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Jamshedpur News : हद है ! सरकारी लापरवाही की वजह से एक साल से घर बैठे हैं 52 स्कूली बच्चे

Jamshedpur (Sandeep Savarna) : बिना प्रॉपर होमवर्क के किसी सरकारी योजना को धरातल पर उतारने का खामियाजा कोल्हान के 52 विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है.

बिना होमवर्क के सरकार ने ले ली प्रवेश परीक्षा, रिजल्ट के बाद तैयारी निकली शून्य

चतरा एकलव्य विद्यालय में एडमिशन लेने के बाद 52 बच्चों को वापस घर भेजा

Jamshedpur (Sandeep Savarna) :

बिना प्रॉपर होमवर्क के किसी सरकारी योजना को धरातल पर उतारने का खामियाजा कोल्हान के 52 विद्यार्थियों को भुगतना पड़ रहा है. ये 52 विद्यार्थी पिछले करीब एक साल से किसी स्कूल में पढ़ाई करने की बजाय घर में बैठे हैं. छात्रों के कीमती एक साल किसने बर्बाद की, इसकी जवाबदेही या जिम्मेदारी लेने वाला कोई नहीं है. दरअसल, कोल्हान के आदिवासी जनजातीय बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के लिए सात अप्रैल 2024 को एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा ली गयी थी. इस प्रवेश परीक्षा का रिजल्ट अगस्त 2024 को जारी किया गया. जिसमें कोल्हान के कुल 120 बच्चे सफल हुए. उक्त सभी बच्चों को छठी व सातवीं कक्षा में एडमिशन लेना तय किया गया. लेकिन, कोल्हान के सभी बच्चों को एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय, चतरा में एडमिशन के लिए भेज दिया गया. 16 अगस्त 2024 को बच्चे चतरा पहुंचते हैं. वहां 120 में से 52 बच्चों का एडमिशन लिया जाता है. इसके लिए टीसी भी जमा करवा ली जाती है. अन्य बच्चों को कहा जाता है कि वे पूर्वी सिंहभूम के बहरागोड़ा स्थित एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय में जाकर एडमिशन ले लें. बच्चे चतरा से बहरागोड़ा पहुंचते हैं. लेकिन, यहां बताया जाता है कि अभी आधारभूत संसाधन की कमी है, इस वजह से किसी का एडमिशन नहीं लिया जा सकता है. इसके बाद 68 आदिवासी जनजातीय बच्चे दोबारा उसी स्कूल में पहुंच जाते हैं, जहां वे पहले पढ़ाई कर रहे थे. वहीं उन्होंने दुबारा एडमिशन ले लिया.

एडमिशन लेकर 52 बच्चों को वापस चतरा से भेजा घर

बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हुए चतरा एकलव्य विद्यालय से 52 बच्चों को एडमिशन लेने के बाद वापस घर भेज दिया गया. टीसी समेत अन्य जरूरी कागजात एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय चतरा में जमा भी ले लिया गया, इस वजह से इन 52 बच्चों का एडमिशन किसी भी स्कूल में नहीं हो पाया. एडमिशन की आस में सभी 52 बच्चे स्कूल से दूर घर में बैठे हैं. इसे लेकर उपायुक्त, आयुक्त, शिक्षा मंत्री, विधायक से लेकर कई अन्य जगहों पर पत्राचार किया गया, लेकिन नतीजा सिफर है. बच्चे आज भी घर में बैठे हैं.

क्या कहते हैं जिम्मेदार

पूर्वी सिंहभूम जिले में कुल पांच एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय का संचालन होना है. इसमें गुड़ाबांदा, बहरागोड़ा, पोटका, डुमरिया और धालभूमगढ़ शामिल है. गुड़ाबांदा छोड़ कर अन्य सभी विद्यालयों में इस सत्र से पठन-पाठन शुरू करने की तैयारी है. पिछले सत्र में जिन बच्चों को किसी कारण एडमिशन नहीं मिल पाया था, उन्हें इस सत्र में एकलव्य विद्यालय में शामिल करने की योजना है. 52 बच्चों को लेकर विभागीय स्तर पर जल्द ही कोई निर्णय लिया जायेगा.

