Jharkhand: प्रस्तावित उत्पाद नीति में क्या है खामी, जिस वजह से राजस्व पर्षद है असहमत, यहां जानें सब कुछ

Updated at : 28 Feb 2022 6:31 AM (IST)
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Jharkhand: प्रस्तावित उत्पाद नीति में क्या है खामी, जिस वजह से राजस्व पर्षद है असहमत, यहां जानें सब कुछ

राजस्व पर्षद ने प्रस्तावित उत्पाद नीति के कई बिंदुओं पर असहमत है, उस पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया है. इसमें लाइसेंस फीस और उत्पाद शुल्क जैसे कई मुद्दे शामिल हैं

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रांची : राजस्व पर्षद ने प्रस्तावित उत्पाद नीति में लाइसेंस फीस और उत्पाद शुल्क जैसे मुद्दे पर पुनर्विचार करने का सुझाव दिया है और कई बिंदुओं पर असहमति जतायी है. रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल खुदरा दुकानों के लिए लाइसेंस फीस और मिनिमम गारंटी रेवेन्यू (एमजीआर) की व्यवस्था लागू है.

इसके तहत 50 हजार रुपये से 1.5 लाख रुपये तक लाइसेंस फीस लगती है. दुकानों के लिए एमजीआर भी निर्धारित है. एमजीआर की रकम हर महीने की 25 तारीख तक सरकारी खजाने में जमा करने की बाध्यता है. निर्धारित तिथि तक जमा नहीं करने पर पांच प्रतिशत की दर से दंड वसूलने का प्रावधान है. नयी नीति में लाइसेंस फीस 10 हजार करने और एमजीआर की व्यवस्था को खत्म करने का प्रावधान है.

इससे राज्य को नुकसान होने की आशंका है. लाइसेंस फीस घटा कर 10 हजार रुपये करने और 1500 दुकान खोलने की स्थिति में लाइसेंस फीस मद में करीब 15 करोड़ रुपये का नुकसान होगा. ज्ञात हो कि राजस्व पर्षद ने नयी उत्पाद नीति की समीक्षा के लिए तीन सदस्यीय टीम गठित की थी. समिति ने इसकी समीक्षा के बाद प्रस्ताव सरकार को लौटा दिया है.

उत्पाद शुल्क वसूली में बदलाव के प्रावधान को सही नहीं माना :

राजस्व पर्षद ने उत्पाद शुल्क वसूली में किये गये बदलाव को सही नहीं माना है. फिलहाल शराब बनानेवाली कंपनी 15 प्रतिशत और 85 प्रतिशत खुदरा विक्रेता उत्पाद शुल्क देते हैं. नयी नीति में शराब बनानेवाली कंपनी को उत्पाद शुल्क से मुक्त करते हुए इसकी वसूली राज्य बिवरेज कॉरपोरेशन से करने का प्रावधान किया गया है.

इससे राजस्व का नुकसान तो नहीं होगा, लेकिन कंपनी ने कितनी शराब बनायी और बेची, इस पर नियंत्रण बनाये रखना मुश्किल होगा. पर्षद ने गोदामों की संख्या 75 से घटा कर पांच करने पर भी सवाल उठाया है, क्योंकि इससे ढुलाई की लागत बढ़ेगी और खुदरा स्तर पर शराब महंगी होगी.

पर्षद ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कंसल्टेंट ने देसी शराब की खपत 25.65 लाख पेटी से बढ़ाकर 500 पेटी करने की बात कही है. हालांकि यह नहीं बताया है कि यह कैसे संभव होगा. सरकार द्वारा भेजे गये दस्तावेज में बिवरेज कॉरपोरेशन द्वारा किराये पर ली जानेवाली दुकानों और मैन पावर आदि पर होनेवाले संभावित खर्च से संबंधित जानकारी भी पर्षद को नहीं दी गयी है.

वर्ष 2009-10 से कई बार उत्पाद नीति बदली गयी :

राजस्व पर्षद ने शराब से मिलनेवाले राजस्व की स्थिति की समीक्षा करते हुए लिखा है कि वर्ष 2009-10 से कई बार उत्पाद नीति बदली गयी. वर्ष 2009-12 तक खुदरा और थोक दोनों ही व्यापार निजी हाथों में थे. वर्ष 2012-13 से 2016-17 तक शराब की थोक बिक्री झारखंड राज्य बिवरेज कॉरपोरेशन (जेएसबीसीएल) और खुदरा बिक्री निजी हाथों में थी.

इस अवधि में शराब के राजस्व में 20 प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई. वर्ष 2017-18 और 2018-19 में पहली बार थोक और खुदरा बिक्री, दोनों ही बिवरेज कॉरपोरेशन के पास थी. इस अवधि में राजस्व वृद्धि में कमी हुई. 2019-20 में नीति में बदलाव कर थोक बिक्री बिवरेज कारपोरेशन और खुदरा बिक्री निजी हाथों में सौंपी गयी. इससे सालाना राजस्व दो गुना हो गया और लक्ष्य से अधिक राजस्व मिला.

कोविड-19 से प्रभावित वित्तीय वर्ष 2020-21 और 2021-22 की तुलना दूसरे वित्तीय वर्षों से करना उचित नहीं है. राज्य के उत्पाद राजस्व का औसत ग्रोथ रेट 20 प्रतिशत है. लेकिन प्रस्ताव के अनुसार कंसल्टेंट से सलाह के बाद शराब से मिलनेवाले राजस्व में 15 प्रतिशत वृद्धि की उम्मीद जतायी गयी है. 75 गोदामों की क्षमता को अप्रत्याशित ढंग से पांच में समेटने का उल्लेख किया गया है.

झारखंड राज्य बिवरेज कॉरपोरेशन को कभी राज्य के हितों के विपरीत करार दिया गया. शराब बनानेवाली कंपनियों को उत्पाद शुल्क से मुक्त करने की बात कही गयी है. देशी शराब की खपत को अप्रत्याशित ढंग से करीब 2000 प्रतिशत बढ़ाने की बात कही गयी है. इन स्थितियों के मद्देनजर राजस्व पर्षद ने प्रस्तावित नयी उत्पाद पर टिप्पणी करते हुए इसे‘ विश्वास का प्रयोग’ कहा है.

शराब के टेंडर को लेकर निर्धारित शर्तों पर आपत्ति

राजस्व पर्षद ने शराब के टेंडर में शामिल होने के लिए निर्धारित शर्तों पर आपत्ति जतायी गयी है. टेंडर में शामिल होने के लिए कंपनी का रजिस्टर्ड ऑफिस या शाखा कार्यालय राज्य में होने की शर्त लगायी गयी है. इसके अलावा पिछले दो वित्तीय वर्ष में लगातार न्यूनतम 100 करोड़ के टर्नओवर के साथ छह महीने की थोक बिक्री का अनुभव होने की शर्त है. पर्षद ने इसे विरोधाभासी माना है. इससे चुनिंदा लोगों को लाभ पहुंचने की आशंका जतायी है.

Posted By: Sameer Oraon

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