Giridih News :आइडी न्यूक्लिक एसिड टेस्ट की गिरिडीह में व्यवस्था नहीं, रांची भेजा जाता है ब्लड सैंपल

Published by : PRADEEP KUMAR Updated At : 17 May 2026 10:16 PM

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Giridih News :रक्तदान में भारी गिरावट के साथ-साथ ब्लड सैंपल टेस्ट की प्रक्रिया लंबी होने से जरूरतमंदों को समय पर ब्लड नहीं मिल पाता है, जिससे ऐसे लोग परेशान हैं. एक ओर जहां थैलेसीमिया मरीजों की परेशानी बढ़ी हुई है, वहीं दूसरी ओर किसी घटना-दुर्घटना में गंभीर रूप से घायल होने वाले लोगों को भी अचानक ब्लड की जरूरत पड़ने पर उन्हें नहीं मिल पाता है.

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जिले में विभिन्न सरकारी और गैर सरकारी संगठनों के द्वारा बड़े पैमाने पर रक्तदान शिविर का आयोजन किया जाता था, लेकिन पिछले एक-दो वर्षों में इसमें कमी की बात बतायी जा रही है. सबसे ज्यादा परेशानी आइडी न्यूक्लिक एसिड टेस्ट में विलंब होने के कारण उत्पन्न हुई है. चाईबासा में दूषित रक्त चढ़ाने पर हुई मौत के बाद ब्लड टेस्ट की जांच को लेकर जो नयी गाइडलाइन बनाये गये हैं, उसमें आइडी न्यूक्लिक एसिड टेस्ट को अनिवार्य कर दिया गया है.

16 से 18 घंटे लगता है समय

राज्य में इस तरह की टेस्ट की व्यवस्था सिर्फ रांची में है. फलस्वरूप राज्य के अलग-अलग हिस्से से ब्लड सैंपल एकत्रित कर उसे रिम्स लाया जाता है और फिर उसका टेस्ट किया जाता है. गिरिडीह जिला की हम बात करें तो यहां से लगभग हर दिन 11 बजे से एक बजे के बीच ब्लड सेंपल विशेष वाहन से रिम्स भेजा जाता है और फिर जांच होने के बाद टेस्ट रिपोर्ट मेल पर भेज दी जाती है. इस पूरी प्रक्रिया में लगभग 16 से 18 घंटे का समय लगता है.

गिरिडीह में 12000 से 15000 यूनिट प्रति वर्ष ब्लड की है खपत

गिरिडीह जिले की आबादी लगभग 30 लाख है औरलगभग 12 हजार से 15 हजार यूनिट ब्लड की जरूरत प्रतिवर्ष पड़ती है. जबकि, काफी मशक्कत करने के बाद जिले में लगभग दस हजार यूनिट ब्लड ही संग्रह हो पाता है. ऐसे में हाल के दिनों में रक्तदान के प्रति लोगों की दिलचस्पी कम होने से रक्त संग्रह में भारी कमी दर्ज की गयी है. ब्लड बैंक की सूत्रों की मानें तो गिरिडीह जिले में देवघर, जामताड़ा, धनबाद और कोडरमा से भी जरूरतमंद लोगों का आना-जाना लगा रहता है. पड़ोस के जिले से भी थैलेसीमिया मरीज गिरिडीह पहुंचते हैं.

जिले में 170 थैलेसीमिया मरीज, इन्हें हर माह 400 यूनिट ब्लड की जरूरत

गिरिडीह जिले में कुल 170 थैलेसीमिया मरीज हैं. इन्हें हर माह लगभग 400 यूनिट ब्लड देना पड़ता है यानि थैलेसीमिया मरीजों के लिए लगभग पांच हजार यूनिट ब्लड की व्यवस्था प्रत्येक वर्ष संस्थाओं को करना पड़ता है. थैलेसीमिया के कई मरीज ऐसे होते हैं जिनका हिमोग्लोबिन काफी कम होता है और एक-एक मरीज को एक से लेकर पांच यूनिट ब्लड चढ़ाने की आवश्यकता होती है. वर्तमान में थैलेसीमिया मरीज को ब्लड उपलब्ध कराना गिरिडीह ब्लड बैंक के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. इसके लिए ब्लड बैंक से जुड़े लोगों को ज्यादा से ज्यादा ब्लड कैंप लगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है.

