चालीसा पर विशेष : हे मनुष्य याद कर तू मिट्टी है और मिट्टी में मिल जायेगा
Updated at : 01 Mar 2026 4:45 PM (IST)
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गुमला धर्मप्रांत के फादर सीप्रियन कुल्लू ने कहा है कि ईसाइयों का चालीसा आरंभ हो चुका है.
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: चालीसा आरंभ हो चुका है. 40 दिनों का चालीसा काल चलेगा.
प्रतिनिधि, गुमला गुमला धर्मप्रांत के फादर सीप्रियन कुल्लू ने कहा है कि ईसाइयों का चालीसा आरंभ हो चुका है. 40 दिनों का चालीसा काल 18 फ़रवरी राखबुध (बुधवार दिन माथे पर राख मलन) से पांच अप्रैल 2026 तक है. इस अवसर पर अनेक धार्मिक चिंतन एवं धार्मिक अनुष्ठान संपन्न होंगे. हम चालीसा के इस अवसर पर चालीस चिंतन प्रस्तुत कर रहे हैं. याद रहे हर चालीसा के तीन होते हैं. पहला : अनिश्चय शुरुआत, दूसरा : दुखद अनुभव, तीसरा : सुखद समापन. जैसे सिनेमा दो प्रकार के होते हैं. ट्रैजेडी जिसका अंत दुख से होता है और कॉमेडी जिसका अंत सुख से होता है. जिस चालीसा की बात हम कर रहे हैं. ये सारे कॉमेडी की तरह है. शुरुआत दुख से होता है. परंतु अंत सुख से होता है. आइये एक एक चालीसा पर चिंतन करें. पहला चिंतन : ईसाई धर्म में नंबर 40 का विशेष महत्व है. ईसाई धर्म में कुछ नंबर का वैज्ञानिक नहीं धार्मिक महत्व है. जैसे नंबर 3, 7, 12 और 40 है. नंबर तीन का महत्व : एक ईश्वर है. एक ईश्वर में तीन जन हैं. सबका सृजनहार पिता ईश्वर हैं. जिसमें तीन जन हैं. पिता ईश्वर, पुत्र ईश्वर और पवित्र आत्मा ईश्वर. याद रहे एक मात्र ईश्वर लेकिन एक में तीन जन. दूसरा जन मानव बन धरती में आया. मानव मुक्ति के लिये जिसे यीशु मसीह कहते हैं. जिस तरह नबी योनस मछली के पेट तीन दिन था. मानव पुत्र (यीशु खुद) भी तीन दिन धरती के पेट (कब्र) में रहेंगे. उदाहरण यीशु तीन घंटा क्रूस पर टंगे रहने के बाद प्राण त्याग दिये. यीशु मरने के बाद तीन दिनों तक कब्र में रहे और तीसरे दिन जी उठे. नंबर सात का महत्व : ईश्वर ने सृष्टि की रचना सात दिन में पूरी की. नंबर 12 का महत्व : इस्राएल/ याकूब के 12 पुत्र थे. यीशु ने 12 चेलों की नियुक्ति की. नंबर 40 का महत्व : नबी नूह के काल में 40 दिनों का जलप्रलय हुआ था. जलप्रलय के बाद ईश्वर ने पुरानी सृष्टि को नष्ट कर नयी सृष्टि की रचना की. इस्राएली (यहूदी जाति) मिश्र की ग़ुलामी से निकलने के बाद 40 साल यात्रा करते कनान प्रतिज्ञात देश, अपना स्वतंत्र देश, दूध मधु की नदी बहने वाला धनी देश (आज का इस्राएल) पहुंचे. नबी एलियन 40 दिन मरुभूमि में प्रार्थना की. नबी मूसा 40 दिन सिनई पहाड़ में प्रार्थना में बिताये. यीशु 40 दिन मरुभूमि में उपवास और प्रार्थना किये. यीशु जी उठने के बाद 40 दिनों तक दर्शन देकर स्वर्ग सिधारे. दबी इसी पृष्टभूमि को मद्देनज़र आज भी 40 दिन का चालीसा काल स्पेशल प्रार्थना व तपस्या का काल रखा जाता है. ईस्टर पर्व (ईसा के मृतकों में से जी उठने का पर्व) की तैयारी के रूप में यह चालीसा का पुण्य काल माना जाता है जो हर बरस मनाया जाता है. दूसरा चिंतन : चालीसा का आरंभ माथे पर राख मलन से किया जाता है. इस विधि को संपन्न करते समय पुरोहित कहता है ऐ मनुष्य याद कर तू मिट्टी है और मिट्टी में मिल जायेगा राख किसी चीज़ का असली रूप नहीं है. यह परिवर्तित रूप है. वह कोई जीवित चीज होता है. जैसे इंसान, जानवर, फल-फूल आदि का परिवर्तित रूप है. मरने के बाद सब राख/मिट्टी में परिवर्तित हो जाते हैं. राख/मिट्टी सबको बराबर कर देता है. काला-गेारा, सुंदरी या असुंदरी, धनी-गरीब, बच्चा-बूढ़ा, ऊंच-नीच सब एक बन जाते हैं. पहचान भी खो देते हैं. सब राख बन जाते हैं. धनी का राख और गरीब का राख एक जैसा दिखता है. सिर्फ शिक्षा ज़िंदा रहता है. फिर क्यों इतना भेदभाव करें. आख़िर तो मिट्टी/राख में मिलना है. ऐ मनुष्य याद कर तू मिट्टी है और मिट्टी में मिल जायेगा. नबी ईसा मसीह मिट्टी में नहीं मिले. वह मरने के बाद जी उठे. मनुष्य मरेगा मिट्टी में दफ़नाया जायेगा या जलाकर राख बना दिया जायेगा. लेकिन जैसे किसी बीज को मिट्टी में रखा जाता है तो उसमें नया पैाधा उगता है. इसी तरह इंसान एक दिन मिट्टी में मिलने, राख बनने के बावजूद ईसा की तरह जी उठेगा. चूंकि सृष्टिकर्ता ईश्वर की यही योजना है. ईश्वर के पास स्वर्ग जाने के पहले इंसान को अपने पापों के लिये शुद्धीकरण से (मृत्यु के रास्ते से/मिट्टी-राख में मिलने के रास्ते से गुजरना होगा. (जारी…)प्रभात खबर डिजिटल टॉप स्टोरी
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