.पलामू में पांच लाख पौधे लगाये गये, 42 हजार मानव दिवस का सृजन

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.पलामू में पांच लाख पौधे लगाये गये, 42 हजार मानव दिवस का सृजन

.पलामू में पांच लाख पौधे लगाये गये, 42 हजार मानव दिवस का सृजन

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प्रतिनिधि, मेदिनीनगर. पलामू जिले में वन विभाग ने 700 हेक्टेयर भूमि पर पांच लाख से अधिक पौधे लगाये गये हैं. इस अभियान से कुल 42,000 मानव दिवसों का सृजन हुआ है, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार भी मिला है. प्रत्येक मानव दिवस के लिए मजदूरों को 422 रुपये की दर से पारिश्रमिक दिया गया. पौधरोपण अभियान जिले के चैनपुर, मनातू, पांकी, सतबरवा, पाटन, छतरपुर, नौडीहा, विश्रामपुर, मोहम्मदगंज और पड़वा प्रखंडों में चलाया गया. विभाग ने महुआ, आंवला, कटहल, जामुन, पीपल, कदम, गुलमोहर और बरगद जैसे स्थानीय फलदार व पर्यावरणीय दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण पौधों को लगाया है. इसके साथ ही शीशम, सागवान और गम्हार जैसी व्यावसायिक प्रजातियां भी लगायी गयी हैं. वन विभाग के अनुसार, एक हेक्टेयर में औसतन 1,622 पौधे लगाये जाते हैं. एक मजदूर प्रतिदिन करीब 15 पौधे लगाता है. जल संरक्षण के दृष्टिकोण से हर हेक्टेयर में 60 से 120 कंटूर काटे जाते हैं, जो लगभग 20 फीट लंबे, डेढ़ फीट चौड़े और डेढ़ फीट गहरे होते हैं, ताकि वर्षा जल को संचित किया जा सके. इसी मिट्टी में बीज डालकर वृक्षारोपण किया जाता है. जहां भी जलाशय या तालाब मौजूद हैं, वहां नींबू के पेड़ विशेष रूप से लगाये गये हैं. डीएफओ सत्यम कुमार ने बताया कि पलामू की जलवायु के अनुसार ही उपयुक्त पौधों का चयन किया गया है, जैसे जमशेदपुर में काजू का होता है. नींबू के पौधे लगाने से किसानों को दोहरा लाभ होता है, एक तो इससे आय होती है, दूसरा यह कि नींबू की गंध से नीलगाय जैसे जंगली जानवर खेतों में प्रवेश नहीं करते.सरकार की एग्रो फॉरेस्ट्री नीति के तहत लगाए गए इन पौधों की देखरेख वन विभाग द्वारा चार साल तक की जायेगी. इसके साथ ही जंगल के आसपास रहने वाले लोगों को भी इससे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभ मिल रहा है, क्योंकि वृक्षारोपण से न सिर्फ हरियाली बढ़ी है, बल्कि पशु-पक्षियों के लिए भी अनुकूल वातावरण तैयार हुआ है. वन विभाग ने जंगलों में घास भी लगाया है, जिससे जंगली जानवर भोजन की तलाश में आबादी वाले इलाकों में न जायें. पलामू जिले में विभाग द्वारा तीन नर्सरी भी संचालित की जा रही हैं. पाटन में एक हेक्टेयर, चैनपुर व छतरपुर में आधा-आधा हेक्टेयर क्षेत्र में इन नर्सरियों से कम लागत पर स्थानीय लोगों को पौधे उपलब्ध कराये जा रहे हैं.

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Akarsh Aniket

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