पहली जनक्रांति का प्रतीक है हूल आंदोलन

Updated at : 01 Jul 2017 11:46 AM (IST)
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पहली जनक्रांति का प्रतीक है हूल आंदोलन

कोडरमा बाजार : समाहरणालय परिसर में हूल दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत में डीसी संजीव कुमार बेसरा समेत अन्य अधिकारियों ने हूल आंदोलन के जनक सिदो-कान्हू के तसवीर पर माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किया. मौके पर उपायुक्त कहा कि 19वीं सदी की पहली जनक्रांति का प्रतीक है हूल आंदोलन. अंग्रेजी हुकूमत […]

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कोडरमा बाजार : समाहरणालय परिसर में हूल दिवस पर कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम की शुरुआत में डीसी संजीव कुमार बेसरा समेत अन्य अधिकारियों ने हूल आंदोलन के जनक सिदो-कान्हू के तसवीर पर माल्यार्पण कर श्रद्धासुमन अर्पित किया. मौके पर उपायुक्त कहा कि 19वीं सदी की पहली जनक्रांति का प्रतीक है हूल आंदोलन.

अंग्रेजी हुकूमत की तानाशाही रवैये से ऊब चुके संथालों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ आंदोलन का बिगुल 30 जून 1855 को साहेबगंज जिले के बरहेट प्रखंड के भगनाडीह गांव में सिदो-कान्हू और उनके दो भाइयों चांद-भैरव के नेतृत्व में संथाल हूल की शंखनाद हुई थी. कहा कि संथालों का यह विद्रोह एशिया का पहला जन आंदोलन कहा जाता है. इस विद्रोह का असर बंगाल, बिहार व देश के कई राज्यों पर पड़ा. डीसी ने कहा कि हूल आंदोलन इतनी सख्त थी कि अंग्रेजी सलतनत अपनी पूरी शक्ति इसे दबाने में लगा दिया. आंदोलन में करीब 50 हजार से अधिक लोगों ने हिस्सा लिया था. इसमें 30 हजार से अधिक आंदोलनकारी शहीद हो गये. उन्होंने कहा कि इसके बाद 1857 में सैनिक विद्रोह हुआ था.

डीसी श्री बेसरा ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने जल, जंगल, जमीन व स्वतंत्रता के लिए अपने प्राण की आहुति देने से नहीं हिचके. हमें उनके बताये मार्गों पर चलना चाहिए, तभी हम सही मायने में उनके वंशज बन सकते है. अपर समाहर्ता प्रवीण कुमार गागराई ने हूल दिवस की शुभकामनाएं देते हुए कहा कि हमारे पूर्वजों ने देश की आजादी व मान-सम्मान के लिए अपनी प्राणों की आहुति देने से भी नहीं हिचके, ताकि लोग सम्मान पूर्वक जीवन यापन कर सके.

वर्तमान समय में आदिवासी समाज मुख्य धारा से कटे हुए है, आज भी समाज के अधिसंख्य लोग शिक्षा से वंचित है. उन्होंने आह्वान किया कि समाज के शिक्षित लोग आगे आकर समाज में व्याप्त बुराइयों को दूर करने में सहयोग कर उन्हें समाज के मुख्यधारा में जोड़ने का प्रयास करें. अधिकार और कर्तव्य के प्रति जागरूक करें तभी हम सिदो-कान्हू व चांद-भैरव जैसे महान विभूतियों द्वारा किये गये कार्यों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर सकते हैं.

कार्यक्रम को एसडीओ प्रभात कुमार बरदियार, निबंधन पदाधिकारी चंद्रजीत खलखो, आदिवासी संघ के अध्यक्ष पवन माइकल कुजूर आदि ने भी संबोधित किया. इसके पूर्व शुक्रवार को हुल दिवस पर आदिवासी समुदाय द्वारा पदयात्रा निकाली गयी. पदयात्रा लख्खीबागी स्थित सरना स्थल से शुरू होकर समाहरणालय परिसर पहुंच कर सभा में तब्दील हो गयी. पदयात्रा में शामिल आदिवासी समुदाय के लोग पारंपरिक लिबास व हथियार से लैस थे. लोग मांदर के थाप पर आकर्षक नृत्य करते हुए हाथों में तख्तियां लिए चल रहे थे. पदयात्रा में अन्य अधिकारियों के साथ उपायुक्त संजीव कुमार बेसरा अपने परिवार के साथ पारंपरिक लिबास में शामिल थे.

मौके पर एडीएमओ जिला भू-अर्जन पदाधिकारी लियाकत अल जिला पंचायती राज पदाधिकारी रवींद्र सिंह, करारोपण पदाधिकारी अभिषेक आनंद, चंदवारा बीडीओ प्रमोद किंडो, रूपा पहाड़िया, अल्मा लकड़ा, अनुरंजन मरांडी, रजनी बाड़ा, अरुण कुमार, रुबेन लकड़ा, दिनेश रविदास, संजीत भारती, अजित वर्णवाल समेत काफी संख्या में आदिवासी समुदाय के लोग मौजूद थे. संचालन उषा कांति लकड़ा ने किया.

आजसू ने मनाया हूल दिवस : इधर, आजसू के केंद्रीय समिति सदस्य अजीत वर्णवाल के आवास पर आजसू ने हूल दिवस मनाया. अध्यक्षता जिलाध्यक्ष राजकुमार मेहता व संचालन जयनगर प्रखंड अध्यक्ष मनोज यादव ने किया. मुख्य अतिथि के रूप में झारखंड आंदोलनकारी अजीत वर्णवाल मौजूद थे.

उन्होंने कहा कि सिदो-कान्हू ने अंग्रेजों के खिलाफ व महाजनी प्रथा के खिलाफ आंदोलन किया व आजादी की लड़ाई में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया. जिलाध्यक्ष ने कहा कि आज ही के दिन सिदो-कान्हू व चांद-भैरव द्वारा अंग्रेजों के विरुद्ध आंदोलन किया गया व हूल दिवस का बिगुल फूंका गया. मौके पर अमित कुमार, प्रखंड उपाध्यक्ष जयनगर नीरज कुमार, शंकर कुमार, रंजीत कुमार, अमन कुमार, हरि शिवम सिंह, सोनल प्रसाद, अरविंद पांडेय, गौरव कुमार, आदर्श वर्णवाल, अंकित कुमार उपस्थित थे.

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