पर्वतारोहियों ने साझा की संघर्ष यात्रा, साझा की अपनी सफलता की कहानी

Updated at : 21 Aug 2023 12:48 PM (IST)
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पर्वतारोहियों ने साझा की संघर्ष यात्रा, साझा की अपनी सफलता की कहानी

देशभर के 13 पर्वतारोही शामिल हुए. ये पर्वतारोही देश-विदेश के विभिन्न छोर से माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई कर चुके हैं. सबने अपनी कहानियां साझा की.

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माउंट एवरेस्ट फतह करने की 70वीं वर्षगांठ पर रविवार को सीसीएल सभागार में एवरेस्ट समिट कार्यक्रम का आयोजन हुआ. इसमें देशभर के 13 पर्वतारोही शामिल हुए. ये पर्वतारोही देश-विदेश के विभिन्न छोर से माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई कर चुके हैं. सबने अपनी कहानियां साझा की. कार्यक्रम का आयोजन सीसीएल, आइडियेट इंस्पायर इग्नाइज फाउंडेशन और मॉडर्न फाइथन गेमिंग के तत्वावधान में हुआ. मुख्य अतिथि कोल इंडिया के चेयरमैन पीएम प्रसाद ऑनलाइन जुड़े.

साथ ही विशिष्ट अतिथि सीसीएल के सीएमडी डॉ बी वीरा रेड्डी, डायरेक्टर टेक्निकल ऑपरेशन राम बाबू प्रसाद, डायरेक्टर प्रोजेक्ट एंड प्लानिंग बी साईंराम, डायरेक्टर पर्सनल हर्ष नाथ मिश्र, चीफ विजिलेंस ऑफिसर पंकज कुमार, डायरेक्टर फाइनांस पवन कुमार मिश्र, साइबर पीस फाउंडेशन के मेजर विनीत कुमार, टेडेक्स कांके के क्यूरेटर राजीव गुप्ता, आइथ्री फाउंडेशन निदेशक प्रीति गुप्ता भी आयोजन के गवाह बने.

कठिन परिश्रम और एकाग्रता से कर सकते हैं किसी भी डर का सामना

घर से बाहर निकलना ही माउंट एवरेस्ट के चढ़ने जैसा था

-विनीता सोरेन

सरायकेला की विनीता सोरेन पहली बार वर्ष 2004 में बछेंद्री पाल से मिलीं. उनसे प्रेरणा लेकर पर्वतारोही बनने का लक्ष्य तय किया. विनीता ने कहा : आदिवासी और किसान परिवार से होने की वजह से हिम्मत नहीं हो रही थी. घर से बाहर निकलना ही एवरेस्ट चढ़ने जैसा था. लेकिन परिवार ने भरोसा किया और आगे बढ़ने की हिम्मत दी. कड़ी ट्रेनिंग के बाद मैडम बछेंद्री पाल ने कहा : अब तुम एवरेस्ट के लिए तैयार हो. यह सुनने के बाद खुद को रोक नहीं सकी. अंतत: 17 मई 2018 को एवरेस्ट फतह कर लिया. इसके बाद कई अन्य शिखर पर पहुंची. आज परिवार को मेरे नाम से जाना जाता है. सभी गर्व महसूस करते हैं.

बेटी को पर्वतारोही बनाने की जिद में खुद कर लिया एवरेस्ट फतह

प्रेमलता अग्रवाल

प्रेमलता अग्रवाल. 20 मई 2011 को माउंट एवरेस्ट फतह किया. इस जुनून की यात्रा को साझा करते हुए कहा : मैं 18 वर्ष की थी, तभी शादी हो गयी. कई अरमान अधूरे रह गये. बड़ी बेटी की शादी तक खुद को घर में ही समेट कर रखा. 2001 में पर्वतारोहण का प्रशिक्षण लेने दार्जिलिंग चली गयीं, जहां बछेंद्री पाल से मुलाकात हुई. प्रेमलता ने बताया : मेरी साथ छोटी बेटी भी थी. दोनों ने साथ ट्रेनिंग की. एक समय बछेंद्री पाल ने कहा : अब एवरेस्ट के लिए तैयार हो जायें. तब हिम्मत जुटाकर बेटी के साथ यात्रा की शुरुआत की, लेकिन बेटी बीच रास्ते से ही लौट आयी. लेकिन उन्होंने 2011 में एवरेस्ट की चढ़ाई पूरी कर ली.

पिता के अनुशासित और जुनूनी जीवन से मिली बड़ी सीख

जेमलिंग तेनजिंग नॉर्गे शेरपा

इतिहास में पहली बार माउंट एवरेस्ट शिखर पर पहुंचनेवाले तेनजिंग नॉर्गे के बेटे जेमलिंग तेनजिंग नॉर्गे शेरपा ने पिता की यात्रा को साझा किया. उन्होंने कहा : पिता पहाड़ों को लेकर जुनूनी थे. 18 वर्ष की आयु में तिब्बत से दार्जिलिंग आये. ब्रिटिश एक्पीडिशन का हिस्सा बन 1952 में माउंट एवरेस्ट की ओर बढ़े, लेकिन सफलता नहीं मिली. 1953 में फिर चढ़ाई शुरू की. आखिरकार माउंट एवरेस्ट के सर्वोच्च शिखर पर पहुंच गये. जेमलिंग ने कहा : पिता के जुनून से मैं भी प्रभावित हुआ. छह बार असफल होने के बाद 26 मई 1996 को एवरेस्ट फतह कर लिया. यही सीख मिली कि पहाड़ को कठिन परिश्रम से ही जीता जा सकता है.

