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रांची : सज गया राजनीतिक दरबार, ज्यादा सीटों पर आमने-सामने होंगे एनडीए-यूपीए के प्रत्याशी

Updated at : 14 Apr 2019 8:07 AM (IST)
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रांची : सज गया राजनीतिक दरबार, ज्यादा सीटों पर आमने-सामने होंगे एनडीए-यूपीए के प्रत्याशी

मनोज सिंह चार चरण में होंगे चुनाव, पहला चरण 29 अप्रैल को जबकि अंतिम चरण 19 मई को होगा रांची : झारखंड में लोकसभा की 14 सीटों पर चार चरण में चुनाव होने हैं. 29 अप्रैल को पहले चरण में तीन सीटों पर मतदान होना है.वहीं, अंतिम चरण का मतदान 19 मई को संताल परगना […]

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मनोज सिंह
चार चरण में होंगे चुनाव, पहला चरण 29 अप्रैल को जबकि अंतिम चरण 19 मई को होगा
रांची : झारखंड में लोकसभा की 14 सीटों पर चार चरण में चुनाव होने हैं. 29 अप्रैल को पहले चरण में तीन सीटों पर मतदान होना है.वहीं, अंतिम चरण का मतदान 19 मई को संताल परगना की तीन सीटों पर होगा. एक सीट हजारीबाग को छोड़ शेष सीटों पर प्रमुख पार्टियों ने प्रत्याशियों की घोषणा कर दी है. ज्यादातर सीटों पर एनडीए और यूपीए गठबंधन में आमने-सामने की टक्कर है. चतरा में महागठबंधन दरकने के कारण स्थिति अलग है. कहीं-कहीं बागी प्रत्याशी प्रमुख पार्टियों के लिए परेशानी का कारण बन सकते हैं. प्रभात खबर राज्य की सभी 14 सीटों की वर्तमान राजनीतिक स्थिति का आकलन पेश कर रहा है.
पलामू (एससी)
पलामू लोकसभा क्षेत्र अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. इस सीट पर महागठबंधन ने पूर्व सांसद राजद के घूरन राम को प्रत्याशी बनाया है.
इस सीट पर घूरन राम का सीधा टक्कर भाजपा के वर्तमान सांसद सह पूर्व डीजीपी वीडी राम से है. वीडी राम लगातार दूसरी बार इस सीट पर जीतने में लगे हैं. वहीं, महागठबंधन से टिकट की दावेदारी कर रहे कामेश्वर बैठा, घूरन राम के लिए चुनौती हैं. श्री बैठा सार्वजनिक मंच से अपने लिए टिकट मांग चुके थे. वहीं वीडी राम की चुनौती क्षेत्र के पार्टी के ही कई विधायक हैं, जो सार्वजनिक तौर पर तो विरोध नहीं करेंगे, लेकिन भीतरघात की संभावना से इंकार भी नहीं किया जा सकता है.
चतरा
चतरा लोकसभा सीट में महागठबंधन दरक गया है. यहां त्रिकोणीय संघर्ष की स्थिति बनी हुई है. काफी दावे के बाद भी राजद ने यहां प्रत्याशी उतार दिया है.
कांग्रेस की मनाने की हर कोशिश बेकार गयी है. यहां भाजपा ने वर्तमान सांसद सुनील कुमार सिंह को टिकट दिया है. वहीं, कांग्रेस से विधायक मनोज यादव और राजद से सुभाष यादव प्रत्याशी हैं. श्री सिंह को टिकट तो जरूर मिला है, लेकिन वह खुद क्षेत्र में समय नहीं दे पाने के लिए जनता से सार्वजनिक तौर पर माफी मांग चुके हैं.
लेकिन जनता कितना माफ करती है, यह तो चुनाव परिणाम ही बतायेगा. चुनाव से ठीक पूर्व भाजपा ने नीलम देवी को पार्टी में योगदान कराया था. वह भी सीट पर दावेदारी पेश कर रही थीं. वहीं, मनोज यादव और सुभाष यादव दोनों की नजर महागठबंधन के वोट पर होगी. इस वोट बिखराव से भाजपा जीत का रास्ता बनाने की कोशिश करेगी.
लोहरदगा (एसटी)
लोहरदगा सीट से कांग्रेस ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सह विधायक सुखदेव भगत पर विश्वास जताया है. महागठबंधन में यह सीट कांग्रेस को मिली है. कांग्रेस से इनके अतिरिक्त दो पूर्व आइपीएस अधिकारी भी दावेदारी कर रहे थे. राज्य प्रशासनिक सेवा से राजनीति में आये श्री भगत दोनों पर भारी पड़ गये. पार्टी के विश्वास पर खरा उतरने की चुनौती उन पर है.
