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कठिन हो गयी रेल यात्रा, यात्री 1200, बस सिर्फ दो, हो रही है खानापूर्ति

लोहरदगा कोयल नदी पर बने रेलवे पुल के क्षतिग्रस्त हो जाने के बाद रांची–लोहरदगा–टोरी मेमू ट्रेन केवल ईरगांव स्टेशन तक ही चलायी जा रही है

लोहरदगा कोयल नदी पर बने रेलवे पुल के क्षतिग्रस्त हो जाने के बाद हो रही परेशानी

गोपी कुंवर

लोहरदगा. लोहरदगा कोयल नदी पर बने रेलवे पुल के क्षतिग्रस्त हो जाने के बाद रांची–लोहरदगा–टोरी मेमू ट्रेन केवल ईरगांव स्टेशन तक ही चलायी जा रही है. रेलवे द्वारा यह दावा किया गया है कि ईरगांव से लोहरदगा तक यात्रियों को मुफ्त बस सेवा उपलब्ध करायी जा रही है. लेकिन वास्तविकता में यह व्यवस्था यात्रियों की संख्या के सामने बेहद अपर्याप्त साबित हो रही है.

एक फेरा में लगभग डेढ़ से दो हजार यात्री ईरगांव स्टेशन पहुंचते हैं. इनमें से लगभग 1200 यात्री वैध टिकटधारी होते हैं. रेलवे ने मात्र दो बसों की व्यवस्था की है, जिनमें कुल 104 सीटें हैं. किसी तरह एडजस्ट करके लगभग 125 यात्रियों को लोहरदगा पहुंचाया जाता है. शेष हजारों यात्रियों को टेंपो या निजी साधनों का सहारा लेना पड़ता है. यह स्थिति यात्रियों के लिए बड़ी परेशानी का कारण बन गयी है.

बस में बैठने के लिए मारामारी होती है

रांची रेलवे स्टेशन पर लगातार घोषणा की जाती है कि ईरगांव से लोहरदगा तक मुफ्त बस सेवा उपलब्ध है. लेकिन जब यात्री ईरगांव पहुंचते हैं तो उन्हें पता चलता है कि बसों की संख्या बेहद कम है. महिलाओं और बच्चों को सबसे अधिक कठिनाई होती है क्योंकि बस में बैठने के लिए मारामारी होती है. बस में चढ़ने से पहले टिकट दिखाना अनिवार्य है, जिससे वैध यात्रियों को ही स्थान मिलता है. लेकिन वैध यात्रियों की संख्या इतनी अधिक है कि दो बसों में उन्हें समायोजित करना असंभव है.

किराया पूरा लेकिन सेवा अधूरी

लोहरदगा से रांची आने-जाने वाले लगभग 300 लोगों ने एमएसटी बनवा रखा है. ये नियमित यात्री भी बसों में समायोजित नहीं हो पाते. ऐसे में उनकी दैनिक यात्रा बाधित हो रही है. दूसरी ओर, टिकट अब भी लोहरदगा तक का ही काटा जा रहा है, जबकि सुविधा केवल ईरगांव तक ही मिल रही है. यात्रियों को किराया पूरा देना पड़ता है लेकिन सेवा अधूरी मिलती है. यह स्थिति रेलवे की जिम्मेदारी पर प्रश्नचिह्न लगाती है.

समाधान के लिए 15 से 20 बस की है जरूरत

इस समस्या का समाधान दो स्तरों पर किया जा सकता है. पहला, बसों की संख्या बढ़ायी जाये, ताकि एक फेरा के यात्रियों को आराम से लोहरदगा पहुंचाया जा सके. कम से कम 15-20 बसों की व्यवस्था आवश्यक है. दूसरा, जब तक पुल की मरम्मत पूरी नहीं होती, टिकट केवल ईरगांव तक ही काटा जाये. इससे यात्रियों को गलतफहमी नहीं होगी और वे अपनी आगे की यात्रा के लिए पहले से तैयार रहेंगे.

इसके अतिरिक्त, रेलवे स्थानीय प्रशासन के साथ मिलकर मिनी बसों और टेंपो को भी शटल सेवा में शामिल कर सकता है. एमएसटी धारकों के लिए अलग बस सेवा चलाई जा सकती है ताकि नियमित यात्रियों को सुविधा मिले. साथ ही, स्टेशन पर स्पष्ट सूचना दी जाए कि बसों की संख्या सीमित है और बाकी यात्रियों को वैकल्पिक साधन अपनाने होंगे.

कुल मिलाकर, वर्तमान व्यवस्था ऊंट के मुंह में जीरा जैसी है. यात्रियों की संख्या और बसों की क्षमता में भारी असंतुलन है. रेलवे को चाहिए कि या तो बसों की संख्या बढ़ाए या टिकटिंग को ईरगांव तक सीमित करे. तभी यात्रियों की परेशानी कम होगी और रेलवे की विश्वसनीयता बनी रहेगी.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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