डर ज्यादा फोकस रहने की सीख देता है, जीत के लिए यह जरूरी

कर्नल रणवीर जामवाल

कर्नल रणवीर जामवाल ने कहा : मैं 2003 में श्रीनगर में तैनात थे. इसी दौरान एक स्कूल में पर्वतारोहण के प्रशिक्षण शिविर से जुड़ा. 2004-05 तक एडवांस ट्रेनिंग पूरी कर की. इसके बाद माउंट माना की चढ़ाई का निर्णय लिया. आखिर 2009 में सफलता मिल गयी. इसके बाद जीवन ही बदल गया. इस शिखर से दुनिया देखने का मौका मिला. 25 मई 2012 को पहली बार माउंट एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचा. लौटने के बाद काम में रहते हुए डायरी तैयार की, जिसमें दुनिया के सभी सर्वोच्च शिखर की सूची थी.

इन शिखर तक पहुंचने के रास्ते और खर्च की जानकारी जुटाई. 2013 में दूसरी बार इंडो-नेपाल एक्सपीडिशन को लीड करते हुए एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचा. तीसरी बार 25 अप्रैल 2015 को एवरेस्ट की ओर बढ़ा, लेकिन इस बार भूकंप से सामना हुआ. तब लोगों को रेस्क्यू करने को जिम्मेदारी मानी. 2016 में तीसरे प्रयास में सफल रहा. 2019 तक दुनिया के सात कॉन्टिनेंट के सर्वोच्च शिखर तक पहुंच चुका हूं. अब देश के हर शिखर तिरंगा मिशन को लीड कर रहा हूं.

25 लाख पर्सनल लोन लेकर एवरेस्ट के शिखर पर पहुंची

-मनीषा वाघमारे

महाराष्ट्र की मनीषा वाघमारे ने बताया : परिवार में सभी खिलाड़ी हैं, इसलिए मैं भी वालीबॉल खेलने लगी. समय के साथ एडवेंचर स्पोर्ट्स का जुनून चढ़ा. लक्ष्य था माउंट एवरेस्ट. खर्च का आकलन किया, तो पता चला 25 लाख रुपये लगेंगे. ऐसे में बैंक से 25 लाख रुपये पर्सनल लोन लेकर एवरेस्ट फतह का सपना पूरा हुआ. अभी तक 28 पहाड़ों के शिखर पर पहुंच चुकी हूं. दुनिया के सात में पांच कॉन्टिनेंट फतह कर चुकी हूं. पर्वतारोहण में सिर्फ जुनून जरूरी है. यही ताकत है.

मानसिक बाधाओं से बाहर निकलेंगे, तभी मिलेगी मंजिल

-भगवान चावले

पु णे से आये भगवान चावले ने कहा : पहली बार वर्ष 2017 में माउंट एवरेस्ट चढ़ने की कोशिश की, लेकिन असफल रहा. इसका कारण था फिटनेस. असफल होने के बाद साइकिलिंग कर खुद को फिट बनाया. प्रशिक्षण के दौरान मानसिक बाधाएं आती हैं, लेकिन इनसे निकलना जरूरी है. कुछ समय में साइकिलिंग इतनी रुचिकर लगने लगी कि पुणे से मुंबई की 350 किमी दूरी आसान बन गयी. इसके बाद दोबारा प्रयास किया. 17 मई 2018 को दूसरे प्रयास में एवरेस्ट फतह कर लिया.

दोनों बहनों ने एक साथ एवरेस्ट पर लहराया तिरंगा

गुजरात से आयीं दो बहनें अनुजा वैद्य और अदिति वैद्य ने एक साथ एवरेस्ट यात्रा को साझा किया. उन्होंने कहा : माता-पिता भी पर्वतारोही थे. इसलिए पांच वर्ष की उम्र में ही पहाड़ों से रिश्ता जुड़ गया. अनुजा ने कहा : सात वर्ष की उम्र में ट्रेनिंग हासिल की. मैंने सपना देखा था कि ओलिंपिक में मशाल लेकर दौड़ूंगी, लेकिन सफल नहीं हुई. तब, पर्वतारोहण को ही अपना करियर चुन लिया. पिता ने कहा कि दोनों बहन साथ माउंट एवरेस्ट फतह करो. तब कई लोगों ने कहा कि मरने के लिए भेजना है तो एक-एक कर भेजो. लेकिन दोनों बहनों ने माउंट एवरेस्ट को लक्ष्य बना लिया. अदिति ने कहा कि पिता की शर्त हमारे लिए चुनौती थी. आखिरकार 22 मई 2019 को शिखर पर तिरंगा लहराने का अवसर मिला.