इनके लिए सबसे अच्छी बात यह है कि इस बार चमरा लिंडा मैदान में नहीं है. चमरा को मिले मतों को वह अपनी ओर करने की कोशिश करेंगे. वहीं, भाजपा ने मंत्री सुदर्शन भगत को टिकट दिया है. श्री भगत को चमरा के विश्वासघात से ज्यादा उम्मीद है. पिछली बार जीत का मार्जिन राज्य में सबसे कम इसी सीट पर था. इस कारण थोड़ा सा भी मतों का अंतर सीट की कहानी बदल सकती है.
रांची
रांची संसदीय सीट पर महागठबंधन के प्रत्याशी सुबोधकांत सहाय और एनडीए के संजय सेठ हैं. श्री सहाय इस सीट का तीन बार नेतृत्व कर चुके हैं. वहीं, सेठ चुनावी राजनीति में नये हैं. वह खादी ग्रामोद्योग बोर्ड में अध्यक्ष थे. श्री सहाय की ताकत पुरानी चुनावी रणनीति है. वह 1977 से राजनीति में है. वहीं श्री सेठ को अपने कैडरों पर उम्मीद है.
कैडरों के कारण ही पिछले चुनाव में भाजपा इस सीट से एक लाख 90 हजार से अधिक मतों से जीती थी. उस वक्त भाजपा के प्रत्याशी रामटहल चौधरी थे. श्री चौधरी को भाजपा ने टिकट नहीं दिया है. लिहाजा उन्होंने बागी होकर निर्दलीय चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है. पांच बार रांची का नेतृत्व कर चुके श्री चौधरी भाजपा के लिए चुनौती हो सकते हैं. उन्हें उम्मीद है कि जनता के लिए किये गये काम का सहारा उनको मिलेगा.
खूंटी (एसटी)
खूंटी संसदीय सीट से पहली बार कोई पूर्व मुख्यमंत्री किस्मत आजमा रहा है. भाजपा के अर्जुन मुंडा के सामने कालीचरण मुंडा की चुनौती है. टी मुचिराय मुंडा के पुत्र कालीचरण मुंडा का राजनीतिक बैकग्राउंड रहा है.
वह इस क्षेत्र के विधायक भी रहे हैं. पिता भी विधायक थे. कालीचरण मुंडा इस क्षेत्र से पुराने परिचित हैं. उन्हें कांग्रेस ने टिकट दिया है. वहीं, अर्जुन मुंडा खूंटी की राजनीति के लिए नये हैं. वैसे खूंटी से आठ बार सांसद रहे कड़िया मुंडा के आशीर्वाद को ताकत के रूप में देख रहे हैं. खूंटी संसदीय क्षेत्र का एक विधानसभा खरसावां अर्जुन मुंडा का राजनीतिक कार्यक्षेत्र रहा है. इसका फायदा उनको मिल सकता है.
जमशेदपुर
जमशेदपुर में भाजपा ने वर्तमान सांसद विद्युत वरण महतो पर ही विश्वास किया है. श्री महतो झामुमो के कैडर थे. 2014 में भाजपा की ओर से चुनाव लड़े और भारी मतों से जीते थे. इस बार महागठबंधन में यह सीट झामुमो को मिला है.
झामुमो ने कोल्हान टाइगर कहे जाने वाले विधायक चंपई सोरेन को उम्मीदवार बनाया है. कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ अजय कुमार इस सीट का नेतृत्व कर चुके हैं. इस कारण झामुमो की नजर कांग्रेसी और झाविमो कार्यकर्ताओं पर भी है. श्री सोरेन महागठबंधन के वोट के बिखराव को रोकने की कोशिश करेंगे. वहीं, श्री महतो को उम्मीद पिछले लोकसभा चुनाव के मार्जिन की है. पार्टी को उम्मीद है कि जीत का मार्जिन और बढ़ेगा.
सिंहभूम (एसटी)
सिंहभूम लोकसभा सीट पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मण गिलुवा के सामने कांग्रेस की विधायक गीता कोड़ा हैं. पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा की पत्नी गीता कोड़ा ने हाल ही में कांग्रेस ज्वाइन किया है. वह पिछले चुनाव में दूसरे नंबर पर थीं. इस सीट पर पूर्व में मधु कोड़ा जीत चुके हैं. दोनों की निजी पकड़ का फायदा कांग्रेस ने उठाया है. वह महागठबंधन की मजबूत प्रत्याशी हैं. वहीं, एनडीए के उम्मीदवार लक्ष्मण गिलुवा हैं.
