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झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस का पुलिस को निर्देश, कोर्ट कंप्लेन केस में तत्काल दर्ज करें FIR

Updated at : 29 Apr 2023 4:00 AM (IST)
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झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस का पुलिस को निर्देश, कोर्ट कंप्लेन केस में तत्काल दर्ज करें FIR

झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजय कुमार मिश्र ने शुक्रवार को पुलिस से जुड़े तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर समीक्षा बैठक की. इस दौरान डीजीपी अजय कुमार सिंह को कई निर्देश देते हुए कोर्ट कंप्लेन केस में तत्काल प्राथमिकी दर्ज करने को कहा.

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Jharkhand News: झारखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस संजय कुमार मिश्र ने शुक्रवार को पुलिस से जुड़े तीन महत्वपूर्ण बिंदुओं पर समीक्षा बैठक की. चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में हुई इस बैठक में कोर्ट कम्प्लेन केस, अंतिम प्रपत्र और गैरजमानती वारंट पर डीजीपी अजय कुमार सिंह को निर्देश दिये. चीफ जस्टिस ने संहिता की धारा 156(3) के तहत कोर्ट कम्प्लेन केस में समय पर थानों में प्राथमिकी दर्ज कराने को कहा. लंबित केसों का अनुसंधान पूर्ण कर कोर्ट में अंतिम प्रपत्र समय पर जमा कराने का भी निर्देश उन्होंने दिया. वहीं, गैरजमानती वारंट का निष्पादन समय पर सुनिश्चित कराने का भी आदेश दिया. बैठक में डीजीपी के अलावा सीआइडी के आइजी असीम विक्रांत मिंज भी शामिल हुए.

डीजीपी ने सभी पुलिस अधिकारियों को दिया निर्देश

हाईकोर्ट में हुई बैठक के बाद पुलिस मुख्यालय लौटने पर डीजीपी ने सभी प्रक्षेत्र आईजी, रेंज डीआईजी और जिलों के एसएसपी एवं एसपी को तीनों बिंदुओं का तामिला समय पर किये जाना सुनिश्चित कराने का निर्देश दिया. वहीं, जिलों में तीनों बिंदुओं पर क्या कार्रवाई की जा रही है, इसकी मॉनिटरिंग के लिए सीआइडी को भी डीजीपी ने निर्देश दिया है. पुलिस से जुड़े मामलों की समीक्षा हाइकोर्ट के चीफ जस्टिस के स्तर पर संभवत: पहली बार की गयी है. इससे पुलिस के कार्यशैली में सुधार और केसों के निष्पादन में तेजी आने की उम्मीद है.

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क्या है दंड संहिता की धारा 156 (3)

कानून के जानकार बताते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में माना है कि एक न्यायिक मजिस्ट्रेट का कर्तव्य है कि वह दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 156 (3) के तहत पुलिस जांच का आदेश दे, जब शिकायत प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध को दर्शाती हो और तथ्य पुलिस जांच की आवश्यकता को इंगित करता हो. दिलावर सिंह बनाम दिल्ली राज्य (2007) के मामले में न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि अगर एक प्राथमिकी दर्ज की गयी है और पुलिस ने एक जांच की है, लेकिन पीड़ित व्यक्ति उसको संतोषजनक नहीं पाता है, तो वह व्यक्ति भी कोर्ट में प्रोटेस्ट पिटीशन फाइल कर सकता है. यदि मजिस्ट्रेट इससे संतुष्ट होते हैं, तो वे उचित जांच का आदेश दे सकते हैं और अन्य उचित कार्रवाई कर सकते हैं.

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