95 साल से हो रही है देवी की पूजा

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बड़कागांव : बड़कागांव का दुर्गा पूजा व दशहरा मेला कर्णपूरा क्षेत्र में प्रसिद्ध है. यहां आजादी के पहले से पूजा व दशहरा का आयोजन होता आ रहा है. पूर्व मुखिया बालकृष्ण महतो के अनुसार सन 1934 में यहां दुर्गा पूजा आरंभ हुआ. उस वक्त खपरैल मंदिर में दुर्गा मां की उपासना की जाती थी. इसी […]

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बड़कागांव : बड़कागांव का दुर्गा पूजा व दशहरा मेला कर्णपूरा क्षेत्र में प्रसिद्ध है. यहां आजादी के पहले से पूजा व दशहरा का आयोजन होता आ रहा है. पूर्व मुखिया बालकृष्ण महतो के अनुसार सन 1934 में यहां दुर्गा पूजा आरंभ हुआ. उस वक्त खपरैल मंदिर में दुर्गा मां की उपासना की जाती थी. इसी मंदिर में अंग्रेज कमिश्नर डाल्टन पूजा करने आते थे. उस वक्त डाल्टन 50 रुपये का चढ़ावा करते थे.

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हैजा से बचने के लिए शुरू हुई मां की आराधना: बालकृष्ण महतो के अनुसार बड़कागांव में 1933-34 में हैजा बीमारी फैली थी. इस बीमारी से हर गांव व टोले में कई लोगों की मौत हो गयी थी. इसी क्रम में बड़कागांव निवासी केवल महतो की भी हैजा से मौत हुई थी. कहावत है कि इसके बाद नेतलाल महतो ने सपने में मां दुर्गे को देखा. दुर्गा मां ने कहा कि दुर्गा पूजा करने से गांव में हैजा की बीमारी खत्म हो जायेगी.
इसकी जानकारी उसने ग्रामीणों को दी. इसी तरह का सपना कुंजल रविदास ने भी देखा.
दोनों का सपना एक जैसा था. इसके बाद 1934 में नेतलाल महतो, किशुन साव, बालेश्वर महतो, कुंजल रविदास, रामटहल रविदास व ग्रामीणों ने यहां पूजा का आयोजन किया. उसके बाद से ही यहां लगातार पूजा का आयोजन होता आ रहा है. पूजा आरंभ करने के साथ ही सभी को हैजा बीमारी से निजात भी मिल गया. पूजा के दौरान यहां हर वर्ष 450 से अधिक बकरों की बलि दी जाती थी. बलि प्रथा 1946 तक थी.
1947 से शुरू हुई वैष्णव पूजा: वर्ष 1947 में सारा देश आजादी का जश्न मना रहा था. उसी वर्ष बड़कागांव के लोगों ने बलि प्रथा खत्म करने का फैसला लिया. यह पहल हजारीबाग के सेठ राम प्रसाद अग्रवाल ने की. तब से आज तक वैष्णव पूजा का यहां आयोजन होता आ रहा है. हालांकि 1966 में यहां बलि प्रथा शुरू होनेवाली थी, लेकिन बचु महतो, जगदीश महतो व पुलिस प्रशासन ने इसे रोका.
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