प्रशांत और सुमित ने म्यूजिक पर थिरकाया

यूफोरिया बैंड के तबलावादक सह पर्क्यूशनिस्ट प्रशांत त्रिवेदी और प्रख्यात हैंडपैन वादक सुमित कुटानी उर्फ बाबा कुटानी मंच पर थे. दोनों की जुगलबंदी ने माहौल में चार-चांद लगा दिया. रांची पहली बार हैंडपैन से परिचित हुई. सुमित कुटानी ने भगवान शिव की स्तुति करते हुए जटाधराय शिव जटा धराये… गीत पर सबको थिरकाया. फिर ड्रम सर्कल का आयोजन हुआ, जिसमें सभी पर्वतारोही भी संगीत से जुड़े. पर्वतारोहियों ने सिंगल सेट ड्रम पर संगीत का जादू बिखेरा. सुमित कुटानी ने इंडियन ड्रम, अरबी ट्यून ड्रम म्यूजिक से मनोरंजन किया. शुरुआत में सुमेधा सेनगुप्ता ने ओडिशी नृत्य से भगवान शिव और पर्वत देव को समर्पित नृत्यनाटिका की प्रस्तुति दी.

वीगन पर्वतारोही, जिसने ऊंचाइयों को छुआ

-कुंतल जोइशर

कुंतल जोइशर वीगन ने बताया : अक्तूबर 2010 से पर्वतारोही बनने की यात्रा शुरू हुई. 2014 और 2015 में एवरेस्ट चढ़ाई का प्रयास असफल रहा. 2016 में तीसरा प्रयास किया. पूरी यात्रा वीगन रहकर पूरी की, लेकिन अंतिम शिखर पर पहुंचने तक एक जैकेट का इस्तेमाल करना पड़ा. यह जैकेट बत्तख के पंख से बना था. तीसरे प्रयास में एवरेस्ट के शिखर पर पहुंचा, तो सम्मान मिला. हालांकि जैकेट के कारण आत्म ग्लानि हुई. फिर ऐसी कंपनी की तलाश की, जो वीगन जैकेट बनाकर दे. दो वर्ष बाद जैकेट बनकर तैयार हुआ, जिसे पहन माउंट ल्होत्से के शिखर पर पहुंचा. इस यात्रा में जैकेट से ज्यादा गर्मी का अहसास हुआ. फिर डिजाइनर से नये फैब्रिक से जैकेट तैयार करवाया. 23 मई 2019 को बतौर वीगन माउंटेनर माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई का सम्मान मिला.

20 वर्ष की उम्र में एवरेस्ट फतह कर लिया

-प्रियंका मोहिते

महाराष्ट्र की प्रियंका मोहिते के पास एमएससी की डिग्री है. वह बेंगलुरू स्थित एक फार्मा कंपनी में ड्रग साइंटिस्ट हैं. छह वर्षों से कैंसर की दवा पर शोध कर रही हैं. उन्होंने कहा : मेरे लिए मेरा ड्रग मेरी पहाड़ों की यात्रा है. इसने मुझे मजबूत बनाया है. स्कूल के दिनों में ट्रेकिंग का शौक चढ़ा, जिससे पर्वतारोही बनने की प्रेरणा मिली. लेकिन, माउंटेनिंग में उम्र की सीमा है. माउंटेनिंग का कोर्स किया. जब उम्र 20 वर्ष हुई, तो पहली बार एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए निकल पड़ी. 22 मई 2013 को एवरेस्ट के शिखर पर पहुंची. फिर पांच से अधिक पहाड़ों की चढ़ाई पूरी की जिनकी ऊंचाई 8000 मीटर थी. वहीं 05 मई 2022 को कंचनजंघा फतह किया

अस्थमा से लड़ते हुए चढ़ाई पूरी की

सत्यरूप सिद्धांत

पश्चिम बंगाल के सत्यरूप सिद्धांत ने माउंट एवरेस्ट के साथ-साथ सात महाद्वीप के पर्वत शिखर और सात ज्वालामुखी शिखर को फतह करने का रिकॉर्ड बनाया है. उन्होंने कहा : लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में यंगेस्ट माउंटेनर की सूची में दर्ज होने के बाद भी सुकून नहीं मिला है. फिलहाल मैं नॉर्थ पोल एक्सपीडिशन की तैयारी कर रहा हूं. पहाड़ों ने मुझे दूसरा जीवन दिया है. अस्थमा से लड़ते हुए पहाड़ों की चढ़ाई पूरी की. इंजीनियरिंग की पढ़ाई के बाद कुछ साल काम करने के दौरान माउंटेनिंग पैशन बन गया. जब पेशा बाधा बनने लगा, तो नौकरी ही छोड़ दी. 21 मई 2016 में इसी जोश और जुनून के बदौलत एवरेस्ट फतह कर पाया.

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