लीड :::3:: सपना है बाइपास सड़क

Published at :21 Aug 2014 8:00 PM (IST)
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लीड :::3::  सपना है बाइपास सड़क

फ्लैग ::: लापरवाही.प्राक्कलन में मतभेद, मामला पहुंचा कोर्ट मेंफोटो- एलडीजीए-8 अधूरा पड़ा बाइपास सड़क व गार्डवाल.प्रतिनिधि, लोहरदगा जिले के लोगों के लिए बाइपास सड़क सपना साबित हो रहा है. बाइपास सड़क के अभाव में लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है. मुख्य पथ से ही छोटे एवं भारी वाहन के परिचालन से विभिन्न […]

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फ्लैग ::: लापरवाही.प्राक्कलन में मतभेद, मामला पहुंचा कोर्ट मेंफोटो- एलडीजीए-8 अधूरा पड़ा बाइपास सड़क व गार्डवाल.प्रतिनिधि, लोहरदगा जिले के लोगों के लिए बाइपास सड़क सपना साबित हो रहा है. बाइपास सड़क के अभाव में लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है. मुख्य पथ से ही छोटे एवं भारी वाहन के परिचालन से विभिन्न चौक-चौराहों में सड़क जाम आम बात हो गयी है. साथ ही इससे छोटी-मोटी दुर्घटनाएं प्रत्येक दिन की नियती बन गयी है. बाइपास सड़क का निर्माण की मांग लंबे समय से यहां के लोगों द्वारा किया जाता रहा है. लेकिन प्रशासनिक एवं जनप्रतिनिधियों की उदासीन रवैये के कारण बाइपास सड़क निर्माण अधर में लटका हुआ है. प्राक्कलन में हुई मतभिन्नताबाइपास सड़क का फर्स्ट फेज का कार्य 2008 में दो करोड़ पांच लाख की लागत से ओयना मोड़ से गांगुपारा तक तीन किमी निर्माण का शिलान्यास तत्कालीन विधायक सुखदेव भगत ने किया था. कार्य ग्रामीण विकास विभाग की राशि से कराया जा रहा था. क्रियान्वयन एजेंसी आरइओ को बनाया गया था. पथ निर्माण का कार्य एएस कंसट्रक्सन द्वारा कराया जा रहा था. शुरुआती दिनों में सड़क निर्माण का कार्य तेजी से चला. पथ में मिट्टी, मोरम, पुल तथा गार्डवाल भी पूरा कर लिया गया. कार्य के विरुद्ध संवेदक को भुगतान भी हुआ. निर्माण कार्य आगे त्वरित गति से हो पाता इसी बीच संवेदक एवं विभाग में प्राक्कलन को लेकर मतभेद हो गया और मामला कोर्ट पहुंच गया. मामला कोर्ट पहुंचने के बाद निर्माण कार्य लंबित पड़ा हुआ है. बाइपास बनती तो मिलता जाम से निजातबाइपास सड़क का निर्माण 12 किमी ओयना मोड़ के पास से प्रारंभ कर बक्सीडीपा के पास निकालने की योजना थी. इस योजना के पूर्ण हो जाने से शहर में ट्रैफिक की समस्या से लोगों को निजात मिल जाता और रोज-रोज के जाम से लोगों से मुक्ति मिल जाती. लेकिन फर्स्ट फेज का काम के लटक जाने के कारण आगे का कार्य नहीं हो सका. ग्रामीण विकास विभाग द्वारा इसके लिए फंड भी दे दी गयी थी. रैयती जमीन के अधिग्रहण एवं रैयतों को मुआवजा देने के लिए भू-अर्जन विभाग को जिम्मेवारी भी सौंपी गयी थी. लेकिन मामला कोर्ट में जाने के बाद निर्माण कार्य ठप पड़ गया.

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