रांची : बिरसा कृषि विवि में प्रसार व अनुसंधान में तालमेल नहीं
Updated at : 09 Jul 2018 8:27 AM (IST)
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मनोज सिंह रांची : बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में प्रसार और अनुसंधान में तालमेल नहीं है. इस कारण संस्थान में हो रहे कार्यों का सीधा फायदा किसानों को पूरी तरह नहीं मिल रहा है. बीएयू ने इस कमी को दूर करने के लिए एक टीम से संस्थान के प्रसार और अनुसंधान के कार्यों का अध्ययन कराया. […]
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मनोज सिंह
रांची : बिरसा कृषि विश्वविद्यालय में प्रसार और अनुसंधान में तालमेल नहीं है. इस कारण संस्थान में हो रहे कार्यों का सीधा फायदा किसानों को पूरी तरह नहीं मिल रहा है.
बीएयू ने इस कमी को दूर करने के लिए एक टीम से संस्थान के प्रसार और अनुसंधान के कार्यों का अध्ययन कराया. संस्थान के पूर्व निदेशक अनुसंधान डॉ बीएन सिंह, रांची वेटनरी कॉलेज के पूर्व डीन डॉ संत कुमार सिंह व निदेशक प्रसार डॉ जे उरांव के नेतृत्ववाली टीम ने 22 से 24 जून तक बीएयू के सभी कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) और जोनल रिसर्च स्टेशनों (जेडआरएस) का दौरा किया. मुख्यालय के अधिकारियों के साथ बैठक की. बैठक के बाद टीम ने बीएयू के अनुसंधान और प्रसार कार्यों के बेहतर तालमेल के लिए कई सुझाव भी दिये.
40 से अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं कराने की अनुशंसा : टीम के सदस्यों ने पाया कि कई केवीके में 200 से अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम कराये गये हैं. इसकी गुणवत्ता और सत्यतता पर भी कमेटी ने सवाल उठाया.
कमेटी ने पूरे वर्ष में 40 से अधिक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं कराने की सलाह दी. इससे वहां के वैज्ञानिकों को फील्ड में काम करने का समय मिल सकेगा. प्रशिक्षण एक से लेकर पांच दिन तक का होना चाहिए. टीम ने पाया कि केवीके के वैज्ञानिकों का पब्लिकेशन बहुत ही खराब है. आइसीएआर केवीके और यूनिवर्सिटी जर्नल में भी इसकी रिपोर्ट का प्रकाशन होना चाहिए.
अध्ययन में क्या-क्या पाया टीम ने
कई केवीके में टीम वर्क और समन्वय की कमी पायी गयी. यहां नेतृत्व परिवर्तन की जरूरत बतायी गयी. केवीके प्रमुख को सभी के साथ मिल कर काम करने और जिनका प्रदर्शन खराब था, वैसे लोगों के तबादले जाने की जरूरत बतायी गयी. साथ ही जिन कर्मियों का 10 साल से अधिक समय पदस्थापन का हो गया है, वैसे कर्मियों को तत्काल बदलने की अनुशंसा की गयी. केवीके प्रभारी का पदस्थापन इंटरव्यू, ज्ञान, नेतृत्व क्षमता के आधार पर होनी चाहिए, ना कि वरीयता के आधार पर करने की अनुशंसा की गयी.
टीम ने अनुसंधान, प्रसार और बीज उत्पादन में तालमेल की कमी पायी. जिले के हिसाब से बीज की वेराइटी का उत्पादन केवीके में नहीं हो रहा था.
वेराइटी और तकनीकी टेस्ट करने से पूर्व बिरसा किसान डायरी में जिक्र होना चाहिए. अगर किसानों को अनुसंधान से नुकसान हो तो इसका ऑनरशिप किसी संस्थान को लेना चाहिए. किसानों को नुकसान की लागत मिलनी चाहिए.
टीम ने पाया कि एमटीयू 1010, एचडी 2567 किसानों ने फॉर्म में लगाया हुआ था. इसका जिक्र किसान डायरी में नहीं है. कहीं-कहीं स्वर्णा वेराइटी भी लगी हुई थी, जो काफी पुरानी है. इसे सीआर धान 800 वेराइटी से बदला जाना चाहिए. वेराइटी का अनुसंधान राज्य स्तर, जोन स्तर और जिला स्तर पर होना चाहिए.
टीम ने अनुशंसा की कि किसी भी वैज्ञानिक के प्रोजेक्ट पर केवीके या जोनल रिसर्च स्टेशन के प्रभारी, निदेशक अनुसंधान और निदेशक प्रसार की हस्ताक्षर होना चाहिए.
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