों का सेवानिवृत्त होना और बाद की पीढ़ी रोजगार की तलाश में विदेशों का रुख करने के कारण क्षेत्र में सिख परिवार की संख्या लगातार कम होती गयी, जिसका असर गुरुद्वारे पर भी पड़ा.

एक मन्नत पूरी हुई और मरम्मत कार्य शुरू किया

डकरा में रहने वाले एक सीसीएल कर्मी के पुत्र की जब मन्नत पूरी हुई तो उसने यहां कुछ जरूरी काम कराने की इच्छा जतायी. परिवार के लोग सर्वे करने पहुंचे तो हर जगह की स्थिति जर्जर दिखाई दिया. बाद में निर्णय लिया गया कि सिख परिवार के अलावा और भी सनातनी लोगों से सहयोग लेकर काम कराया जाए. सूचना मिलने पर कई लोग सेवा के लिए सामने आए हैं और आंशिक तौर पर मरम्मत कार्य शुरू कर दिया गया है. लेकिन, पूरे परिसर की हालत इतना खराब है कि बड़े पैमाने पर सेवादारों को जोड़ने की आवश्यकता है.

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