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गुमला के घाघरा में 75 साल बाद भी सड़क नहीं, सेरेंगदाग माइंस में ताला जड़कर बोले ग्रामीण- ‘सड़क दो, अधिकार दो’

27 Sep, 2025 5:03 pm
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Ghaghra Villagers Locked Serengdag Mines for Road

गांव में ऐसी हैं सड़कें. बारिश में बड़े-बड़े गड्ढे में भर जाता है पानी. फोटो : प्रभात खबर

Villagers Protest in Ghaghra: गुमला जिले में एक इलाका ऐसा भी है, जहां 75 साल बाद भी गांव में पक्की सड़क नहीं बनी. आखिरकार लोगों का आक्रोश फूट पड़ा और उन्होंने बॉक्साइट खनन और परिवहन दोनों रोक दिया. खनन कंपनी में तालाबंदी कर दी. कहा कि जब तक सड़क नहीं बनेगी, तब तक काम नहीं होने देंगे. भारी संख्या में लोग खनन कंपनी के पास धरना दे रहे हैं.

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Villagers Protest in Ghaghra| घाघरा (गुमला), दुर्जय पासवान : गुमला जिले के घाघरा प्रखंड स्थित सेरेंगदाग माइंस इलाके में शुक्रवार सुबह ग्रामीणों का गुस्सा फूट पड़ा. लंबे समय से क्षेत्र की अनदेखी और बदहाली झेल रहे ग्रामीणों, रैयतों और मजदूरों ने एकजुट होकर माइंस ऑफिस में ताला जड़ दिया. वहीं धरना पर बैठ गये. इस तालाबंदी की वजह से पहाड़ पर खड़े सैकड़ों ट्रक फंस गये हैं.

खनन और परिवहन दोनों पूरी तरह से ठप

खनन और परिवहन दोनों पूरी तरह से ठप है. ग्रामीणों ने साफ कहा है कि जब तक इलाके में पक्की सड़क नहीं बन जाती, मूलभूत सुविधाएं उन्हें नहीं मिल जातीं, तब तक यह आंदोलन जारी रहेगा. धरना स्थल पर पूरे दिन गूंजता रहा – ‘सड़क दो, अधिकार दो’, ‘सड़क बने बिना ताला नहीं खुलेगा’ और ‘खनन से पहले विकास दो’.

51 साल से बॉक्साइट का खनन कर रही कंपनी

ग्रामीणों का कहना है कि पिछले 51 साल से कंपनी बॉक्साइट का खनन कर रही है, लेकिन यहां की जनता आज भी बदहाली और उपेक्षा का दंश झेलने को मजबूर है. गर्मियों में धूल से लोग बीमार पड़ते हैं और बरसात में सड़क की हालत तालाब जैसी हो जाती है. स्थिति इतनी गंभीर है कि जीवन की मूलभूत जरूरतें तक पूरी नहीं हो पा रही हैं.

Villagers Protest in Ghaghra: सड़क और सम्मान की जंग

ग्रामीणों ने कहा कि सड़क की जर्जर स्थिति ने जीवन असहनीय बना दिया है. पहाड़ से घाघरा मुख्यालय तक आने के लिए पुरुषों को मजबूरी में हाफ पैंट पहननी पड़ती है. महिलाओं को कपड़ा घुटनों से ऊपर उठाकर चलना पड़ता है. उन्होंने सवाल किया, ‘क्या आदिवासी मान-सम्मान से जीने का अधिकार नहीं रखते?’ ग्रामीणों का कहना है कि घुटनों तक कपड़ा उठाकर चलना अपमानजनक है और अब यह स्थिति बर्दाश्त नहीं होगी. सड़क निर्माण ही उनकी पहली और आखिरी मांग है.

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स्वास्थ्य और शिक्षा का हाल

ग्रामीणों ने बताया कि स्वास्थ्य भवन तो बना है, लेकिन अस्पताल कभी चालू नहीं हुआ. न डॉक्टर हैं और न दवा. बीमार पड़ने की स्थिति में मरीजों को खाट पर लादकर कई किलोमीटर पैदल ले जाना पड़ता है. शिक्षा की स्थिति भी शर्मनाक है. 2 कमरों का स्कूल बना है, लेकिन वहां बच्चों की जगह मवेशी बंधे रहते हैं. पीने का पानी भी बड़ी समस्या है. महिलाएं आज भी पहाड़ी झरनों से सिर पर मटके में पानी ढोने को मजबूर हैं. ग्रामीण बोले, ‘खनन से करोड़ों की कमाई होती है, लेकिन हमें बुनियादी सुविधा तक नहीं मिलती.’

खनन कंपनी के गेट में तालाबंदी करने के बाद वहां धरना-प्रदर्शन के लिए मौजूद ग्रामीण. फोटो : प्रभात खबर

महिलाओं की पीड़ा

महिलाओं ने कहा कि प्रसव के वक्त एंबुलेंस तक उपलब्ध नहीं करायी जाती. कंपनी बहाना बना देती है कि ड्राइवर नहीं है. सड़क खराब बताकर एंबुलेंस वाले घाघरा से आना नहीं चाहते. कई बार प्रसव रास्ते में ही हो गया और महिलाओं की मौत तक हो चुकी है. ऐसी स्थिति में अधिकांश प्रसव घर पर ही पारंपरिक तरीके से करने पड़ते हैं. महिलाओं ने कहा कि यह उनकी मजबूरी है, लेकिन अब वे खामोश नहीं रहेंगी.