शंकराचार्य समद, जिला कल्याण पदाधिकारी

क्यों उत्पन्न हुई यह स्थिति

कोल्हान के जिन 120 बच्चों का रिजल्ट जारी किया गया, उन बच्चों के लिए योजना थी कि उनका एडमिशन बहरागोड़ा में ले लिया जायेगा. तय समय पर बहरागोड़ा में भवन बना दिया गया. थोड़ी देरी हुई, मगर वहां शिक्षकों का पदस्थापन भी कर दिया गया. लेकिन, स्कूल परिचालन के लिए केंद्र सरकार की ओर से फंड ही आवंटित नहीं की गयी. दैनिक खर्च या फिर छात्रावास के खर्च के लिए फंड नहीं मिलने की वजह से बच्चों का स्कूल में एडमिशन नहीं लिया जा सका. बच्चों को राहत देने के लिए चतरा भेजा जरूर गया, लेकिन आधारभूत संसाधन की कमी की वजह से वहां से भी बच्चों को वापस पूर्वी सिंहभूम भेज दिया गया. इस पूरी प्रक्रिया में धरातल पर होमवर्क और समन्वय की काफी कमी दिखी. जिसका सीधा असर बच्चों के भविष्य पर पड़ा.

क्या कहते हैं बच्चे

हम लोग तो पढ़ना चाहते थे. प्रवेश परीक्षा भी पास कर गये, लेकिन अब तो ना अपने पुराने स्कूल में ही जा रहे हैं और ना ही नये स्कूल में. घर में बैठ कर ही समय बीत रहा है.

अभिमन्यु सोरेन, क्लास 6

मैं डॉक्टर बनना चाहती हूं. माता-पिता गरीब हैं. सरकार के स्कूल में अच्छी पढ़ाई के साथ ही खाना-पीना के साथ अन्य सामान भी मुफ्त में मिलने के बारे में सुनी, लेकिन पिछले अप्रैल से घर में ही बैठी हूं. कहीं एडमिशन नहीं हो पाया.

कल्पना महाली, क्लास 6

हमको ये नहीं पता कि हम लोग घर में क्यों बैठे हैं, लेकिन ये पता है कि मुझे किसी स्कूल में नहीं पढ़ने दिया जा रहा है. पता नहीं कब मैं स्कूल जाऊंगा.

शुभोजीत हेंब्रम

10वीं तक पहुंचते-पहुंचते 62.4% जनजातीय बच्चे छोड़ देते हैं स्कूल

2011 की जनगणना के अनुसार भारत में जनजातीय समुदायों की साक्षरता दर 59% थी, जो राष्ट्रीय औसत 73% से कम थी. हालांकि, यह 2001 में दर्ज 47.1% की तुलना में सुधार दर्शाता है. इसके बावजूद, जनजातीय छात्रों के बीच विद्यालय छोड़ने की दर चिंताजनक है. ट्राइबल डेवलपमेंट रिपोर्ट 2022 के अनुसार, 48.2% जनजातीय बच्चे कक्षा 8 तक पहुंचने से पहले ही स्कूल छोड़ देते हैं और यह संख्या कक्षा 10 तक पहुंचते-पहुंचते 62.4% हो जाती है.

क्या है एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय योजना

एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय (इएमआरएस) भारत सरकार की एक पहल है, जिसका उद्देश्य जनजातीय समुदाय के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है. इन विद्यालयों में कक्षा 6 से 12 तक की पढ़ाई होती है और छात्रों को आवास, भोजन, पुस्तकें, यूनिफॉर्म समेत अन्य सुविधाएं नि:शुल्क उपलब्ध करायी जाती है. विद्यालय परिसर में खेलकूद, संगीत, वाद-विवाद जैसी सह-पाठयक्रम गतिविधियों की भी व्यवस्था होती है, जिससे छात्रों का सर्वांगीण विकास हो सके. एकलव्य विद्यालयों का संचालन केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय द्वारा किया जाता है, जिसमें राज्य सरकारें सहयोग करती हैं. इन विद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति, पाठ्यक्रम का निर्धारण और अन्य प्रशासनिक कार्य मंत्रालय की देखरेख में होते हैं.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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