खुलासा : विक्रय मूल्य पर वैट लगाने का है प्रावधान
वैट को बढ़ा कर 22 प्रतिशत किया गया था
रांची : राज्य सरकार ने पेट्रोल-डीजल पर एक रुपये प्रति लीटर की दर से ‘सेस’ लगाया है. हालांकि उपभोक्ताओं से वास्तव में 1.22 रुपये प्रति लीटर की दर से वसूली हो रही है. 22 पैसे प्रति लीटर की दर से अधिक वसूली का कारण वैट अधिनियम में ‘ सेल प्राइस’ या विक्रय मूल्य की तय परिभाषा है.
वाणिज्यकर विभाग ने 24 फरवरी 2015 को अधिसूचना जारी कर डीजल-पेट्रोल पर लगनेवाले वैट को बढ़ा कर 22 प्रतिशत कर दिया. साथ ही डीजल और पेट्रोल पर एक रुपये प्रति लीटर की दर से ‘सेस’ लगाया. वैट अधिनियम के प्रावधानों के तहत डीजल और पेट्रोल के विक्रय मूल्य पर वैट लगाने का प्रावधान है. विक्रय मूल्य का निर्धारण तेल कंपनियों द्वारा डिपो में डीजल-पेट्रोल के मूल्य के साथ एक्साइज डय़ूटी और सेस को जोड़ कर किया जाता है.
इस विक्रय मूल्य पर 22 प्रतिशत की दर से वैट लगता है.इस तरह एक रुपये के सेस पर भी 22 प्रतिशत वैट लग जाता है और सेस के रूप में एक रुपये के बदले जनता से 1.22 रुपये प्रति लीटर की दर से वसूली होती है. वैट की रकम जोड़ने के बाद निर्धारित विक्रय मूल्य पर डीलर ट्रांसपोर्टेशन और डीलर कमीशन जोड़ कर उपभोक्ताओं के लिए पेट्रोल-डीजल का मूल्य निर्धारित किया जाता है. अगर राज्य सरकार द्वारा लगाये गये सेस को ट्रांसपोर्टेशन और डीलर कमीशन की तरह वैट लगाने के बाद जोड़ा जाये तो जनता को प्रति लीटर 22 पैसे की राहत मिलेगी. अर्थात पेट्रोल 62.06 रुपये के बदले 61.84 रुपये प्रति लीटर की दर पर मिलेगा. इसी तरह डीजल 54.81 रुपये के बदले 54.59 रुपये प्रति लीटर की दर पर मिलेगा.
सड़क के नाम पर तीन बार वसूला जाता है टैक्स
राज्य में सड़क के नाम पर दो बार राज्य सरकार और एक बार निजी कंपनियां टैक्स वसूलती हैं. वाहन मालिकों से वाहनों के निबंधन के समय ही सरकार 15 साल के लिए एक मुश्त रोड टैक्स ले लेती है. टैक्स की यह रकम बेहतर सड़क के नाम पर वसूली जाती है. 24 फरवरी 2015 को सरकार ने झारखंड रोड डेवलपमेंट टैक्स एक्ट 2011 की धारा तीन में निहित प्रावधानों के तहत डीजल और पेट्रोल पर एक रुपये की दर से ‘सेस’ लगाया है.
अधिनियम में निहित प्रावधानों के तहत ‘सेस’ में रूप में वसूली जानेवाली इस राशि का इस्तेमाल भी राज्य में बेहतर सड़क के लिए की जानी है. इस तरह सड़क के नाम पर सरकार दो बार टैक्स वसूल रही है. हालांकि सरकार अब खुद सड़क बनाने के बदले पीपीपी मोड पर निजी कंपनियों को काम दे रही है. निजी कंपनियां सड़क बनाने के बाद टोल टैक्स की वसूली कर रही हैं. इस तरह आम नागरिकों को राज्य में सड़क के लिए तीन बार टैक्स का भुगतान करना पड़ रहा है.