कंपनी ने विरोध को दबाने के लिए ली उग्रवादियों की मदद

ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि पूर्व में जब भी उन्होंने आंदोलन किया, कंपनी ने उग्रवादी संगठनों के जरिये उन्हें दबाने का काम किया. कई बार आंदोलनकारियों की पिटाई तक हुई और जमीन नहीं देने वाले ग्रामीणों से जबरन जमीन छीन ली गयी. उन्होंने कहा कि इस बार वे डरने वाले नहीं हैं और आंदोलन को हर हाल में जारी रखेंगे.

सांसद-विधायकों से ग्रामीणों का मोहभंग

ग्रामीणों ने सांसद और विधायकों पर भी आक्रोश जताया. उनका कहना था कि जनप्रतिनिधि केवल चुनाव के समय इलाके में आते हैं, बड़े-बड़े वादे करते हैं और वोट लेकर चले जाते हैं. चुनाव जीतने के बाद वे क्षेत्र को भूल जाते हैं. कई बार ग्रामीणों ने वोट बहिष्कार किया, लेकिन प्रशासन ने हर बार सिर्फ आश्वासन देकर उन्हें टाल दिया. ग्रामीणों का कहना है कि इस बार वे किसी वादे पर भरोसा नहीं करेंगे. सड़क बनेगी और सुविधा मिलेगी, तभी आंदोलन खत्म होगा.

आंदोलन में उपस्थित ग्रामीण

धरना स्थल पर बड़ी संख्या में महिला और पुरुष ग्रामीण मौजूद रहे. प्रमुख रूप से राजेश उरांव, सुखनाथ उरांव, हरिश्चंद्र उरांव, बरती उरांव, लाली उरांव, प्रदीप उरांव, आनंद उरांव, संतोष उरांव, मिंटू उरांव, प्रभु उरांव, संजय उरांव, पवन उरांव, लालदेव उरांव, गंदूर उरांव, संजय उरांव, पवन उरांव, दिले उरांव, अनीता देवी, सुषमा देवी, तेतरी देवी, रजिंता देवी, अंजू देवी, सुनीता देवी, शशि किरण लकड़ा, चांदनी देवी, गुला देवी, धनेश्वर महतो के अलावा सैकड़ों ग्रामीण आंदोलन में शामिल हुए. सभी ने मिलकर कंपनी और प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की.

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Mithilesh Jha

लेखक के बारे में

By Mithilesh Jha

मिथिलेश झा PrabhatKhabar.com में पश्चिम बंगाल राज्य प्रमुख (State Head) के रूप में कार्यरत वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 32 वर्षों से अधिक का व्यापक अनुभव है। उनकी रिपोर्टिंग राजनीति, सामाजिक मुद्दों, जलवायु परिवर्तन, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि और अन्य समसामयिक विषयों पर केंद्रित रही है, जिससे वे क्षेत्रीय पत्रकारिता में एक विश्वसनीय और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित हुए हैं. अनुभव : पश्चिम बंगाल, झारखंड और बिहार में 3 दशक से अधिक काम करने का अनुभव है. वर्तमान भूमिका : प्रभात खबर डिजिटल (prabhatkhabar.com) में पश्चिम बंगाल के स्टेट हेड की भूमिका में हैं. वे डिजिटल न्यूज कवरेज करते हैं. तथ्यात्मक और जनहित से जुड़ी पत्रकारिता को प्राथमिकता देते हैं. वर्तमान में बंगाल चुनाव 2026 पर पूरी तरह से फोकस हैं. भौगोलिक विशेषज्ञता : उनकी रिपोर्टिंग का मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल रहा है, साथ ही उन्होंने झारखंड और छत्तीसगढ़ में भी लंबे समय तक ग्राउंड-लेवल रिपोर्टिंग की है, जो उनकी क्षेत्रीय समझ और अनुभव को दर्शाता है। मुख्य विशेषज्ञता (Core Beats) : उनकी पत्रकारिता निम्नलिखित महत्वपूर्ण और संवेदनशील क्षेत्रों में गहरी विशेषज्ञता को दर्शाती है :- राज्य राजनीति और शासन : झारखंड और पश्चिम बंगाल की राज्य की राजनीति, सरकारी नीतियों, प्रशासनिक निर्णयों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर निरंतर और विश्लेषणात्मक कवरेज. सामाजिक मुद्दे : आम जनता से जुड़े सामाजिक मुद्दों, जनकल्याण और जमीनी समस्याओं पर केंद्रित रिपोर्टिंग. जलवायु परिवर्तन और नवीकरणीय ऊर्जा : पर्यावरणीय चुनौतियों, जलवायु परिवर्तन के प्रभाव और रिन्यूएबल एनर्जी पहलों पर डेटा आधारित और फील्ड रिपोर्टिंग. डाटा स्टोरीज और ग्राउंड रिपोर्टिंग : डेटा आधारित खबरें और जमीनी रिपोर्टिंग उनकी पत्रकारिता की पहचान रही है. विश्वसनीयता का आधार (Credibility Signal) तीन दशकों से अधिक की निरंतर रिपोर्टिंग, विशेष और दीर्घकालिक कवरेज का अनुभव तथा तथ्यपरक पत्रकारिता के प्रति प्रतिबद्धता ने मिथिलेश झा को पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के लिए एक भरोसेमंद और प्रामाणिक पत्रकार के रूप में स्थापित किया है

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