भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य संबंध का अनूठा महत्व है

भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य संबंध का अपना अनूठा महत्व रहा है.
हुसैनाबाद. भारतीय संस्कृति में गुरु-शिष्य संबंध का अपना अनूठा महत्व रहा है. गुरु जहां संरक्षक रहे, वहीं शिष्य समर्पण का प्रतीक. इस परंपरा के असंख्य उदाहरण हमारी धरोहर का हिस्सा है. मगर आज कॉन्वेंट कल्चर और तथाकथित आधुनिक जीवनशैली के प्रभाव में इस रिश्ते की गरिमा में गिरावट आयी है. दुर्भाग्यवश, आए दिन ऐसे समाचार सामने आते हैं, जो इस संबंध को कलंकित करते हैं, चाहे वे दंडात्मक घटनाएं हों या चारित्रिक पतन के उदाहरण. आधुनिकता के नाम पर हम अपनी संस्कृति और आचरण को खोते जा रहे हैं. ऐसे में शिक्षक, छात्र और अभिभावक, तीनों की भूमिका पहले से अधिक अहम हो गयी है. सहनशीलता और धैर्य की कमी : राजेश्वर सिंह सेवानिवृत्त शिक्षक राजेश्वर सिंह का कहना है कि भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा सहनशीलता और धैर्य पर आधारित थी. यही मंत्र आज भी शैक्षणिक माहौल को बेहतर बना सकता है. उनका मानना है कि कोचिंग संस्थानों और कुछ शिक्षकों की अमर्यादित घटनाओं ने व्यवस्था को बदनाम किया है, जबकि बहुसंख्यक शिक्षक आज भी निष्ठा से कार्य कर रहे हैं. संस्कार सिखाने के लिए संस्कारी होना जरूरी : रंजीत सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक रंजीत कुमार सिंह ने कहा कि शिक्षण संस्थानों से आए दिन अशोभनीय खबरें नैतिक गिरावट को दर्शाती हैं। उनका मानना है कि संस्कार सिखाने के लिए स्वयं संस्कारी होना अनिवार्य है. यदि विद्यार्थी देश का भविष्य हैं, तो शिक्षक राष्ट्र निर्माता हैं. ऐसे में शिक्षकों को अपने दायित्वों का निर्वहन पूरी निष्ठा से करना होगा. सकारात्मक समन्वय से संबंध मजबूत होंगे : डॉ. अंगद सेवानिवृत्त शिक्षक डॉ. अंगद किशोर ने कहा कि गुरु-शिष्य परंपरा को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए शिक्षक, अभिभावक और विद्यार्थी के बीच सकारात्मक समन्वय और जवाबदेही आवश्यक है. इससे छात्रों की मानसिक स्थिति नियंत्रित होगी और उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता भी बढ़ेगी. अभिभावकों की सक्रिय भूमिका अनिवार्य : डॉ. मलय कुमार राय अभिभावक डॉ. एम.के. राय का कहना है कि पश्चिमी सभ्यता, मोबाइल और खान-पान की आदतों ने शिक्षा-संबंध को प्रभावित किया है। ऐसे में अभिभावकों की सक्रियता बेहद जरूरी है। बेहतर माहौल बनाने में अभिभावकों का सहयोग निर्णायक साबित हो सकता है।
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