बड़कागांव में बांस का एक ऐसा पेड़, जो 250 साल से है हरा-भरा, रथयात्रा के दिन विशेष पूजा की परंपरा

Updated at : 14 Jul 2018 11:11 PM (IST)
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बड़कागांव में बांस का एक ऐसा पेड़, जो 250 साल से है हरा-भरा, रथयात्रा के दिन विशेष पूजा की परंपरा

1748 से बांस के पेड़ के नीचे मौर सेराने की है परंपरा रथयात्रा के दिन नए दूल्हा दुल्हन करना पड़ता है पूजा- अर्चना बड़कागांव में ढाई सौ साल के बांस के पेड़ के नीचे मौर सेराने पहुंचे नये दूल्हा -दुल्हन संजय सागर@बड़कागांव बड़कागांव के मध्य पंचायत स्थित बसरिया मोहल्ला में बांस का एक ऐसा पेड़ […]

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1748 से बांस के पेड़ के नीचे मौर सेराने की है परंपरा

रथयात्रा के दिन नए दूल्हा दुल्हन करना पड़ता है पूजा- अर्चना

बड़कागांव में ढाई सौ साल के बांस के पेड़ के नीचे मौर सेराने पहुंचे नये दूल्हा -दुल्हन

संजय सागर@बड़कागांव

बड़कागांव के मध्य पंचायत स्थित बसरिया मोहल्ला में बांस का एक ऐसा पेड़ है, जो ढाई सौ साल से आज भी हरा भरा दिखता है. यहां आसाढ़ के द्वितीय रथयात्रा के दिन नये दूल्हा-दुल्हन का मोर से रहने की परंपरा है. 70 वर्षीय धनेश्वरी देवी, कोयली देवी, इसी मोहल्ले के निवासी मनोज सोनी का कहना है कि यहां कई पूर्वजों यानी ढाई सौ साल से मौर सेराने की परंपरा है. 1748 में यह परंपरा शुरू हुई थी. तब उस करणपुरा क्षेत्र के राजा राम सिंह हुआ करते थे.

बसारी टोला के ग्रामीणों का कहना है कि इस पेड़ में नाग देवता का वास है, यहां कई वर्षों से नाग को देखा जा रहा है लेकिन अब तक इस पेड़ में रहने वाले ना किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया. यहां पर मौर नहीं चढ़ाये जाने पर दूल्हा-दुल्हन के बीच झगड़ा होता रहता है. इसीलिए उनकी लंबी आयु और सफलता के लिए यहां पूजा कराया जाता है.

क्यों है मौर सेराने की परंपरा

बसारी टोला के लोगों का कहना है कि बड़कागांव तथा आसपास के क्षेत्र में किसी भी धर्म के लोगों के यहां जब शादी विवाह होती है तो नये दूल्हा-दुल्हन को मौर सेराना पड़ता है .तभी दूल्हा-दुल्हन की जोड़ी सफल हो सकती है. इसीलिए इस पेड़ के नीचे शादी के मौर को रथ यात्रा मेले के दिन हर वर्ष मोर को विसर्जन किया जाता.

महुदी में भी दोनों समुदाय के दूल्हा-दुल्हन ने मौर को किया विसर्जन

प्रखंड के कांडतरी पंचायत अंतर्गत ग्राम महुदी के जहां एक ओर रामनवमी जुलूस को लेकर तनाव उत्पन्न हो जाता है वही रथयात्रा मेले के दिन दोनों समुदाय के लोग दूल्हा-दुल्हन की जिंदगी के सफलता के लिए एक दुआ मांगते हैं. एक समुदाय के लोगों ने गाजे-बाजे के साथ दूल्हे दुल्हन को मौर सेराया, वहीं दूसरे समुदाय के लोगों ने नवविवाहित जोड़ों के मौर्य एवं माला का विसर्जन महुदी तालाब में किया.

नवविवाहित जोडों में मोहम्मद जुबेर उर्फ सोनू गुलफशा खातून, अफरोज आलम यासमीन परवीन, मोहम्मद सद्दाम हाजरा खातून, मोहम्मद आसिफ साजिया परवीन, मोहीब आलम रुखसार परवीन, भरत ठाकुर मुनीता देवी, होरिल महतो कमली देवी, संजय ठाकुर शिंकी देवी, बीरबल ठाकुर सावित्री देवी, दशरथ राणा पूनम देवी आदि थे. वहीं कार्यक्रम को मनाने में मुख्य रूप से सहयोग करने वालों में सैमुन निशा मेहरुन्निसा निशा कलीमुन निशा मरियम खातून आशिया खातून शकीरन निशा रकीबुन खातून कुलसुम खातून नाजमा खातून जैदून निशा उमेदा खातून मोइना खातून फातिमा खातून रेशमा खातून रजिया खातून नसीहा खातून रशीदा खातून सहित दर्जनों महिलाएं शामिल थे.

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