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आचार्य हुकुम भारद्वाज महाराज ने सुनाया श्रीराम का जन्मोत्सव प्रसंग

Updated at : 31 Mar 2024 11:02 PM (IST)
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आचार्य हुकुम भारद्वाज महाराज ने सुनाया श्रीराम का जन्मोत्सव प्रसंग

आचार्य हुकुम भारद्वाज महाराज ने सुनाया श्रीराम का जन्मोत्सव प्रसंग

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बिंदापाथर. डुमरीया गांव में आयोजित नौ दिवसीय श्रीराम कथा के तृतीय दिन बृंदावन धाम के कथावाचक आचार्य हुकुम भारद्वाज जी महाराज भगवान श्रीराम का जन्मोत्सव प्रसंग का मधुर वर्णन किया. कथावाचक ने कहा कि अयोध्या के महाराजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति के लिए पुत्रेष्टि यज्ञ आरंभ करने का संकल्प लिया. महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के साथ छुड़वा दिया गया. महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ प्रकांड पंडितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिए आमंत्रित किया. समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ मुनि, मित्र शृंग ऋषि को लेकर यज्ञ मंडप में पधारें. इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया. संपूर्ण वातावरण वेदों की ऋषियों के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने तथा समिधा की सुगंध से महकने लगा. समस्त पंडित, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के साथ यज्ञ की समाप्ति हुई. राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद खीर को अपने महल में ले जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया. प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप तीनों रानियों ने गर्भधारण किया. चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य, मंगल शनि, बृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च स्थानों में विराजमान थे. कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि नील वर्ण, चुंबकीय आकर्षण वाले, अत्यंत तेजोमय, परम कान्तिवान तथा अत्यंत सुंदर था. उस शिशु को देखने वाले देखते रह जाते थे. इसके पश्चात शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ. संपूर्ण राज्य में आनंद मनाया जाने लगा. महाराज के चार पुत्रों के जन्म के उल्लास में गन्धर्व गान करने लगे और अप्सराएं नृत्य करने लगी. देवता अपने विमानों में बैठकर पुष्प वर्षा करने लगे. महाराज ने उन्मुक्त हस्त से राजद्वार पर आए भाट, चारण तथा आशीर्वाद देने वाले ब्राह्मणों और याचकों को दान दक्षिणा दी. पुरस्कार में प्रजा-जनों को धन-धान्य तथा दरबारियों को रत्न, आभूषण प्रदान किए गए. चारों पुत्रों का नामकरण संस्कार महर्षि वशिष्ठ मुनि के द्वारा किया गया तथा उनके नाम श्रीरामचंद्र, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न रखे गए. इस अनुष्ठान के दौरान झांकी प्रस्तुत कर भगवान श्रीराम का आविर्भाव एवं जन्मोत्सव मनाया गया. मानो कुछ क्षण के लिए आयोजन स्थल अयोध्या नगरी बन गया. उपस्थित भक्त-वैष्णव धार्मिक नृत्य के साथ लंबे समय तक झूमते रहे.

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