रांची : कैश का जलवा, बूथ मैनेजमेंट में खर्च करोड़ पार

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आनंद मोहन संसदीय क्षेत्र में औसतन दो हजार हैं बूथ, हर बूथ पर औसतन खर्च पांच हजार रांची : आम चुनाव में प्रत्याशियों को पानी की तरह पैसे बहाने पड़ रहे है़ं चुनाव दिनोंदिन महंगा हो रहा है और कैश का जलवा बढ़ा है़ बूथ प्रबंधन में प्रत्याशियाें (सभी नहीं)को करोड़ों खर्च करने पड़ रहे […]

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आनंद मोहन

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संसदीय क्षेत्र में औसतन दो हजार हैं बूथ, हर बूथ पर औसतन खर्च पांच हजार

रांची : आम चुनाव में प्रत्याशियों को पानी की तरह पैसे बहाने पड़ रहे है़ं चुनाव दिनोंदिन महंगा हो रहा है और कैश का जलवा बढ़ा है़ बूथ प्रबंधन में प्रत्याशियाें (सभी नहीं)को करोड़ों खर्च करने पड़ रहे है़ं एक बूथ में कैडरों व समर्थकों को बैठाने में हजारों का हिसाब-किताब है़

एक संसदीय क्षेत्र में 18 सौ से लेकर 22सौ बूथ होते है़ं झारखंड में एक संसदीय क्षेत्र में औसतन दो हजार बूथ है़ं एक बूथ के प्रबंधन में प्रत्याशियों को लगभग पांच हजार रुपये खर्च करने पड़ रहे है़ं यह राशि किसी खास बूथ पर घट-बढ़ सकती है़ ग्रामीण इलाके में प्रत्याशी थोड़ा कम में काम चला रहे हैं, पर शहरी क्षेत्रों में डिमांड ज्यादा की होती है़

ग्रामीण क्षेत्रों में कम खर्चे पर काम चला रही हैं पार्टियां, तो शहरी इलाके में भारी है डिमांड

बूथ में पांच से 10 लोगों को बैठा रही हैं पार्टियां

बेहतर बूथ प्रबंधन करना हर प्रत्याशी की प्राथमिकता होती है़ जिन क्षेत्रों में पार्टियां या प्रत्याशी की पकड़ मजबूत रहती है, उस क्षेत्र के बूथों पर विशेष ध्यान रहता है़

एक बूथ पर पार्टियां पांच से दस लोगाें को बैठाती है़ं चुनाव से पहले एक-एक बूथ पर बैठने वालों का नाम तय होता है़ इनको बूथ का खर्च दिया जाता है़ खास क्षेत्र में सक्रिय नेताओं व कार्यकर्ताओं को बूथ बांटने की जवाबदेही होती है़

ऐसे समझे बूथ मैनेजमेंट का कैश फैक्टर

3000 से 5000

खाने-पीने और जरूरत के हिसाब से टेंट आदि पर खर्च

(इन सारे खर्च को औसत खर्च के रूप में 5000 माना गया है, यह राशि बूथ वार बढ़ घट सकती है)

1500 से 3000

कई बूथों पर वोटरों को लाने और ले

जाने का भी खर्च मांगते हैं, यह अतिरिक्त खर्च है

हार्ड बार्गेन करते हैं संगठन से जुड़े नेता

संगठन से जुड़े नेता व कार्यकर्ता भी चुनाव के वक्त प्रत्याशियों से हार्ड बार्गेन करते है़ं वर्षों तक संगठन से जुड़े लोग भी बूथ मैनेज करने के नाम पर प्रत्याशी के सामने पैसे का रोना रोते है़ं बिना पैसे के काम करने के लिए कार्यकर्ता (सभी नहीं) भी तैयार नहीं होते है़ं पार्टियों से जुड़े सहयोगी संगठन के कार्यकर्ताओं भी चुनाव लगते हैं, इनका डिमांड अलग होता है़

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