जब जॉर्ज ने कहा आप मेरे मालिक को गाली नहीं दे सकते, जनता मालिक है
Updated at : 30 Jan 2019 7:15 AM (IST)
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सपन कुमार महथा बात उन दिनों की है, जब मेरी पोस्टिंग नालंदा जिला में थी. जॉर्ज फर्नांडिस नालंदा से सांसद थे और रक्षा मंत्री बने. उन्होंने सरकार से अपने लिए किसी भी तरह का सुरक्षा लेने से मना कर दिया, क्योंकि नालंदा से सांसद होने के नाते महीने में दो-तीन प्रोग्राम जिला में हो जाया […]
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सपन कुमार महथा
बात उन दिनों की है, जब मेरी पोस्टिंग नालंदा जिला में थी. जॉर्ज फर्नांडिस नालंदा से सांसद थे और रक्षा मंत्री बने. उन्होंने सरकार से अपने लिए किसी भी तरह का सुरक्षा लेने से मना कर दिया, क्योंकि नालंदा से सांसद होने के नाते महीने में दो-तीन प्रोग्राम जिला में हो जाया करता था.
जिला प्रशासन द्वारा मुझे जॉर्ज साहब के नालंदा भ्रमण के दौरान स्थायी रूप से उनका सुरक्षा अधिकारी के रूप में प्रतिनियुक्त कर दिया. वह जब भी नालंदा आते थे, तो मैं ही उनको रिसीव करता था. उनके पास एक पुरानी एंबेसडर कार थी. मैं और उनका पीएस राजीव गौबा उसी गाड़ी में ड्राइवर के बगल में बैठते थे और पीछे जॉर्ज साहब अपने कार्यकर्ताओं के साथ. उनके आगे-पीछे गाड़ी का काफिला नहीं हुआ करता था. इतने बड़े नेता और काबीना मंत्री का सुरक्षा अधिकारी अकेला होने के नाते मैं थोड़ा बहुत तनाव में भी रहा करता था.
इसी बीच एक घटना मेरे जिंदगी में घटी, जो सीख बन गयी. वह घटना है बिहार शरीफ की. वहां बाजार में हमलोग गाड़ी से भ्रमण कर रहे थे, तभी आगे एक साइकिल वाला ड्राइवर के बार-बार हॉर्न बजाने के बावजूद रास्ता नहीं छोड़ रहा था. मैंने कार के दरवाजे को खोल कर पुलिस की प्रचलित भाषा में गाली देने की भूल कर दी. जॉर्ज साहब ने तुरंत मेरे पीठ पर हाथ रखा और ड्राइवर से कहा कि गाड़ी साइड में करो और गाड़ी रोक दी गयी.
उसके बाद जॉर्ज साहब ने पांच मिनट तक मुझे समझाया कि आपने जिसको गाली दी, वह मेरा मालिक है. मैं उसका सेवक हूं. अब बताएं आप मेरे मालिक को गाली देंगे तो मेरी सुरक्षा कैसे करेंगे? उस घटना और उनके विचार से मैं उनकी महान शख्सियत का कायल हो गया और उनसे और भी घनिष्ठता बढ़ गयी. आज यह महान शख्स हमारे बीच नहीं हैं. यह भारतीय लोकतंत्र और समाजवादी विचारधारा के लिए बड़ी क्षति है.
लेखक गोंदा (रांची) थाना के प्रभारी हैं और नालंदा जिले में तत्कालीन रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस के सुरक्षा अधिकारी थे.
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