शिबू सोरेन के छोटे भाई लालू का निधन, गुरुजी के साथ कंधे से कंधा मिला कर किया था आंदोलन
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 27 Nov 2018 7:18 AM
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राजनीतिक नफा-नुकसान की परवाह नहीं करते थे लालू सोरेन आंदोलनों में गुरुजी के साथ निभायी थी लक्ष्मण जैसी भूमिका, शिबू सोरेन परिवार के इकलौते सदस्य, जिन्होंने झामुमो छोड़ अपना ली अलग राह कसमार/रांची : लालू सोरेन की सियासत के निराले अंदाज थे. वह मुखर थे़. शोषित-पीड़ितों के पक्ष में लड़ना जानते थे. छल-प्रपंच और सत्ता […]
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राजनीतिक नफा-नुकसान की परवाह नहीं करते थे लालू सोरेन
आंदोलनों में गुरुजी के साथ निभायी थी लक्ष्मण जैसी भूमिका, शिबू सोरेन परिवार के इकलौते सदस्य, जिन्होंने झामुमो छोड़ अपना ली अलग राह
कसमार/रांची : लालू सोरेन की सियासत के निराले अंदाज थे. वह मुखर थे़. शोषित-पीड़ितों के पक्ष में लड़ना जानते थे. छल-प्रपंच और सत्ता की राजनीति से बहुत दूर रहे. राजनीतिक नफा-नुकसान की परवाह किये बिना सच को बेबाक बोलने और अलग राह चुनने-चलने की क्षमता रखते थे.
दिशोम गुरु शिबू सोरेन के परिवार में वह इकलौते ऐसे सदस्य रहे, जो गुरुजी और उनकी पार्टी से बगावत कर राजनीति की अलग राह पर चल पड़े. लालूजी को जब लगा कि झामुमो में उनकी नहीं सुनी जा रही और वह इस पार्टी में रह कर झारखंडी अरमानों के अनुरूप राजनीति नहीं कर सकते, तो एक झटके में खुद पार्टी से किनारे हो गये.
गुरुजी के साथ कंधे से कंधा मिला कर किया था आंदोलन
27 नवंबर 1957 को अपने पिता सोबरन मांझी की हत्या के पहले लालू सोरेन अपने बड़े भाई शिबू सोरेन के साथ गोला के छात्रावास में रह कर पढ़ाई करते थे. अन्य भाई भी साथ थे. पिता की हत्या के बाद उनका परिवार टूट गया. हाल के वर्षों में लालूजी का गुरुजी व परिवार के अन्य सदस्यों के साथ भले मतभेद हो गया हो, लेकिन सच्चाई यह भी है कि लालूजी ने गुरुजी का साथ शुरुआती दिनों से ही दिया़
आंदोलनों में गुरुजी के साथ लक्ष्मण जैसी भूमिका निभायी़ पिता की हत्या के करीब चार साल बाद 1961 में जब शिबू सोरेन ने कसमार प्रखंड के केदला गांव की ओर रुख किया, तो लालूजी भी महज 12 साल की उम्र में ही उनके साथ निकल पड़े. दोनों भाई काफी दिनों तक यहां रहे और खुद को आंदोलन के लिए तैयार किया. साठ के दशक में शिबू सोरेन ने जब महाजनों के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया, तब इस आंदोलन को मुकाम तक पहुंचाने में लालूजी की भी अहम भूमिका रही.
इस लड़ाई में लालूजी को कई बार विषम परिस्थितियों का सामना भी करना पड़ा़ बताया जाता है कि वर्ष 1972-73 में महाजनी आंदोलन के दौरान बगोदर में महाजनों ने इन्हें तीन दिनों तक बंधक बना लिया था़ इसकी जानकारी मिलने के बाद करीब 10 हजार आदिवासी जुटे और लालूजी को छुड़ाया. झारखंड आंदोलन में भी लालू सोरेन की अग्रणी भूमिका रही है़ बंदी से लेकर नाकेबंदी तक को सफल बनाने के लिए लालू ने आंदोलनों का नेतृत्व किया़ इस दौरान उन्हें जेल भी जाना पड़ा़
अपने पीछे तीन पुत्र छोड़ गये लालू सोरेन
लालू सोरेन का जन्म 28 जनवरी 1949 को हुआ था. वह पांच भाइयों में चौथे नंबर पर थे. इनकी शादी पश्चिम बंगाल के पुरूलिया जिला स्थित बलरामपुर में सरस्वती सोरेन के साथ हुई थी. इनके तीन पुत्र हुए. बड़े पुत्र का नाम नित्यानंद सोरेन, मंझले का परामनंद साेरेन व छोटे पुत्र का नाम दयानंद सोरेन है.
शिबू के भाई के निधन पर बाबूलाल ने जताया शोक
रांची : झामुमो सुप्रीमो शिबू सोरेन के छोटे भाई लालू सोरेन के आकस्मिक निधन पर झाविमो अध्यक्ष व पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने शोक जताया है. श्री मरांडी ने कहा है कि राज्य को इनकी कमी सदैव खलेगी. झारखंड अलग राज्य के आंदोलन में लालू सोरेन की भूमिका अग्रणी रही है. झारखंड अलग राज्य गठन को लेकर इनके द्वारा किये गये लंबे संघर्ष को कभी भुलाया नहीं जा सकता है. बगैर किसी संवैधानिक पद पर होने के बावजूद इनका पूरा जीवन झारखंडी हित को लेकर आंदोलनरत व समर्पित रहा.
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