भंडरा/लोहरदगा : जतरा हमारी संस्कृति, रीति-रिवाज, कला व आदिवासी जीवन शैली की पहचान है. आदिवासी जतरा के माध्यम से ऐतिहासिक दिनों को याद कर सामूहिक उत्साह मनाते हैं. पझरी पहाड़ माघ जतरा भी एक ऐतिहासिक घटना की याद में लगाया जाता है.
जतरा को एक विजय पर्व के रूप में यहां के आसपास के लोग मनाते हैं. माघ कृष्ण पक्ष चतुर्थी के दिन यहां के आदिवासी असुर राक्षसों पर जीत हासिल की थी. इसी के उपलक्ष्य में विजय पर्व मनाया जाता है. जतरा से एक दिन पूर्व पहाड़ में सूखे घास फूस को जला कर जतरा का अगाज किया जाता है. उक्त बाते बिंदेश्वर उरांवने जतरा समारोह को संबेाधित करते हुए कही.
इससे पूर्व जतरा का शुभारंभ पझरी पहाड़ में स्थित धार्मिक स्थल में स्थानीय पाहन व पुजारी ने पूजा पाठ कर किया.गांव के लोग कलश के साथ पारंपरिक वेश भूषा में नृत्य करते हुए जतरा स्थल तक आये. जतरा में छऊ नृत्य व मंडा नृत्य का आयोजन किया गया था. जतरा में मुर्गा लड़ाई करवाने की पुरानी परंपरा है. यहां मुर्गा लड़ाई के लिए दूर-दूर से बड़ी संख्या में लोग मुर्गा लेकर आये थे. ग्रामीणों द्वारा मुर्गा लड़ाई की व्यवस्था की गयी थी.