रक्तदान कराने वाली संस्था को जरूरत पड़ने पर नहीं मिलता है ब्लड

रक्तदान में आयी भारी गिरावट को लेकर जब विभिन्न संस्थाओं से कारण जानने का प्रयास किया गया तो लोगों ने कई बिंदुओं पर अपनी राय रखी. कई संस्थाओं का कहना था कि वे जागरूक कर लोगों को ब्लड कैंप में बुलाते हैं. लेकिन ऐसे लोगों को जब ब्लड की जरूरत पड़ती है तो उन्हें ब्लड बैंक से ब्लड नहीं मिल पाता है. कई बार तो ब्लड बैंक में ब्लड की कमी के कारण वैसे लोग भी रक्तदान करने के लिए आगे नहीं बढ़ पाते हैं, जब जरूरत पड़ने पर ब्लड एक्सचेंज की व्यवस्था नहीं हो पाती है. कई लोगों ने बताया कि जिन लोगों को आपातकालीन स्थिति में जिस ग्रुप के ब्लड की आवश्यकता होती है, उन्हें डोनर रहने के बाद भी ब्लड नहीं मिलता है. फलस्वरूप डोनर भी ब्लड देने में आनाकानी करते हैं. यह भी बात सामने आयी कि कई संस्थाओं द्वारा ब्लड कैंप लगाकर काफी मात्रा में ब्लड संग्रह कर लिया जाता है और इतनी ज्यादा मात्रा में ब्लड रखने की व्यवस्था बैंक में नहीं होती है. फलस्वरूप लोग दूसरे जिले में ब्लड भेज देते हैं. ऐसे लोगों को सलाह भी दी गयी है कि लोग ब्लड कैंप में ब्लड बैंक की क्षमता के अनुसार ही ब्लड संग्रह करें और शेष लोगों की रक्तदान सूची में वेटिंग के रूप में नाम दर्ज कर लें, ताकि आवश्यकता पड़ने पर ऐसे लोगों से ब्लड के लिए संपर्क किया जा सके. रोटरी गिरिडीह के अध्यक्ष अमित गुप्ता कहते हैं कि हर तीन-चार माह में एक बार कैंप लगाया जाता था. लेकिन अब कुछ दिक्कती हो रही है. जरूरत पड़ने पर उनलोगों को भी ब्लड नहीं मिल पाता है, जिन लोगों ने ब्लड दान में दिया है. फलस्वरूप ऐसे लोगों में रक्तदान को लेकर दिलचस्पी घटी है.

रक्तदान में ले हिस्सा, तीन लोगों की जान बचाने का मिलता है अवसर : रेडक्रॉस

रेडक्रॉस सोसाइटी के चेयरमैन अरविंद कुमार का कहना है कि विभिन्न कारणों से रक्तदान में काफी कमी आयी है. लोगों को रक्तदान के लिए आगे आना चाहिए. ऐसे लोगों को समझना होगा कि रक्तदान महादान है और इस दान में हिस्सा लेने से तीन लोगों की जानें बचायी जा सकती है. दान देने वाले को तीन जानें बचाने के अवसर का लाभ लेना चाहिए. गिरिडीह ब्लड बैंक में आइडी नेट टेस्ट छोड़ सभी तरह के टेस्ट की व्यवस्था है. यहां एलिजा टेस्ट भी होता है और सेपरेशन यूनिट भी लगा हुआ है. आइडी नेट टेस्ट मशीन के लिए पत्राचार किया गया है. उम्मीद है कि शीघ्र ही गिरिडीह को यह मशीन उपलब्ध हो सकेगा.

आबादी का 0.5 प्रतिशत भी नहीं लेता है रक्तदान में हिस्सा : श्रेय क्लब

रक्तदान में सक्रिय रहने वाले श्रेय क्लब के सचिव रमेश यादव का कहना है कि रक्तदान को लेकर जागरूकता की कमी है. इसके अलावे ब्लड लेन-देन की प्रक्रिया में भी कई त्रुटियां है. उन्होंने कहा कि यह काफी दुर्भाग्य की बात है कि 30 लाख की आबादी वाले इस जिले में 15 हजार लोग भी प्रति वर्ष रक्तदान नहीं करते. यानि 0.5 प्रतिशत से भी कम लोग रक्तदान करते हैं. लोगों को अपना नजरिया भी बदलना होगा. जो लोग ब्लड देते हैं, वे मानसिक रूप से स्वीकार करें कि वे दान कर रहे हैं. यह भी दुर्भाग्य की बात है कि रक्तदान करने वाले अधिकांश लोग एक्सचेंज के अवसर का लाभ लेने के लिए रक्तदान करने से पीछे हटते हैं. जिले में 170 थैलेसीमिया मरीज हैं, जिन्हें हर माह 400 यूनिट ब्लड की जरूरत है. वे रक्तदान करने वाले लोगों पर ही निर्भर हैं. फलस्वरूप ऐसे लोगों का जान बचाने के लिए लोगों को आगे आना चाहिए.

(राकेश सिन्हा, गिरिडीह)B

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