फौलादी जिस्म के मालिक हैं कोडरमा का नागो

Updated at : 01 Feb 2018 4:01 AM (IST)
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फौलादी जिस्म के मालिक हैं कोडरमा का नागो

कोडरमा : बाजारपूरी कायनात अजूबों से भरी पड़ी हुई है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिनमें कुछ अनोखी विशेषताएं होती हैं. कोडरमा प्रखंड के पुरनानगर पंचायत में भी एक ऐसा शख्सियत हैं नागेश्वर रजक उर्फ नागो. पेशे से मोटिया मजदूर 60 वर्षीय नागेश्वर रजक इस कड़ाके की ठंड में भी खुले बदन मोटिया (बोझ उठाने वाला) […]

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कोडरमा : बाजारपूरी कायनात अजूबों से भरी पड़ी हुई है. कुछ लोग ऐसे हैं, जिनमें कुछ अनोखी विशेषताएं होती हैं. कोडरमा प्रखंड के पुरनानगर पंचायत में भी एक ऐसा शख्सियत हैं नागेश्वर रजक उर्फ नागो. पेशे से मोटिया मजदूर 60 वर्षीय नागेश्वर रजक इस कड़ाके की ठंड में भी खुले बदन मोटिया (बोझ उठाने वाला) का काम करते हैं. सुबह में अपनी रिक्शा लेकर कोडरमा बाजार पहुंचने के बाद नागो दिन भर हाड़-तोड़ मेहनत कर दुकान – दुकान गेहूं,चावल, चीनी आदि के बोरे अपनी पीठ पर लाद कर पहुंचाते हैं. शाम ढ़लने के बाद घर वापस लौटते हैं.
हर मौसम में नागो खुले बदन रहकर काम करते हैं. अपनी खूबियों के कारण नागो की गांव में एक अलग पहचान है. गांव के लोग बताते है कि नागो बचपन से लेकर बूढ़ापे तक खुले बदन ही रहता आया. उसे शायद ही किसी ने पूरे कपड़े पहने देखा होगा. दो पुत्र और दो पुत्री समेत भरा पूरा परिवार का लालन पालन करनेवाले नागो की इन्हीं विशेषताओं के कारण व्यवसायी वर्ग के लोग उसे फौलादी जिस्म का मालिक मानते हैं.
रिश्तेदारी में जाने पर कुछ देर के लिए पहनता है कपड़ा : अपने बारे में बताते हुए नागो ने कहा कि उसके पिता पूरन धोबी भी इसी तरह रहते थे. पिता का गुण उसके अंदर भी आ गया. खुले बदन रहने का कारण बताते हुए कहा कि वह जब भी कपड़ा पहनता है तो उसके शरीर में कुछ अजीब लगता है. इसी कारण बचपन से ही वह कपड़ा पहनना छोड़ दिया. हालांकि ससुराल समेत अन्य रिश्तेदारों के घर जाने के समय मजबूरी में कपड़ा पहनता है.
इसके लिए उसने एक तरकीब निकाली है. किसी के घर जाने के समय झोले में कपड़ा रख लेता है और रिश्तेदार के घर पहुंचने से कुछ देर पहले पहन लेता है. उसने बताया कि शुरू में ससुराल समेत अन्य रिश्तेदारोंके घर खुले बदन चला गया था, जिसके कारण उसका खूब मजाक उड़ा था. तभी से वह झोले में कपड़े रखने लगा.
नागो को है पेंशन का इंतजार : नागेश्वर रजक ने बताया कि लोगों का बोझा ढो-ढो कर किसी तरह दो बच्चों का शादी किया हूं.तीसरे की तैयारी चल रही है. उसने बताया कि दिन भर हाड़ तोड़ मेहनत करने के बाद जो सौ-पचास मजदूरी मिलती है उसी से गुजारा होता है. पहले 35 किलो अनाज मिलता था. मगर अब 22 किलो मिलता है. घर की स्थिति खस्ताहाल है. पेंशन के लिए भी चक्कर लगाया मगर कोई लाभ नहीं हुआ.
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