वह राष्ट्रीय छवि का फायदा लेने की कोशिश करेंगे. राज्य में भाजपा इनके नेतृत्व में ही चुनाव लड़ रही है. इस कारण गिलुवा का राजनीतिक कद गीता से बड़ा है. गीता की चुनौती झामुमो के विधायकों का समर्थन प्राप्त करना है. झामुमो के कई विधायक इस ससंदीय क्षेत्र से आते हैं. गीता कोड़ा को राह आसान करने के लिए झामुमो विधायकों को अपनी ओर करना होगा.
धनबाद
धनबाद से कांग्रेस ने इस बार महागठबंधन प्रत्याशी के रूप में पूर्व मुख्यमंत्री भागवत झा आजाद के पुत्र कीर्ति झा आजाद को उतारा है. क्रिकेट के महारथी रहे कीर्ति बिहार की राजनीति करते रहे हैं. भाजपा से मनमुटाव के बाद कांग्रेस में आ गये हैं. धनबाद को अपना पुराना घर बता रहे हैं. उनके सामने भाजपा के पीएन सिंह हैं. 2014 के चुनाव में पूरे राज्य में सबसे अधिक मत से पीएन सिंह जीते थे. पिछले चुनाव का मतों का अंतर किसी भी विपक्षी प्रत्याशी के लिए बड़ा कारण है.
बाहर से आकर धनबाद में अपनी किस्मत आजमाने वाले श्री झा की चुनौती यहां के पूर्व कांग्रेसी हैं. जो टिकट की दावेदारी कर रहे थे. इससे निबटने और पीएन सिंह को कमजोर करने की रणनीति महत्वपूर्ण होगी. श्री सिंह की चुनौती अपनी पार्टी से ही है. टिकट की आस में लगे भाजपा उम्मीदवारों को चुनाव के दौरान सक्रिय करना उनकी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी होगी.
गिरिडीह
गिरिडीह संसदीय क्षेत्र से कई बार सांसद रहे रवींद्र पांडेय इस बार भाजपा से चुनाव नहीं लड़ेंगे. यह सीट एनडीए ने आजसू को दे दिया है. आजसू के प्रत्याशी राज्य के मंत्री चंद्रप्रकाश चौधरी हैं. उनके लिए सबसे बड़ी चुनौती रवींद्र पांडेय ही हैं. श्री पांडेय ने अपना पत्ता नहीं खोला है. वह चुनाव लड़ेंगे या नहीं अब तक स्पष्ट नहीं किया है. महतो और कुरमी बाहुल्य इस ससंदीय क्षेत्र में महागठबंधन के उम्मीदवार जगन्नाथ महतो हैं.
झामुमो विधायक श्री महतो ने 2014 के चुनाव में रवींद्र पांडेय को टक्कर दिया था. श्री महतो अपनी छवि और कांग्रेस के भरोसे मैदान में हैं. कांग्रेस के दिग्गज नेता राजेंद्र सिंह से समर्थन की उम्मीद में हैं. श्री महतो कोशिश कर रहे हैं विपक्षी दलों के वोटों का बिखराव नहीं हो. वहीं, आजसू की कोशिश है कि एनडीए को पिछली बार से ज्यादा लोगों का समर्थन मिल जाये. इसी के रास्ते राज्य के मंत्री दिल्ली पहुंचना चाह रहे हैं.
हजारीबाग
हजारीबाग से एनडीए के उम्मीदवार केंद्र सरकार के मंत्री जयंत सिन्हा हैं. वह हजारीबाग में किये गये काम के भरोसे मैदान में हैं. वहीं, इस सीट पर महागठबंधन ने अब तक अपना प्रत्याशी नहीं दिया है. यहां नामांकन की प्रक्रिया भी चल रही है. 16 अप्रैल को पूर्व सांसद भुवनेश्वर प्रसाद मेहता नामांकन करेंगे. श्री मेहता कांग्रेस से यह सीट छोड़ने का आग्रह कर रहे हैं.
जयंत सिन्हा क्षेत्र का दौरा कर रहे हैं, वहीं कांग्रेस अब तक प्रत्याशी तय नहीं कर पायी है. पिछली बार पूर्व विधायक सौरभ नारायण सिन्हा चुनाव लड़े थे. जयंत सिन्हा पर विपक्षी क्षेत्र के विकास पर ध्यान नहीं लगाने का आरोप लगा रहे हैं. श्री सिन्हा की नजर रामगढ़ सीट पर भी है. यहां से चंद्र प्रकाश चौधरी विधायक हैं. एनडीए का घटक दल होने का फायदा वह रामगढ़ से लेना चाह रहे हैं.
