जामताड़ा. अक्षय तृतीया जैसे शुभ अवसर पर, जहां आमतौर पर बाल विवाहों की संख्या में बढ़ोतरी देखी जाती है, वहीं इस वर्ष जामताड़ा जिले में बाल विवाह रोकथाम को लेकर अनुकरणीय कदम उठाया गया है. बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए कार्यरत सामाजिक संगठन बनवासी विकास आश्रम ने जिलेभर में धर्मगुरुओं के सहयोग से व्यापक जन-जागरुकता अभियान चलाया है. इस पहल का उद्देश्य है शून्य बाल विवाह. इस बार 30 अप्रैल को अक्षय तृतीया पर जिले में एक भी बाल विवाह न होने देने का संकल्प लिया गया है. संगठन के सचिव सुरेश कुमार शक्ति ने बताया कि इस अभियान के तहत मंदिरों के पुरोहितों, मस्जिदों के मौलवियों और गिरजाघरों के पादरियों को बाल विवाह निषेध अधिनियम (पीसीएमए ) 2006 और पॉक्सो एक्ट की विस्तृत जानकारी दी गयी है. धर्मगुरुओं ने भी इसे सराहनीय प्रयास मानते हुए बाल विवाह न कराने की शपथ ली है. प्रेस वार्ता में बनवासी विकास आश्रम और जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन (जेआरसी) के प्रतिनिधियों ने बताया कि धार्मिक आयोजनों में पंडित, मौलवी और पादरी की सहमति के बिना विवाह संभव नहीं होता, इसलिए इस अभियान की सफलता के लिए इनकी भागीदारी अत्यंत आवश्यक थी. अधिकांश मंदिरों और मस्जिदों के बाहर सूचना बोर्ड लगाए गए हैं, जिन पर स्पष्ट लिखा गया है “यहां बाल विवाह की अनुमति नहीं है. संगठन ने 2023-24 में जिले में 341 अभिभावकों से लिखित अंडरटेकिंग लेकर बाल विवाह रोके हैं और दो प्राथमिकी दर्ज करवाई गई है. ””व्हेन चिल्ड्रेन हैव चिल्ड्रेन”” जैसी विचारधारा को अपनाकर 2030 तक बाल विवाह मुक्त भारत का लक्ष्य निर्धारित किया गया है. कार्यक्रम समन्वयक उत्तम कुमार ने कहा कि आम लोगों में अभी भी यह जानकारी नहीं है कि बाल विवाह कराना, उसमें सहयोग करना, या ऐसे आयोजन में भाग लेना अपराध की श्रेणी में आता है. यहां तक कि कैटरर, बैंड पार्टी, मैरेज हॉल मालिक, हलवाई और बाराती भी दोषी माने जाते हैं. बताया कि अब पुरोहित, मौलवी और अन्य धर्मगुरु खुलकर समर्थन कर रहे हैं और बाल विवाह रोकने की जिम्मेदारी ले रहे हैं. यह एक सामाजिक बदलाव की मजबूत शुरुआत है. मौके पर जिला समन्वयक पंकज कुमार, कार्यकर्ता राजकिशोर यादव, जीना कुमार, महिला प्रतिनिधि साधना गोराई, प्रीति गोस्वामी आदि मौजूद थीं.
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