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Lok Sabha Election: 1973 में झामुमो का गठन, 1977 में शिबू सोरेन निर्दलीय लड़े चुनाव, 1980 में यहां खुला JMM का खाता

Updated at : 26 Mar 2024 5:01 AM (IST)
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झामुमो की चुनावी राजनीति पर एक नजर.

Lok Sabha Election 2024|झामुमो के पहले अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो और महासचिव शिबू सोरेन चुने गये. झामुमो के नेताओं ने पहला विधानसभा चुनाव 1977 में, फिर 1980 व 1985 में लड़ा

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Lok Sabha Election 2024|जमशेदपुर, संजीव भारद्वाज : झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का गठन चार फरवरी 1973 को धनबाद के गोल्फ ग्राउंड में शिवाजी समाज के संस्थापक बिनोद बिहारी महतो, सोनोत संताल समाज के नेता शिबू सोरेन व प्रखर मार्क्सवादी चिंतक एके राय की अगुवाई में हुआ था.

बिनोद बिहारी महतो अध्यक्ष, शिबू सोरेन बने झामुमो के महासचिव

झामुमो के पहले अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो और महासचिव शिबू सोरेन चुने गये थे. झामुमो के नेताओं ने पहला विधानसभा चुनाव 1977 में, फिर 1980 व 1985 में लड़ा, लेकिन अपना सिंबल तीर-धनुष निबंधित नहीं करा सके. इसकी सफलता झामुमो को 1989 के लोकसभा चुनाव में उस वक्त मिली, जब जमशेदपुर, दुमका और राजमहल से इसके तीन प्रत्याशी जीते.

…और झामुमो के लिए रिजर्व हो गया तीर-धनुष का सिंबल

इसके बाद झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) के नाम से बिहार में तीर-धनुष रिजर्व सिंबल हो गया. यह परंपरा झारखंड में भी कायम रही. इसके पहले रजिस्टर्ड पार्टी होते हुए झामुमो के प्रत्याशी जहां चुनाव लड़ते थे, वहां उन्हें तीर-धनुष का सिंबल मिल जाता, लेकिन जिस लोकसभा या विधानसभा में झामुमो के प्रत्याशी नहीं उतारे जाते थे, वहां तीर-धनुष फ्री सिंबल होता था. यानी उसे किसी भी उम्मीदवार को आवंटित कर दिया जाता था.

कई दफा टूटा झारखंड मुक्ति मोर्चा

आपातकाल के दौरान 1975 में बिनोद बाबू को मीसा के तहत गिरफ्तार कर भागलपुर जेल भेज दिया गया. उसी दौरान एके राय व शिबू सोरेन को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया. बिनोद बाबू 19 माह तक भागलपुर जेल में रहे. 1977 में झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन ने पहला विधानसभा चुनाव टुंडी से निर्दलीय लड़ा. यहां उन्हें 7,523 वोट मिले. जनता पार्टी के उम्मीदवार सत्यनारायण दुधानी को 16,055 वोट मिले. दिशोम गुरु अपना पहला चुनाव साढ़े 8 हजार वोट के अंतर से हार गए.

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1980 में चक्रधरपुर में पहली बार जीता था झामुमो

वर्ष 1980 के चुनाव में कोल्हान में पहली बार झामुमो प्रत्याशी देवेंद्र माझी ने चक्रधरपुर सीट से जीत हासिल कर तीर-धनुष को स्थापित किया. देवेंद्र माझी (23,336) ने भाजपा के जगरनाथ बंकिरा (10,575) को पराजित किया था.

1980 में संगठित होकर चुनाव के मैदान में उतरा झामुमो

इस चुनाव में झामुमो ने चक्रधरपुर और मनोहपुर से अपना प्रत्याशी उतारा. 1980 में झामुमो ने संगठित होकर चुनाव लड़ा, जिसमें 12 विधायकों ने जीत हासिल की. उस वक्त विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ तालमेल हुआ था.

ज्ञानरंजन ने शिबू सोरेन की इंदिरा गांधी से करवाई मुलाकात

कांग्रेस के वरीय नेता ज्ञानरंजन झामुमो प्रमुख शिबू सोरेन को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलवाने के लिए दिल्ली ले गये थे. इंदिरा गांधी ने समझौता कर 45 सीटें दे दी थीं. ऐसा माना जाता है कि 80 के दशक में जब झारखंड आंदोलन चरम पर था, उस वक्त कार्तिक उरांव को एकीकृत बिहार के मुख्यमंत्री डॉ जगन्नाथ मिश्रा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलवाया था.

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झामुमो के खिलाफ निर्दलीय लड़े कांग्रेस के दुर्गा प्रसाद जामुदा, तो भाजपा को हुआ फायदा

दोनों नेताओं ने इंदिरा गांधी से कहा था कि झामुमो को इतनी सीटें दे देंगी, तो हम वहां समाप्त हो जायेंगे. इसके बाद 14 सीटें ही झामुमो को दी गई. मनोहरपुर से झामुमो प्रत्याशी मछुवा गागराई (6395) के खिलाफ कांग्रेस के नेता दुर्गा प्रसाद जामुदा (4707) निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव मैदान में उतरे थे. इसका लाभ भाजपा प्रत्याशी रत्नाकर नायक (7257) को मिला.

1985 में झामुमो ने 35 सीट पर लड़ा चुनाव, 9 सीट पर मिली जीत

झामुमो ने वर्ष 1985 में 35 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें 9 सीटों पर जीत दर्ज की. सरायकेला सीट से कृष्णा मार्डी ने जीत हासिल की थी. वर्ष 1990 में कोल्हान में 7 विधानसभा सीटों पर जीत हासिल की थी. 1983-84 में झामुमो में मतभेद हुआ. बिनोद बिहारी महतो शिबू सोरेन से अलग हो गये.

1987 में निर्मल महतो की हत्या के बाद एकजुट हुआ झामुमो

इसके बाद झामुमो के एक गुट के अध्यक्ष बिनोद बिहारी महतो, महासचिव टेकलाल महतो बने. दूसरे गुट के अध्यक्ष निर्मल महतो, महासचिव शिबू सोरेन, उपाध्यक्ष सूरज मंडल को बनाया गया. वर्ष 1987 में निर्मल महतो की हत्या के बाद दोनों गुट फिर से एक हो गये.

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