पोचरा गांव में आज भी जीवंत है होली की सदियों पुरानी परंपरा

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पोचरा गांव में आज भी जीवंत है होली की सदियों पुरानी परंपरा

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लातेहार ़ जिला मुख्यालय से करीब आठ किलोमीटर दूर स्थित पोचरा गांव में होली का पर्व आज भी अपनी प्राचीन परंपराओं के साथ मनाया जाता है. आधुनिकता के इस दौर में भी यहां के ग्रामीण अपनी संस्कृति और पूर्वजों की धरोहर को सहेज कर रखे हुए हैं. राख से होती है ””धुलेड़ी”” की शुरुआत : पोचरा गांव में होली की शुरुआत काफी अनूठी होती है. होलिका दहन के अगले दिन सुबह ग्रामीण सबसे पहले गांव के मंदिर में पूजा-अर्चना करते हैं. इसके बाद राख उड़ाकर होली खेलने की परंपरा है, जिसे ””धुलेड़ी”” कहा जाता है. गांव के शंभुनाथ शाहदेव ने बताया कि यह परंपरा उन्हें अपने पूर्वजों से मिली है, जिसे वे पूरी निष्ठा के साथ निभा रहे हैं. राख से होली खेलने के बाद ग्रामीण रंगों के उत्सव में डूब जाते हैं. ढोलक-मजीरे की थाप पर गूंजते हैं लोकगीत : होली के दौरान गांव के युवाओं और बुजुर्गों द्वारा पारंपरिक वाद्य यंत्रों जैसे ढोलक, झाल और मजीरा पर होली के गीत गाये जाते हैं, जिससे पूरा माहौल भक्तिमय और संगीतमय हो जाता है. शंभुनाथ शाहदेव ने कहा कि होलिका दहन अहंकार और नकारात्मकता के विनाश का प्रतीक है, जबकि होली का पर्व राधा-कृष्ण के पावन प्रेम और वसंत ऋतु के आगमन का संदेश देता है. बड़ों का आशीर्वाद लेकर निभाते हैं परंपरा : त्योहार की शाम को गांव के सभी लोग एकजुट होकर बड़े-बुजुर्गों के घर जाते हैं और उन्हें अबीर लगाकर उनका आशीर्वाद लेते हैं. आपसी प्रेम और भाईचारे की यह परंपरा गांव में निरंतर जारी है. ग्रामीणों का मानना है कि भारतीय संस्कृति की इन कहानियों को नयी पीढ़ी तक पहुंचाना और उन्हें जीवंत रखना ही आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है.

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