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कोचा करम टोली, बांध टोली जाने में लोगों के छूटते हैं पसीने, नदी में पुल नही होने से होती है परेशानी

Updated at : 22 Jan 2026 9:40 PM (IST)
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कोचा करम टोली, बांध टोली जाने में लोगों के छूटते हैं पसीने, नदी में पुल नही होने से होती है परेशानी

कोचा गांव और इसके आसपास के टोले आज भी विकास की बाट जोह रहे हैं

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कोचा गांव और इसके आसपास के टोले आज भी विकास की बाट जोह रहे हैं. पेयजल, सड़क, पुल, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव ग्रामीणों के जीवन को कठिन बना रहा है. प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है. ग्रामीणों की समस्याएँ केवल चुनावी मुद्दा नहीं, बल्कि उनके जीवन का सवाल हैं. कोचा गांव की हकीकत: विकास से कोसों दूर ग्रामीण जीवन प्रभात खबर आपके द्वार संदीप साहू, किस्को. लोहरदगा जिले के किस्को प्रखंड के खरकी पंचायत क्षेत्र के कोचा गांव और इसके आसपास बसे ऊपर कोचा, बरनाग, करम टोली एवं बांध टोला आज भी विकास की मुख्यधारा से कटे हुए हैं. पहाड़ों की तलहटी में बसे इन गांवों में मुंडा, नगेसिया, उरांव, लोहार, तुरी समेत अन्य समुदायों के लोग निवास करते हैं. किस्को मुख्यालय से मात्र छह किलोमीटर की दूरी पर स्थित होने के बावजूद यह क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं से वंचित है. पेयजल और स्वास्थ्य संकट गांव में सबसे बड़ी समस्या पेयजल की है. ग्रामीणों को आज भी नदी का गंदा पानी पीने को विवश होना पड़ता है. बरसात के दिनों में नदी का पानी लाल हो जाता है क्योंकि आसपास बॉक्साइट खदानों से बहकर प्रदूषित पानी नदी में आता है. शुद्ध पेयजल की कोई व्यवस्था नहीं होने से लोग बीमारियों के शिकार होते हैं. स्वास्थ्य सुविधा का भी घोर अभाव है. छोटी-मोटी बीमारियों के लिए भी ग्रामीणों को किस्को जाना पड़ता है, लेकिन जर्जर सड़कें और बरसात में नदी पार करने की मजबूरी इस यात्रा को बेहद कठिन बना देती है. सड़क और पुल की समस्या गांव तक पहुंचने का मार्ग बेहद जर्जर है. जगह-जगह सड़क कटाव होने से रास्ता संकीर्ण हो गया है, जो दुर्घटनाओं को आमंत्रित करता है. बरसात के दिनों में नदी पार करना असंभव हो जाता है. पुल निर्माण की मांग वर्षों से की जा रही है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. बांध टोली से करम टोली को जोड़ने वाली मुख्य सड़क भी खराब हालत में है. ऊपर कोचा जाने में लोगों के पसीने छूट जाते हैं. सबसे अधिक परेशानी मरीजों को किस्को ले जाने में होती है. शिक्षा पर असर बरसात के दिनों में नदी में पानी भर जाने के बाद बच्चों का स्कूल जाना बंद हो जाता है. अभिभावक जान जोखिम में डालकर बच्चों को नदी पार कराने की हिम्मत नहीं जुटा पाते. परिणामस्वरूप शिक्षा बाधित होती है और बच्चों का भविष्य अंधकारमय बनता जा रहा है. रोजगार और पलायन गांव में रोजगार के अवसर लगभग न के बराबर हैं. अधिकांश लोग जंगल से सूखी लकड़ी बेचकर जीविकोपार्जन करते हैं. रोजगार की कमी के कारण बड़ी संख्या में लोग पलायन कर जाते हैं. गांव में आबादी घटती जा रही है और केवल बुजुर्ग या मजबूर लोग ही रह जाते हैं. प्रशासन और जनप्रतिनिधियों की उदासीनता ग्रामीणों का आरोप है कि जनप्रतिनिधि केवल चुनाव के समय गांव आते हैं. चुनाव जीतने के बाद वे कभी गांव की सुध नहीं लेते. पंचायत चुनाव में भी मुखिया को वोट दिया गया, लेकिन गांव तक पहुंचने की दूरी मात्र चार किलोमीटर होने के बावजूद मुखिया दोबारा गांव नहीं आयी. प्रशासनिक अधिकारी भी गांव के विकास में कोई रुचि नहीं लेते. अब तक प्रखंड स्तरीय अधिकारी गांव तक नहीं पहुंचे हैं. इससे स्पष्ट है कि इस गाँव के विकास से किसी को कोई मतलब नहीं है. ग्रामीणों की आवाज़ ग्रामीण सोहबइत मुंडा, संगीता मुंडा और मुक्ति लकड़ा का कहना है कि पेयजल की समस्या सबसे गंभीर है. जनप्रतिनिधि केवल वोट के समय आते हैं और बाद में गायब हो जाते हैं. ग्रामीण जगदेव लोहरा, सोमा नगेसिया और कुंवर तुरी बताते हैं कि नदी का गंदा पानी पीने से लोग बीमार पड़ते हैं. बरसात में नदी पार करना असंभव हो जाता है और सप्ताह भर गाँव में ही रहना पड़ता है. खाने-पीने का संकट पैदा हो जाता है और लोग अगल-बगल से उधार लेकर काम चलाते हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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VIKASH NATH

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By VIKASH NATH

VIKASH NATH is a contributor at Prabhat Khabar.

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