एसआईआर, परिसीमन और जनगणना पर सवाल, लोकतंत्र पर असर की आशंका

रांची के नामकुम में सभा को संबोधित करते समाजसेवी परकला प्रभाकर. फोटो: प्रभात खबर
Ranchi News: रांची के नामकुम में परकाला प्रभाकर ने एसआईआर, परिसीमन और जनगणना के जरिए लोकतांत्रिक संरचना बदलने की आशंका जताई. उन्होंने इसे मताधिकार पर खतरा बताया. कार्यक्रम में आदिवासी, दलित और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर भी चिंता व्यक्त की गई और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग उठी. इससे जुड़ी खबर नीचे पढ़ें.
रांची से उत्तम कुमार की रिपोर्ट
Ranchi News: झारखंड के नामकुम में आयोजित एक कार्यक्रम में देश की राजनीतिक संरचना को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गईं. अर्थशास्त्री एवं सामाजिक कार्यकर्ता परकला प्रभाकर ने कहा कि एसआईआर, परिसीमन और जनगणना के माध्यम से एक ऐसी प्रक्रिया चल रही है, जो भविष्य में लोकतांत्रिक ढांचे को गहराई से प्रभावित कर सकती है. उन्होंने इसे केवल चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि नागरिक अधिकारों से जुड़ा बड़ा मुद्दा बताया.
दो तरह के नागरिक बनने का खतरा: परकला प्रभाकर
परकला प्रभाकर ने अपने संबोधन में कहा कि इस प्रक्रिया के चलते देश में दो तरह के नागरिक बनने का खतरा है. एक वे, जिनके पास मतदान का अधिकार होगा और दूसरे वे, जिनसे यह अधिकार छीन लिया जाएगा. उन्होंने चेतावनी दी कि यह लोकतंत्र की मूल भावना के खिलाफ है, क्योंकि इससे यह तय होगा कि कौन लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भाग ले सकता है और कौन नहीं. उन्होंने कहा कि यह बदलाव आने वाले समय में दूरगामी परिणाम देगा और समाज में असमानता को बढ़ा सकता है.
एसआईआर को बताया रक्तहीन राजनीतिक जनसंहार
कार्यक्रम में प्रभाकर ने एसआईआर को “रक्तहीन राजनीतिक जनसंहार” करार दिया. उन्होंने कहा कि इसकी संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है, लेकिन अब तक इस पर कोई स्पष्ट निर्णय नहीं आया है. इसके बावजूद चुनाव आयोग द्वारा इसे लागू किया जा रहा है, जो कई सवाल खड़े करता है. उन्होंने दावा किया कि अब तक 10 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में करीब 6.5 करोड़ मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया जा चुका है और यह संख्या देशभर में 16.5 करोड़ तक पहुंच सकती है.
ग्राम सभाओं से पारदर्शिता की अपील
प्रभाकर ने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया को समझने और इसके प्रभाव को रोकने के लिए लोगों को जमीनी स्तर पर सक्रिय होना होगा. उन्होंने कंप्यूटर आधारित एल्गोरिदम से बाहर निकलकर ग्राम सभाओं के माध्यम से पारदर्शिता सुनिश्चित करने की अपील की. उन्होंने लोगों से कहा कि इस प्रक्रिया के वास्तविक उद्देश्य को उजागर करना जरूरी है, ताकि आम नागरिक अपने अधिकारों के प्रति सजग हो सकें.
झारखंड में आदिवासी-मूलवासी अधिकारों पर खतरा
कार्यक्रम में अन्य वक्ताओं ने भी एसआईआर को लेकर गंभीर चिंता जताई. सामाजिक कार्यकर्ता अफजल अनीस ने कहा कि इस प्रक्रिया के जरिए बड़ी संख्या में लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा सकते हैं. वहीं, आलोका कुजूर और एलिना होरो ने कहा कि एसआईआर झारखंड के आदिवासी और मूलवासी समुदायों की नागरिकता पर सवाल खड़ा करने का माध्यम बनता जा रहा है. उन्होंने बताया कि जिन लोगों के नाम हटाए गए हैं, उनमें अल्पसंख्यक, दलित, आदिवासी और महिलाएं बड़ी संख्या में शामिल हैं.
चुनाव आयोग की भूमिका पर सवाल
कार्यक्रम में प्रवीर पीटर ने चुनाव आयोग की भूमिका पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि राजनीतिक दल इस मुद्दे पर अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे हैं, जिससे स्थिति और गंभीर हो गई है. उन्होंने यह भी कहा कि चुनाव आयोग की स्वायत्तता को लेकर अब गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं और इस पर व्यापक चर्चा की जरूरत है.
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जागरूकता के लिए पर्चा जारी
कार्यक्रम के अंत में झारखंड जनाधिकार महासभा और बगाईचा संस्था की ओर से एक पर्चा जारी किया गया. इसका उद्देश्य आम लोगों को एसआईआर, परिसीमन और जनगणना से जुड़े संभावित खतरों के प्रति जागरूक करना है. इस कार्यक्रम ने स्पष्ट कर दिया कि आने वाले समय में यह मुद्दा सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और संवैधानिक बहस का बड़ा विषय बनने वाला है.
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By KumarVishwat Sen
कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.
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