बसंतराय तालाब का सौंदर्यीकरण और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना प्राथमिक लक्ष्य : मंत्री

Published by :SANJEET KUMAR
Published at :14 Apr 2026 10:38 PM (IST)
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बसंतराय तालाब का सौंदर्यीकरण और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना प्राथमिक लक्ष्य : मंत्री

बसंतराय तालाब में सतुआनी पर्व पर राजकीय मेला धूमधाम से शुरू

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बसंतराय प्रखंड मुख्यालय स्थित 24 बीघे के तालाब के किनारे हर वर्ष की तरह सतुआनी पर्व पर लगने वाला सप्ताहिक राजकीय मेला राज्य के श्रम नियोजन मंत्री संजय प्रसाद यादव द्वारा दीप जलाकर और फीता काटकर उद्घाटन किया गया. इस अवसर पर एसपी मुकेश कुमार, डीडीसी दीपक कुमार दुबे, एसी प्रेमलता मुर्मू, और एसडीओ वैद्यनाथ उरांव भी उपस्थित थे. मंत्री के साथ तालाब के समीप बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर श्रद्धांजलि अर्पित की गयी. मंत्री संजय प्रसाद यादव ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि बसंतराय तालाब का सौंदर्यीकरण और इसे पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करना प्राथमिक लक्ष्य है. उन्होंने कहा कि यह मेला केवल एक मेला नहीं, बल्कि क्षेत्र के सभी समुदायों के लिए सद्भाव और आपसी प्रेम का प्रतीक है. मेला लगभग पांच सौ वर्ष पुराना है और इस तालाब में डुबकी लगाकर लोग पहले चर्म रोग जैसी बीमारियों से मुक्ति पाते थे.

हजारों श्रद्धालुओं ने तालाब में लगाई आस्था की डुबकी

मेला प्रारंभ होते ही तालाब में हजारों श्रद्धालुओं ने आस्था की डुबकी लगायी. सफा होड़ समुदाय के करीब दस हजार लोगों ने डुबकी लेकर अपने धर्म के प्रति निष्ठा दिखायी. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तालाब में स्नान कर सूर्य देवता की पूजा-अर्चना की जाती है. आसपास के कई प्रदेशों के लोग भी मेले में शामिल होते हैं.

विराट मेला और मनोरंजन के आकर्षण

दस दिनों तक चलने वाले मेले में विभिन्न प्रकार के झूले, नौटंकी और अन्य मनोरंजन कार्यक्रम आयोजित किये गये. भारी भीड़ को देखते हुए जिला प्रशासन ने सुरक्षा व्यवस्था पुख्ता की और सीसीटीवी कैमरे भी लगाये गये हैं. हालांकि, प्रशासन की बड़ी कमी के रूप में श्रद्धालुओं के लिए शुद्ध पेयजल की व्यवस्था नहीं की गयी, जिससे लोग महंगे बोतलबंद पानी पर निर्भर रहे.

पुरानी परंपरा और धार्मिक महत्व

मेले की परंपरा कई सदियों पुरानी है. बैसाखी या सतुआनी के मौके पर श्रद्धालु तालाब में स्नान कर बकरा, बकरी और कबूतर आदि विसर्जित करते हैं. स्नान और पूजन के बाद लोग दीक्षा लेते हैं और दिन-रात अनुष्ठान चलता रहता है. सफाहोड़ समुदाय के लोग सभी एक स्थान पर स्वयं तैयार शाकाहारी भोजन करते हैं, जिसमें प्याज और लहसुन वर्जित रहता है.

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