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महाशिवरात्रि पर शिवमय होगा गुमला

Updated at : 14 Feb 2026 10:33 PM (IST)
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महाशिवरात्रि पर शिवमय होगा गुमला

जिले भर के मंदिरों में की गयी हैं तैयारियां, प्राचीन शिवालयों में उमड़ेगी भक्तों की भीड़

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गुमला. गुमला जिले में चारों ओर शिवमंदिर व शिवलिंग विराजमान हैं. जिले के किसी भी प्रखंड, पंचायत या गांव में पहुंच जायें, वहां भगवान शिव का मंदिर अवश्य मिल जायेगा. यहां कई प्राचीन शिवालय व शिवलिंग भी मौजूद हैं, जिनका इतिहास रामायण व महाभारत काल से जुड़ा माना जाता है. सातवीं और आठवीं शताब्दी के भी मंदिर व शिवलिंग यहां विद्यमान हैं. जिले के अधिकांश लोग, जो जंगलों और पहाड़ों में निवास करते हैं, स्वयं को भगवान शिव का परम भक्त मानते हैं. यही कारण है कि महाशिवरात्रि पर यहां विशेष उत्साह देखने को मिलता है. 15 फरवरी को महाशिवरात्रि पर सभी शिवालयों में पूजा-अर्चना की तैयारी पूरी कर ली गयी हैं. मंदिरों को आकर्षक ढंग से सजाया गया है और हर जगह भक्तों की भीड़ उमड़ने की संभावना है. गुमला के प्रमुख शिव स्थलों में टांगीनाथ धाम, देवाकीधाम, बुढ़वा महादेव मंदिर करमटोली, वासुदेव कोना, देवगांव गुफा, पहाड़गांव और सेरका शिवलिंग प्रमुख हैं.

देवाकीधाम : श्रीकृष्ण की माता देवकी के नाम पर पड़ा नाम

घाघरा प्रखंड से तीन किमी दूर केराझारिया नदी के तट पर स्थित देवाकीधाम बाबा मंदिर आस्था का प्रमुख केंद्र है. जनश्रुति के अनुसार महाभारत काल में पांडवों के अज्ञातवास के दौरान भगवान श्रीकृष्ण ने पांच शिवलिंगों की स्थापना की थी, जिनमें से एक शिवलिंग यहां स्थित है. कहा जाता है कि अज्ञातवास की समाप्ति के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने यहीं शंखनाद किया था. इस कारण इस स्थल का नाम उनकी माता देवकी के नाम पर देवाकीधाम पड़ा.

देवगांव : पहाड़ की गुफा में विराजते हैं भगवान शिव

पालकोट स्थित देवगांव अपनी प्राचीन गुफा मंदिर के लिए प्रसिद्ध है. गुमला-सिमडेगा मार्ग पर स्थित होने के कारण यहां झारखंड के साथ-साथ बिहार, ओड़िशा, छत्तीसगढ़ और बंगाल से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं. सावन माह में यहां विशेष भीड़ उमड़ती है. ओड़िशा से बड़ी संख्या में श्रद्धालु जलाभिषेक के लिए आते हैं. यहां बाबा बूढ़ा महादेव मंदिर समेत कई प्राचीन धार्मिक स्थल मौजूद हैं.

टांगीनाथ धाम : प्राचीन धरोहरों में झलकता देवकाल

डुमरी प्रखंड स्थित टांगीनाथ धाम ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है. यहां की नक्काशी और कलाकृतियां प्राचीन देवकाल की कहानी बयां करती हैं. यहां सैकड़ों की संख्या में शिवलिंग स्थापित हैं. माना जाता है कि यह स्थल सातवीं से नौवीं शताब्दी के इतिहास को संजोए हुए है. मंदिर परिसर में स्थित त्रिशूल का अग्रभाग जमीन के ऊपर है और उस पर कभी जंग नहीं लगने की मान्यता प्रचलित है.

वासुदेव कोना : आस्था और इतिहास का संगम

रायडीह प्रखंड स्थित वासुदेव कोना एक प्राचीन मंदिर है, जिससे अंग्रेजी हुकूमत के समय की लड़ाई का इतिहास भी जुड़ा बताया जाता है. यहां स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ-साथ छत्तीसगढ़ और ओड़िशा से भी भक्त पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गयी मुराद अवश्य पूरी होती है.

सेरका शिवलिंग : साल में दो बार बदलता है रंग

बिशुनपुर मुख्यालय से सटे सेरका गांव का अति प्राचीन शिवालय आस्था का विशेष केंद्र है. यहां नागेश्वर नाथ और दुधेश्वर नाथ नामक दो शिवलिंग स्थापित हैं. इनकी विशेषता यह है कि दोनों शिवलिंग वर्ष में दो बार अपना रंग बदलते हैं. कभी लाल तो कभी सफेद. इस अद्भुत परिवर्तन के कारण श्रद्धालुओं की अटूट आस्था इस मंदिर से जुड़ी हुई हैं.

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