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झारखंड : बर्खास्त इंजीनियर राम विनोद सिन्हा की बढ़ी मुश्किलें, तीन से बढ़ाकर की गई सात साल की सजा

Updated at : 06 Jul 2023 1:03 PM (IST)
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खूंटी मनरेगा घोटाला मामले में कोर्ट ने सुना दिया फैसला.

बर्खास्त इंजीनियर राम बिनोद प्रसाद सिन्हा की मुश्किलें और बढ़ गई है. दरअसल, सीजेएम कोर्ट ने मामले में अपनी न्यायिक शक्ति का उपयोग करते हुए अधिकतम सात साल की सजा सुनाई है, जो पहले तीन साल की गई थी. साथ ही एक करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है.

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Jharkhand News: रांची सिविल कोर्ट में दोषी अभियुक्त की सजा बढ़ाने के लिए न्यायिक दंडाधिकारी (जेएम) की अदालत ने सीजेएम को और अधिक कठोर सजा की जरूरत है. इसके बाद सजा बढ़ाने के बिंदु पर लगभग दो महीने तक सीजेएम कोर्ट में सुनवाई हुई. सीजेएम कोर्ट ने मामले में अपनी न्यायिक शक्ति का उपयोग करते हुए अधिकतम सात साल की सजा सुनाई. दरअसल, सरकारी धन का दुरुपयोग मामले में दोषी बर्खास्त इंजीनियर राम विनोद प्रसाद सिन्हा को मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी मिथिलेश कुमार सिंह की अदालत ने सात साल कैद की सजा सुनाई है. साथ ही एक करोड़ रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है. सीजेएम कोर्ट को अधिकतम सात साल तक की सजा सुनाने की शक्ति है. मालूम हओ कि राम विनोद सिन्हा मनी लाउंड्रिंग के आरोप में पिछले ढाई साल से अधिक समय से जेल में है.

क्या है पूरा मामला

ग्रामीण विकास विशेष प्रमंडल, रांची (एनआरईपी-2) की ओर से 24 जून 2011 को जूनियर इंजीनियर राम विनोद प्रसाद सिन्हा के खिलाफ 1.76 करोड़ रुपये सरकारी राशि का गबन के आरोप में कोतवाली थाना (कांड संख्या 242/11) में प्राथमिकी दर्ज कराई गई थी. अभियुक्त राम बिनोद सिन्हा को स्वास्थ्य चिकित्सा एवं परिवार कल्याण विभाग के अधीन तीन योजनाओं के लिए चेक के माध्यम से 1.76 करोड़ रुपये की निकासी कर ली. लेकिन अभियुक्त ने कार्य पूरा नहीं किया और ना ही शेष राशि विभाग को वापस किया.

करोड़ों रुपये की सरकारी राशि के गबन का मामला

सरकारी राशि 1.76 करोड़ रुपये के गबन के 12 साल पुराने मामले में राम विनोद प्रसाद सिन्हा को प्रथम श्रेणी की न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत ने दोषी पाया. लेकिन अदालत ने पाया कि अभियुक्त को तीन साल से अधिक कठोर सजा दी जानी चाहिए. चूंकि प्रथम श्रेणी की न्यायिक दंडाधिकारी की अदालत केवल तीन साल की सजा देने का अधिकार रखती है. जबकि अभियुक्त को धारा 409 में दोषी पाया गया. इसमें अधिकतम सजा आजीवन कारावास है. तब न्यायिक दंडाधिकारी धृति धैर्या की अदालत ने सीआरपीसी की धारा 325 के तहत प्रावधान शक्तियों का प्रयोग करते हुए आगे की सुनवाई के लिए रिकॉर्ड सीजेएम कोर्ट में स्थानांतरित किया.

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