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वनाधिकार पट्टा पर एक जून से एक माह तक चलेगा जागरूकता अभियान, झारखंड में 28107 दावे खारिज

Updated at : 13 May 2025 7:00 PM (IST)
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Forest Rights Awareness Campaign in Jharkhand

वनाधिकार पट्टा के आवेदन के बारे में जनजातियों को किया जायेगा जागरूक.

Forest Rights News: जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को लिखे पत्र में कहा कि यह अभियान राज्य और जिला स्तर पर जिला एफआरए प्रकोष्ठों और परियोजना प्रबंधन इकाइयों के नेतृत्व में चलाया जाना चाहिए. इसमें एफआरए को लागू करने में अनुभव रखने वाले गैर सरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और समुदाय-आधारित संगठनों के साथ सहयोग करने का आह्वान किया गया.

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Forest Rights News:केंद्र सरकार ने झारखंड समेत सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से कहा है कि वे वनाधिकार कानून यानी वन अधिकार अधिनियम (एफआरए) पर एक महीने तक जागरूकता अभियान चलायें, ताकि लोगों को इसके बारे में जानकारी मिल सके. कानून को लागू करने में सुधार हो और आदिवासी समुदायों एवं अन्य पारंपरिक वनवासियों के बीच व्यापक भागीदारी सुनिश्चित हो सके. सरकार ने एक जून 2025 से एक महीने तक यह अभियान चलाने को कहा है. झारखंड समेत कई राज्यों के द्वारा लाखों वनाधिकार पट्टों के दावों को खारिज किये जाने के बाद यह सलाह दी है.

राज्य और जिला स्तर पर अभियान चलाने का आह्वान

जनजातीय कार्य मंत्रालय ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को लिखे पत्र में कहा कि यह अभियान राज्य और जिला स्तर पर जिला एफआरए प्रकोष्ठों और परियोजना प्रबंधन इकाइयों के नेतृत्व में चलाया जाना चाहिए. इसमें एफआरए को लागू करने में अनुभव रखने वाले गैर सरकारी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों और समुदाय-आधारित संगठनों के साथ सहयोग करने का आह्वान किया गया.

दावा दायर करने की प्रक्रिया पर केंद्रित होगा अभियान

जनजातीय कार्य मंत्रालय के अनुसार, अभियान हितधारकों को उनके व्यक्तिगत और सामुदायिक वन अधिकारों, एफआरए प्रक्रिया में ग्राम सभाओं की भूमिका और दावे दायर करने की प्रक्रियाओं के बारे में जागरूक करने पर ध्यान केंद्रित करेगा. अन्य सुझायी गयी गतिविधियों में एफआरए भूमि अधिकारों (पट्टों) का वितरण, एफआरए लाभार्थियों को मृदा स्वास्थ्य कार्ड और कृषि संबंधी जानकारी प्रदान करना, उनका आधार नामांकन, उन्हें पीएम-किसान जैसी योजनाओं से जोड़ना और लंबित दावों को निपटाने के लिए साप्ताहिक बैठकें आयोजित करना शामिल हैं.

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कई विभागों के साथ समन्वय बनाने की सलाह

मंत्रालय ने राज्य सरकारों से जिला अधिकारियों, कृषि, मत्स्य पालन, पंचायती राज जैसे संबंधित विभागों के साथ समन्वय कर तुरंत योजना बनाने को कहा है. वन अधिकार अधिनियम, 2006, आदिवासियों और वन-आश्रित समुदायों के उस भूमि पर अधिकारों को मान्यता देता है, जिस पर वे पीढ़ियों से रह रहे हैं और जिसकी रक्षा कर रहे हैं. हालांकि, इसके कार्यान्वयन में उल्लंघन के मामले सामने आये हैं. नीति विशेषज्ञों का दावा है कि बड़ी संख्या में दावों को गलत तरीके से खारिज कर दिया गया.

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कोर्ट ने दावों की समीक्षा का 2019 में दिया था निर्देश

वर्ष 2019 में, एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 17 लाख से अधिक ऐसे परिवारों को बेदखल करने का आदेश दिया, जिनके एफआरए दावे खारिज कर दिये गये थे. देशव्यापी विरोध के बाद, अदालत ने फरवरी 2019 में आदेश पर रोक लगा दी और खारिज दावों की समीक्षा का निर्देश दिया. हालांकि, कई आदिवासी और वन-आश्रित समुदायों का आरोप है कि समीक्षा प्रक्रिया त्रुटिपूर्ण रही तथा केंद्र और राज्य सरकारें कानून को ईमानदारी से लागू करने में विफल रहीं.

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51 लाख से अधिक दावे मिले, 1 तिहाई से अधिक खारिज

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष 31 जनवरी तक अधिनियम के तहत 51 लाख से अधिक दावे प्राप्त हुए, जिनमें से एक तिहाई से अधिक दावे खारिज कर दिये गये. सर्वाधिक दावे छत्तीसगढ़ (9.41 लाख) में प्राप्त हुए. उसके बाद ओडिशा (7.20 लाख), तेलंगाना (6.55 लाख), मध्यप्रदेश (6.27 लाख) और महाराष्ट्र (4.09 लाख) का स्थान रहा. छत्तीसगढ़ दावों को खारिज करने में शीर्ष पर है. यहां 4 लाख से अधिक दावे खारिज किये गये. मध्यप्रदेश ने 3.22 लाख से अधिक दावे खारिज किये हैं. महाराष्ट्र ने 1.72 लाख, ओडिशा ने 1.44 लाख और झारखंड ने 28,107 दावों को खारिज किया है.

किस राज्य में कितने दावे आये, कितने हुए खारिज

क्रमराज्य का नामदावे आयेदावे खारिज
1छत्तीसगढ़9.41 लाख4.00 लाख से अधिक
2ओडिशा7.20 लाख1.44 लाख से अधिक
3तेलंगाना6.55 लाखNA
4मध्यप्रदेश6.27 लाख3.22 लाख से अधिक
5महाराष्ट्र4.09 लाख1.72 लाख से अधिक
6.झारखंडNA28,107

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं. उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है. उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवर करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस्ड हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ की भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है. मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) : तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है.

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