गोड्डा बैल विवाद हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट से 4 सजायाफ्ताओं को बड़ी राहत, हाईकोर्ट के फैसले को बदला

Updated at : 11 Apr 2026 7:50 PM (IST)
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Godda Murder Case

सुप्रीम कोर्ट

Godda Murder Case: गोड्डा में बैल द्वारा भूसा खाने के विवाद में हुई हत्या के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने दोषियों को बड़ी राहत दी है. 2009 की इस घटना में निचली अदालत ने उम्रकैद और हाईकोर्ट ने 5 साल की सजा सुनाई थी, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने इसे 'भुगती गई अवधि' तक कम कर दिया है. पढ़ें सर्वोच्च अदालत ने क्यों सुनाया यह फैसला?

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Godda Murder Case, गोड्डा (राणा प्रताप की रिपोर्ट): सुप्रीम कोर्ट ने गोड्डा जिले के साल 2009 के हत्याकांड में चार दोषियों को बड़ी राहत देते हुए उनकी सजा की अवधि को कम कर दिया है. जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने कपिलदेव मंडल व अन्य द्वारा दायर विशेष अनुमति याचिका (SLP) पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया. पीठ ने अपने फैसले में कहा कि चूंकि घटना 17 साल पुरानी है और दोषी पहले ही लगभग दो वर्ष की सजा काट चुके हैं, इसलिए न्याय के हित में इसे पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित करना उचित होगा.

बैल भगाने पर हुआ था विवाद

यह मामला 16 अप्रैल 2009 का है, जब एक युवक अपने घर पर मुरही (लाई) बना रहा था. इसी दौरान आरोपियों में से एक का बैल वहां आकर भूसा खाने लगा. युवक द्वारा बैल को भगाए जाने पर विवाद शुरू हो गया. इस बहस के दौरान दिलीप मंडल ने युवक के सिर पर लाठी से वार कर दिया, जिससे उसकी मौत हो गई. गोड्डा की निचली अदालत ने इस मामले में चार आरोपियों को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी.

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हाईकोर्ट ने बदला था फैसला, अब सुप्रीम कोर्ट की मुहर

आरोपियों ने निचली अदालत के फैसले को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. हाईकोर्ट ने इसे ‘इरादतन हत्या’ के बजाय ‘गैर-इरादतन हत्या’ का मामला माना और उम्रकैद को बदलकर पांच साल के कठोर कारावास में तब्दील कर दिया था. इसके खिलाफ दोषियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया. सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पाया कि अपीलकर्ता मुकदमे और हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान अधिकांश समय जमानत पर रहे और हाईकोर्ट का आदेश आने के बाद ही उन्हें हिरासत में लिया गया.

सजा को भुगती गई अवधि तक घटाया

खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए इन सभी को आईपीसी की धारा 304 भाग II के तहत दंडनीय अपराध के लिए दोषी माना जाता है. अदालत ने कहा, “औसतन प्रत्येक अपीलकर्ता ने लगभग दो वर्ष की सजा भुगती है. घटना की उत्पत्ति और परिस्थितियों को देखते हुए हम सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक कम करते हैं.” इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट ने इन अपीलों को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए मामले को निष्पादित कर दिया.

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Sameer Oraon

लेखक के बारे में

By Sameer Oraon

इंटरनेशनल स्कूल ऑफ बिजनेस एंड मीडिया से बीबीए मीडिया में ग्रेजुएट होने के बाद साल 2019 में भारतीय जनसंचार संस्थान दिल्ली से हिंदी पत्रकारिता में पीजी डिप्लोमा किया. 5 साल से अधिक समय से प्रभात खबर में डिजिटल पत्रकार के रूप में कार्यरत हूं. इससे पहले डेली हंट में बतौर प्रूफ रीडर एसोसिएट के रूप में काम किया. झारखंड के सभी समसामयिक मुद्दे खासकर राजनीति, लाइफ स्टाइल, हेल्थ से जुड़े विषयों पर लिखने और पढ़ने में गहरी रुचि है. तीन साल से अधिक समय से झारखंड डेस्क पर काम कर रहा हूं. फिर लंबे समय तक लाइफ स्टाइल के क्षेत्र में भी काम किया हूं. इसके अलावा स्पोर्ट्स में भी गहरी रुचि है.

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