उग्रवाद से नाता तोड़ सुफल ने पकड़ी लोकतंत्र की राह

Published at :31 Jul 2016 5:08 AM (IST)
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उग्रवाद से नाता तोड़ सुफल ने पकड़ी लोकतंत्र की राह

सुरेश साहू गुमला के सिसई प्रखंड के चापी गांव में कभी भाकपा माओवादियों का साम्राज्य था. लोग हर दिन नयी जिंदगी जीते थे. पुलिस भी गांव में जाने से कतराती थी. इसी गांव के सुफल उरांव ने माओवादी बन कर इस क्षेत्र का बागडोर संभाली थी. क्षेत्र में वह दहशत का पर्याय बन गया था. […]

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सुरेश साहू

गुमला के सिसई प्रखंड के चापी गांव में कभी भाकपा माओवादियों का साम्राज्य था. लोग हर दिन नयी जिंदगी जीते थे. पुलिस भी गांव में जाने से कतराती थी. इसी गांव के सुफल उरांव ने माओवादी बन कर इस क्षेत्र का बागडोर संभाली थी. क्षेत्र में वह दहशत का पर्याय बन गया था. समय के साथ सुफल भी बदल गया. आज उसकी अलग पहचान है. मुख्यधारा से जुड़ चुका है. लरंगो पंचायत का मुखिया है. मुखिया बन कर वह क्षेत्र के विकास के लिए काम कर रहा है.

मुख्यधारा से भटके युवकों को भी सही राह दिखा रहा है. सुफल उरांव नयी पीढ़ी को संस्कारवान और शिक्षित देखना चाहता है. वह चाहता है कि गांव के युवा शिक्षा को हथियार बना कर विकास में सहभागी बनें. समाज व देश के प्रति युवा अपना दायित्व निभायें. सुफल उरांव अब लोगों को यह बता रहा है कि गलत राह अपना कर आज तक किसी का भला नहीं हुआ. इसलिए वह मुख्यधारा में लौटा.

ऐसे माओवादी बना था सुफल

सिसई प्रखंड अंतर्गत लरंगो पंचायत के चांपी गांव में 1997 में माओवादियों का प्रवेश हुआ. उस समय चांपी माओवादियों का सेफ जोन था. माओवादियों की नीति व सिद्धांत से प्रभावित होकर सुफल माओवादी में शामिल हो गया. ठेकेदारी, जमींदारी प्रथा व पुलिस के खिलाफ वह हथियार उठा लिया. वह सात वर्षों तक संगठन में रहा. वर्ष 2004 में पुलिस के हाथों वह पकड़ा गया. दो वर्षों तक जेल में रहा. वर्ष 2006 में जब जेल से निकला, तो उसकी सोच बदल गयी. वह मुख्यधारा से जुड़ गया.

इस प्रकार मुख्यधारा से जुड़ा

जंगलों में रह कर सुफल को मालूम हो गया कि यहां से जनकल्याण का काम नहीं हो सकता. सो उसने राजनीित में आने की सोची. वर्ष 2008 में झारखंड पार्टी के एनोस एक्का, अशोक भगत के संपर्क में आया और झापा में शामिल हो गया. सुफल के नेतृत्व में सिसई ब्लॉक मैदान में विशाल नगाड़ा पिटावन सम्मेलन हुआ. वर्ष 2009 विधानसभा चुनाव में सिसई से झापा के टिकट पर चुनाव लड़ा. चुनाव हारने के बावजूद जनता की सेवा करता रहा.

वर्ष 2010 में जनता की सेवा का फल मिला. उसकी पत्नी पंचायत चुनाव लड़ी और मुखिया बनी. पत्नी के साथ पांच वर्ष तक सामाजिक कार्यों में हिस्सा लिया. वर्ष 2015 में खुद लरंगो पंचायत से चुनाव लड़ा और बड़े अंतर से मुखिया निर्वाचित हुआ.

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