मानसून की फुहारों से गुलजार हुआ बेतला नेशनल पार्क, हरियाली के बीच बढ़ी हजारों वन्यजीवों की रौनक
बेतला नेशनल पार्क
मानसून की बारिश के बाद बेतला नेशनल पार्क में हरियाली बढ़ी है और वन्यजीवों की संख्या में भी भारी इजाफा हुआ है। जानिए पार्क की वर्तमान स्थिति।
संतोष कुमार की रिपोर्ट बेतला नेशनल पार्क. वर्ष के अन्य मौसमों की तुलना में मानसून के आते ही बेतला नेशनल पार्क की खूबसूरती अपने चरम पर पहुंच गयी है. इस बार प्रकृति के अनुकूल वातावरण और पर्याप्त बारिश के कारण बेतला में जंगली जानवरों की संख्या में अप्रत्याशित रूप से वृद्धि दर्ज की गयी है. जंगल की हरी-भरी चादर ओढ़ने के साथ-साथ यहां हजारों की संख्या में नए वन्यजीवों की बढ़ोतरी हुई है. जो पर्यावरण प्रेमियों के लिए एक बेहद सुखद संदेश है.
बढ़ गयी छोटे-बड़े वन्यजीवों की चहल-पहल
वर्तमान में जंगल के चहुंओर हिरण, बाइसन (गौर), बंदर,लंगूर, हायना और जंगली सूअर सहित अन्य छोटे-बड़े वन्यजीवों की चहल-पहल बढ़ गयी है. वन विभाग की पेट्रोलिंग के दौरान कई जानवरों को उनके नन्हे बच्चों के साथ देखा गया है. फिलहाल वन्यजीवों की आधिकारिक गिनती का काम शुरू नहीं होने के कारण वास्तविक आंकड़े तो सामने नहीं आये हैं. लेकिन वन अधिकारियों के अनुसार यह पूरी तरह स्पष्ट हो गया है कि पूर्व से मौजूद जंगली जानवरों की आबादी में एक हजार से अधिक नये जानवरों की बढ़ोतरी हुई है.
सड़कों पर जानवर कर रहे विश्राम
पार्क सूत्रों के मुताबिक वर्तमान समय में बेतला के जंगलों में जंगली हाथियों के कई बड़े झुंड मौजूद हैं. इसके साथ ही जंगल की शान माने जाने वाले लेपर्ड (तेंदुए) भी इस बार आधा दर्जन से अधिक की संख्या में देखे जा रहे हैं. इस दौरान पर्यटकों के वाहनों का प्रवेश पूरी तरह बंद होने के कारण पार्क क्षेत्र में वायु और ध्वनि प्रदूषण का नामोनिशान मिट चुका है. एकदम शांत वातावरण होने के कारण अब जंगली जानवर बेखौफ होकर पक्की सड़कों पर भी विश्राम करते नजर आ रहे हैं.
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प्राकृतिक सौंदर्य और अठखेलियों का अद्भुत संगम
पक्षियों का सुमधुर कलरव: जंगलों में रंग-बिरंगे और दुर्लभ पक्षियों की चहचहाहट अब दूर-दूर तक स्पष्ट सुनाई दे रही है. हाथियों की चिंघाड़: घने जंगलों में हाथियों के झुंड न केवल स्वतंत्र विचरण कर रहे हैं. बल्कि उनकी गूंजती चिंघाड़ से पूरा माहौल जीवंत हो उठा है. तितलियां और भंवरे: चारों तरफ फैली इस अद्भुत हरियाली के बीच नए फूलों पर मंडराती तितलियां और गुनगुनाते भंवरे बेतला के नैसर्गिक सौंदर्य को दुगना कर रहे हैं. सघन वन क्षेत्र: मानसून की लगातार बारिश से जंगल में अनगिनत नए पेड़-पौधे उग आए हैं. जिससे पूरा वन क्षेत्र पहले से कहीं अधिक घना और गहरा दिखाई देने लगा है.यह मानसून बेतला नेशनल पार्क के वन्यजीवों और वनस्पति दोनों के लिए एक नया जीवन लेकर आया है. जहां प्रकृति बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के खुद को संवार रही है.
शिकारियों पर रखी जा रही है पैनी नजर
रेंजर उमेश कुमार दुबे ने स्पष्ट किया कि ''नो एंट्री'' के दौरान भले ही बेतला नेशनल पार्क में पर्यटकों के प्रवेश पर रोक लगाई गई है. लेकिन जंगल की सुरक्षा और निगरानी में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है. आधुनिक उपकरणों और मुस्तैद गश्ती टीम के जरिए 24 घंटे जंगल पर नजर रखी जा रही है. वन क्षेत्र में किसी भी शिकारी का प्रवेश न हो. इसके लिए पूरी मुस्तैदी और हाई अलर्ट के साथ काम किया जा रहा है.