कोडरमा
कोडरमा सीट से भाजपा ने किसी पुराने कार्यकर्ता को टिकट नहीं दिया है. राजद की प्रदेश अध्यक्ष और राज्य सरकार में मंत्री रहीं अन्नपूर्णा देवी भाजपा की उम्मीदवार हैं. इस सीट पर त्रिकोणीय संघर्ष के आसार हैं.
इनके सामने पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी और माले के विधायक राजकुमार यादव हैं. भाजपा त्रिकोणीय संघर्ष का फायदा उठाना चाह रही है. भाजपा की परेशानी कार्यकर्ताओं को एकजुट करना है. भीतरघात करनेवालों पर भी भाजपा की नजर रहेगी. यहां इसकी संभावना भी बहुत है. बाबूलाल मरांडी यहां से सांसद रह चुके हैं.
इनका गृह क्षेत्र भी इसी संसदीय क्षेत्र में पड़ता है. अपनी राजनीतिक छवि का लाभ उठाने और महागठबंधन का फायदा लेने की कोशिश करेंगे. वहीं, राजकुमार यादव पूर्व में मिले मतों में कुछ और वोट जीतकर दिल्ली जाने की कोशिश में लगे हैं. श्री यादव का यहां हर चुनाव में वोट बढ़ रहा है.
दुमका (एसटी)
दुमका सुरक्षित संसदीय सीट पर शिबू सोरेन फिर से चुनावी मैदान में हैं. महागठबंधन के प्रत्याशी के रूप में श्री सोरेन अपनी जुझारू छवि को लेकर मैदान में हैं. इनके सामने एक बार फिर युवा सुनील सोरेन हैं.
उन पर भाजपा पिछले तीन चुनाव से दांव खेल रही है. लेकिन, श्री सोरेन के कद के सामने भाजपा छोटी पड़ती रही है. इसमें एक बात महत्वपूर्ण है कि सुनील सोरेन हार के अंतर को कम करते जा रहे हैं. इस बार इस अंतर को पाट कर जीतने का प्रयास कर रहे हैं. मोदी और अपनी राजनीतिक संघर्ष को अंजाम तक पहुंचाने में लगे हुए हैं. संताल परगना की यह महत्वपूर्ण सीट मोदी लहर में भी झामुमो के पास रहा था.
राजमहल (एसटी)
राजमहल सीट पर महागठबंधन के प्रत्याशी विजय हांसदा के सामने एक बार फिर भाजपा के हेमलाल मुर्मू हैं. हेमलाल की राजनीतिक उपज झारखंड मुक्ति मोरचा की रही है. वह कुछ साल पहले भाजपा में आये हैं. झामुमो से सांसद थे. राज्य में मंत्री भी रहे हैं. उनकी गिनती संताल के कद्दावर नेताओं में होती है.
कभी शिबू सोरेन के करीबी रहे श्री मुर्मू को पिछली बार विजय ने हराया था. उनके पिता थॉमस हांसदा कांग्रेस से सांसद हुआ करते थे. युवा विजय के सामने चुनौती हेमलाल मुर्मू का राजनीतिक अनुभव है. वह एंटी इनकमबैंसी फैक्टर का लाभ उठाना चाह रहे हैं. वहीं विजय हांसदा संताल परगना में झामुमो की पकड़ और पिछले पांच साल के कार्यकाल को रास्ता बनाकर फिर दिल्ली दरबार में जाना चाह रहे हैं.
गोड्डा
गोड्डा सीट महागठबंधन के समझौते में झारखंड विकास मोर्चा के पास गया है. झाविमो ने पूर्व सांसद सह वर्तमान विधायक प्रदीप यादव को प्रत्याशी बनाया है. उनके लिए चुनौती पूर्व सांसद फुरकान अंसारी हैं, जो अभी तक विरोध कर रहे हैं. उनको मनाने का प्रयास किया जा रहा है. एक भी अल्पसंख्यक प्रत्याशी नहीं उतारे जाने की बात कह रहे हैं.
श्री यादव के सामने भीतरघात की चुनौती है. वहीं भाजपा के प्रत्याशी वर्तमान सांसद निशिकांत दुबे हैं. निशिकांत ने अपने कार्यकाल में अपने संसदीय क्षेत्र में कई काम किये हैं. एम्स, अडाणी, एयरपोर्ट आदि कई बड़े प्रोजेक्ट लाने का श्रेय उनके पास है. निशिकांत विकास कार्यों के भरोसे जनता के पास जा रहे हैं. अधूरे पड़े प्रोजेक्ट को पूरा करने और कई नये बड़े प्रोजेक्ट के आश्वासन के साथ जनता के बीच में हैं.
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