ePaper

पलामू के पूर्वडीहा में जीवित है परंपरागत होली कीर्तन की परंपरा, वसंत पंचमी से शुरू

Updated at : 03 Mar 2026 1:30 PM (IST)
विज्ञापन
Palamu Holi

पूर्वडीहा में होली संकीर्तन गाते गांव के लोग.

Palamu Holi: पलामू के चैनपुर प्रखंड स्थित पूर्वडीहा गांव में आज भी होली पर सामूहिक फगुआ और कीर्तन की परंपरा जीवित है. वसंत पंचमी से शुरू होकर होलिका दहन तक गांव में ढोलक-झाल के साथ पारंपरिक गीत गाए जाते हैं और प्रेम-भाईचारे का संदेश दिया जाता है.

विज्ञापन

पलामू से चंद्रशेखर सिंह की रिपोर्ट

Palamu Holi: आधुनिक दौर में जहां तकनीक ने लोगों की जीवनशैली बदल दी है, वहीं पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड स्थित पूर्वडीहा गांव में होली की पारंपरिक कीर्तन परंपरा आज भी जीवित है. मोबाइल, इंटरनेट और डीजे संस्कृति के इस समय में भी यहां के ग्रामीण अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े हुए हैं. त्योहारों के समय लोग पारंपरिक रीति-रिवाजों को निभाने के लिए उत्साहित दिखते हैं. होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता और भाईचारे का प्रतीक है. पूर्वडीहा गांव में यह भावना आज भी साफ झलकती है.

वसंत पंचमी से ही शुरू हो जाता है फगुआ

ग्रामीण बुजुर्गों के अनुसार, होली की शुरुआत वसंत पंचमी से ही मानी जाती है. गांव में जब सरस्वती पूजा का आयोजन होता है, उसी समय से बैठकी और कीर्तन का दौर प्रारंभ हो जाता है. देवी-देवताओं की महिमा पर आधारित होली गीत गाए जाते हैं. ढोलक, झाल, हारमोनियम, तबला और डूगी जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की धुन पर पूरा गांव भक्तिमय माहौल में डूब जाता है. यह सिलसिला होली की शाम तक जारी रहता है. रात में चैता गायन की भी शुरुआत कर दी जाती है.

संकीर्तन मंडली निभा रही सांस्कृतिक जिम्मेदारी

पूर्वडीहा समेत आसपास के कई गांवों में आज भी संकीर्तन मंडलियां सक्रिय हैं. ये मंडलियां सिर्फ होली ही नहीं, बल्कि अन्य धार्मिक अवसरों पर भी भजन-कीर्तन का आयोजन करती हैं. सैकड़ों वर्षों से चली आ रही इस परंपरा को नई पीढ़ी भी आगे बढ़ा रही है. बुजुर्गों का कहना है कि बच्चों और युवाओं में भी अपनी संस्कृति को सहेजने की ललक मौजूद है. यही कारण है कि गांवों में सामूहिक फगुआ और होली गीत की परंपरा आज भी बरकरार है.

होलिका दहन की पारंपरिक तैयारी

गांव में होलिका दहन की तैयारी करीब दस दिन पहले से ही शुरू हो जाती है. ग्रामीण मिलकर होलिका सजाते हैं और शुभ मुहूर्त में विधिवत पूजा-अर्चना कर होलिका दहन करते हैं. इस दौरान भी होली गीत गाने की परंपरा निभाई जाती है. दूसरे दिन देवी-देवताओं की पूजा होती है. घरों में तरह-तरह के पकवान बनाए जाते हैं. लोग एक-दूसरे के घर जाकर मिठाइयां खिलाते हैं और प्रेम का इजहार करते हैं.

रंगों के साथ रिश्तों की मिठास

होली के दिन दोपहर तक जमकर रंग और अबीर-गुलाल खेला जाता है. बच्चे, बूढ़े और युवा सभी होलियाना मूड में नजर आते हैं. पुराने गिले-शिकवे भूलकर लोग एक-दूसरे को गले लगाते हैं. शाम करीब चार बजे के बाद संकीर्तन मंडली की बैठक होती है. गांव के धार्मिक या सार्वजनिक स्थल पर सभी एकत्रित होते हैं. वहां होली और फगुआ गीतों का सामूहिक गायन होता है. ढोलक और झाल की थाप पर लोग झूम उठते हैं. इस दौरान पकवान और भांग का भी दौर चलता है.

इसे भी पढ़ें: जमशेदपुर में साहित्य की लहर को नया उछाल, संदीप मुरारका ने जगाई चेतना

सामाजिक समरसता का जीवंत उदाहरण

पूर्वडीहा गांव की होली केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक है. यहां सभी वर्ग, धर्म और समुदाय के लोग मिलकर त्योहार मनाते हैं. यह परंपरा वर्षों पुरानी है और आज भी उसी उत्साह के साथ निभाई जा रही है. ग्रामीणों का मानना है कि होली का असली उद्देश्य प्रेम और भाईचारे को बढ़ावा देना है. रंगों में सराबोर होकर जब लोग एक-दूसरे के करीब आते हैं, तभी इस पर्व की सार्थकता सिद्ध होती है. तकनीकी युग में जहां पारंपरिक लोक संस्कृति धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है, वहीं पलामू का पूर्वडीहा गांव अपनी होली कीर्तन परंपरा के जरिए सांस्कृतिक विरासत को संजोए हुए है. यह गांव आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा बन चुका है, जहां आधुनिकता और परंपरा का सुंदर संगम देखने को मिलता है.

इसे भी पढ़ें: होली को लेकर सरायकेला में उत्पाद विभाग की बड़ी कार्रवाई, तीन अवैध चुलाई अड्डे ध्वस्त

विज्ञापन
KumarVishwat Sen

लेखक के बारे में

By KumarVishwat Sen

कुमार विश्वत सेन प्रभात खबर डिजिटल में डेप्यूटी चीफ कंटेंट राइटर हैं. इनके पास हिंदी पत्रकारिता का 25 साल से अधिक का अनुभव है. इन्होंने 21वीं सदी की शुरुआत से ही हिंदी पत्रकारिता में कदम रखा. दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता का कोर्स करने के बाद दिल्ली के दैनिक हिंदुस्तान से रिपोर्टिंग की शुरुआत की. इसके बाद वे दिल्ली में लगातार 12 सालों तक रिपोर्टिंग की. इस दौरान उन्होंने दिल्ली से प्रकाशित दैनिक हिंदुस्तान दैनिक जागरण, देशबंधु जैसे प्रतिष्ठित अखबारों के साथ कई साप्ताहिक अखबारों के लिए भी रिपोर्टिंग की. 2013 में वे प्रभात खबर आए. तब से वे प्रिंट मीडिया के साथ फिलहाल पिछले 10 सालों से प्रभात खबर डिजिटल में अपनी सेवाएं दे रहे हैं. इन्होंने अपने करियर के शुरुआती दिनों में ही राजस्थान में होने वाली हिंदी पत्रकारिता के 300 साल के इतिहास पर एक पुस्तक 'नित नए आयाम की खोज: राजस्थानी पत्रकारिता' की रचना की. इनकी कई कहानियां देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं.

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन
Sponsored Linksby Taboola