विलुप्त होती असुरी भाषा को बचाने की पहल, गुमला में होगा सर्वे
Published by : Priya Gupta Updated At : 17 May 2026 2:05 PM
सुकन्या असुर को सम्मानित करते सांसद सुखदेव भगत
Gumla News: गुमला में असुरी सहित कोरवा, बृजिया और बिरहोर जनजातियों की विलुप्त होती भाषाओं को बचाने के लिए अभियान शुरू होगा. इसके संरक्षण के लिए सर्वे और लिपिबद्ध करने की योजना बनाई गई है.
गुमला से दुर्जय पासवान की रिपोर्ट
Gumla News: असुरी भाषा सहित झारखंड की अन्य आदिम जनजातियों की भाषाएं जैसे कोरवा, बृजिया और बिरहोर तेजी से विलुप्त होने के कगार पर हैं. इन सभी आदिम जनजातियों की भाषा को बचाने के लिए यूएस के एक एनजीओ और डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि रांची काम करेगी. असुरी सहित सभी आदिम जनजातियों की भाषा को बचाने के लिए गुमला में सर्वे किया जाएगा. असुरी भाषा को बचाने के उददेश्य से ही डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि रांची में एक कार्यक्रम हुआ था. जिसमें गुमला जिले के बिशुनपुर प्रखंड स्थित पोलपोल पाट गांव के विमलचंद्र असुर की बेटी 12 वर्षीय बेटी सुकन्या असुर ने असुरी भाषा में अपनी बातों को रखते हुए सभी को मंत्र मुग्ध कर दिया था. डॉ अभय सागर मिंज की पहल से सुकन्या असुर विश्वविद्यालय के समारोह में भाग ली थी और सुकन्या को मंच से बोलने का अवसर मिला था. बता दें कि झारखंड राज्य के गुमला, लोहरदगा, सिमडेगा, लातेहार और छत्तीसगढ़ राज्य के जशपुर जिला के जंगल और पहाड़ों में आदिम जनजाति निवास करते हैं. इसमें 80 प्रतिशत से ज्यादा असुर अब हिंदी, सदरी या कुड़ुख बोलते हैं. घर में भी बच्चे असुरी नहीं सीख रहे. 15 साल की उम्र में असुरी भाषा बोलने वालों की संख्या घटते जा रही है. इसलिए असुर के अलावा कोरवा, बृजिया और बिरहोर जनजातियों की भाषा को बचाने के लिए एक मुहिम शुरू होगी. यह मुहिम गुमला से शुरू किया जाएगा.
विमलचंद्र असुर ने कहा : असुरी भाषा विलुप्त हो रही है
असुर जनजाति के नेता विमलचंद्र असुर ने कहा है कि आदिम जनजातियों की भाषा अब तक लिपिबद्ध नहीं हुई है. जिस कारण असुरी भाषा विलुप्त होते जा रहा है. डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी विवि रांची में एक समारोह कर असुरी भाषा को कैसे जीवित रखा जाए. इसके लिए एक पहल हुई है. अब गांव-गांव में जाकर आदिम जनजातियों की विलुप्त हो रही भाषा को संरक्षित करने की पहल होगी. रांची में जैसा मेरी बात हुई है. विवि की अलग-अलग टीम बनेगी जो गुमला के पहाड़ व जंगलों में रहने वाले आदिम जनजातियों के गांवों का सर्वे कर वहां बोली जाने वाली भाषाओं की जानकारी लेते हुए इसे लिपिबद्ध करने का काम किया जायेगा. इसमें यूएस की एक एनजीओ भी मदद करेगी.
स्कूलों में आदिम जनजातियों की भाषा की पढ़ाई हो
विमलचंद्र असुर ने कहा है कि गुमला जिले के जंगल और पहाड़ों में जो स्कूल हैं. जिसके नजदीक में असुर, कोरवा, बृजिया व बिरहोर जनजाति के लोग रहते हैं. उन स्कूलों में एक जनजाति टीचर हो जो विलुप्त हो रही भाषाओं में बच्चों को पढ़ा सके. इससे जनजातियों की भाषा को बचाई जा सकेगी. अगर वर्ग एक से पांच तक की कक्षा में जनजातियों की भाषा को बचाने की पहल अभी नहीं हुई तो आने वाले कुछ वर्षो में जनजातियों की भाषा खत्म हो जाएगी. अभी मिलावटी भाषा का प्रचलन बढ़ गया है. जिसे रोकना जरूरी है. विमल ने बताया कि कुछ स्कूलों में असुर, कोरवा, बृजिया जनजाति के टीचर हैं जो अपने स्तर से भाषाओं को बचाने में लगे हुए हैं.
विलुप्त होने के कारण
डॉ श्याम प्रसाद मुखर्जी विवि के प्रोफेसर डॉ अभय सागर मिंज ने कहा है कि असुरी भाषा की अपनी कोई लिपि नहीं बनी. मौखिक परंपरा से ही चलती आ रही है. बिना लिपि के किताब, अखबार, स्कूल कुछ नहीं बन पाया. आदिवासी होने के साथ असुर होना और मुश्किल है. लोग पहचान छिपाकर मुख्यधारा में घुलने की कोशिश करते हैं. आदिम जनजातियों की भाषा को बचाने की पहल होने वाली है. बहुत जल्द गुमला से असुरी भाषा को संरक्षित करने का अभियान शुरू होगा. ऐसे गुमला के कुछ असुर शिक्षक खुद से बच्चों को असुरी शब्द सिखाते हैं.
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प्रिया गुप्ता डिजिटल मीडिया में कंटेंट राइटर हैं और वर्तमान में प्रभात खबर में कार्यरत हैं. वह पिछले एक साल से कंटेंट राइटिंग के क्षेत्र में काम कर रही हैं. इससे पहले वह नेशनल प्रिंटर और लोकल चैनलों में काम कर चुकी हैं. अभी वह झारखंड की खबरों पर काम करती हैं और SEO के अनुसार कंटेंट लिखती हैं. प्रिया आसान और साफ भाषा में खबरों को पाठकों तक पहुंचाने में विश्वास रखती हैं. वह ट्रेंडिंग खबरों, झारखंड से जुड़े मुद्दों और लोगों से जुड़ी खबरों पर फोकस करती हैं. उनकी कोशिश रहती है कि पाठकों को सही और भरोसेमंद जानकारी सरल शब्दों में मिले.
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