एनटीसीए के निर्देश पर बंद है पार्क
नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (एनटीसीए) के निर्देशों के तहत मानसून को वन्यजीवों का मुख्य प्रजनन काल (ब्रीडिंग सीजन) माना जाता है. इसी को देखते हुए देश के अन्य राष्ट्रीय उद्यानों की तर्ज पर पिछले डेढ़ महीने से बेतला नेशनल पार्क को पर्यटकों के लिए पूरी तरह बंद रखा गया है. पार्क बंद रहने के कारण इंसानी दखल पूरी तरह समाप्त हो गया है. जिससे जंगली जानवरों को स्वच्छंद रूप से पूरे वन क्षेत्र में घूमते हुए देखा जा रहा है. अब पार्क के रास्तों से होकर गुजरते समय वन्यजीवों के बड़े-बड़े झुंड आसानी से दिखाई दे जाते हैं.
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आखिर क्यों मानसून में पार्क बंद?
मानसून का समय जंगली जानवरों के लिए मुख्य रूप से प्रजनन काल (ब्रीडिंग सीजन) होता है. पार्क प्रबंधन के अनुसार इस दौरान पार्क को बंद रखने के पीछे निम्नलिखित मुख्य कारण हैं: प्राकृतिक प्रक्रिया में खलल नहीं: इंसानों और वाहनों की उपस्थिति से जंगली जानवरों की प्रजनन प्रक्रिया में बाधा आ सकती है. मानवीय गतिविधियों का असर वन्यजीवों की इस प्राकृतिक प्रक्रिया पर सीधे तौर पर पड़ता है. सुरक्षात्मक कारण: प्रजनन काल के दौरान व्यवधान होने पर जानवर अत्यधिक तनाव में आ जाते हैं. जिससे न केवल उनके बीच आपस में हिंसक लड़ाइयां होती हैं. बल्कि वे इंसानों पर भी हमलावर हो जाते हैं. जो पर्यटकों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकता है. कच्चे रास्ते और सफारी का खतरा: मानसून की बारिश के कारण जंगल के रास्ते कच्चे और दलदली हो जाते हैं. ऐसे में सफारी वाहनों के कीचड़ में फंसने का खतरा रहता है. वाहन फंसने पर हाथियों या अन्य हिंसक जानवरों द्वारा पर्यटकों पर हमला किए जाने की आशंका बनी रहती है.
एक जुलाई से 30 सितंबर तक रहती है ''नो एंट्री''
इन्हीं गंभीर कारणों को देखते हुए बेतला नेशनल पार्क हर साल 1 जुलाई से 30 सितंबर तक यानी पूरे तीन महीने के लिए बंद रहता है. इस पाबंदी के दौरान सिर्फ और सिर्फ पार्क प्रबंधन के अधिकृत अधिकारियों और सुरक्षात्मक गश्ती टीम को ही वन क्षेत्र में प्रवेश करने की इजाजत दी जाती है.
शांत माहौल का प्रजनन पर सीधा असर
बेतला नेशनल पार्क के रेंजर उमेश कुमार दुबे ने विशेष बातचीत में कहा कि बेतला नेशनल पार्क के बंद होने से इस बार वन्यजीवों के प्रजनन पर सीधा और बेहद सकारात्मक असर पड़ा है. मानवीय हस्तक्षेप पूरी तरह खत्म होने से जंगली जानवरों की संख्या में भारी बढ़ोतरी दिख रही है. जो बेतला नेशनल पार्क के सुनहरे भविष्य के लिए एक बहुत ही शुभ संकेत है.
अत्याधुनिक कैमरा ट्रैप
रेंजर ने आगे बताया कि वन्यजीवों की गतिविधियों और सुरक्षा पर नजर रखने के लिए जंगल में जगह-जगह पर अत्याधुनिक कैमरा ट्रैप लगाए गए हैं. इन कैमरा ट्रैप्स में कई दुर्लभ जंगली जानवरों की खूबसूरत और अद्भुत तस्वीरों को कैद किया गया है. उन्होंने यह भी जानकारी दी कि बरसात का मौसम खत्म होने के बाद वन विभाग द्वारा बेतला में जंगली जानवरों की आधिकारिक गिनती (सेंसस) कराई जायेगी. जिसके बाद वास्तविक आंकड़े सामने आयेंगे. गश्त के दौरान कई ऐसे दुर्लभ वन्यजीव भी देखे गये हैं जो अक्सर पर्यटकों की चहल-पहल के कारण छिपे रहते थे.
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लेखक के बारे में
By विकाश नाथ
26 साल से पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत हूं. रिपोर्टिंग के साथ डेस्क का काम करने भी अनुभव प्राप्त है. खेल डेस्क में भी काम करने का अनुभव है. रुरल के संस्करणों को देखता हूं.
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