गढ़वा के गेंदा फूल से महक रहा बिहार का प्रसिद्ध मां ताराचंडी धाम

43 डिग्री तापमान को मात देकर फूलों की खेती कर किसानों के लिए मिसाल बने रमाशंकर माली
43 डिग्री तापमान को मात देकर फूलों की खेती कर किसानों के लिए मिसाल बने रमाशंकर माली जितेंद्र सिंह, गढ़वा भीषण गर्मी और लगातार बढ़ते तापमान के बीच खेतों में फसल बचाना किसानों के लिए चुनौती बन गया है. गढ़वा जिले के माझिआंव नगर पंचायत क्षेत्र के पृथ्वी चक्र गढ़ौटा गांव के रमाशंकर माली अपने खेतों में मेहनत और लगन से फूलों की खेती कर रहे हैं. 43 डिग्री तापमान में भी उनके खेतों में लहलहाते गेंदा के फूल लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहे हैं. गढ़वा जिला मुख्यालय से करीब 24 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में रमाशंकर माली ने यह साबित कर दिया है कि अगर सोच अलग हो और मेहनत सच्ची हो तो सीमित संसाधनों में भी सफलता हासिल की जा सकती है. पारंपरिक खेती से परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होने के बाद उन्होंने चार साल पहले फूलों की खेती शुरू की. आज यही खेती उनके परिवार की आजीविका का मुख्य आधार बन चुकी है. रमाशंकर माली के खेतों में उगे फूल अब धार्मिक आस्था से भी जुड़े हैं. उनके द्वारा तैयार की गयी गेंदा फूल की मालाएं बिहार के सासाराम स्थित मां ताराचंडी मंदिर में चढ़ाई जाती हैं. रमाशंकर बताते हैं कि हर दो दिन पर उनकी बनायी हुई 400 से 500 लड़ियां सासाराम भेजी जाती हैं. कई बार वाहन की सुविधा नहीं मिलने पर वे खुद मोटरसाइकिल से फूल लेकर सासाराम तक चले जाते हैं. शादी-विवाह के मौसम में भी उनके फूलों और मालाओं की भारी मांग रहती है. आसपास के बाजारों में भी उनके फूलों की अच्छी बिक्री होती है. एक बीघा खेत से बदली जिंदगी रमाशंकर माली बताते हैं कि उनके पास जमीन का केवल छोटा टुकड़ा है. पहले वे पारंपरिक खेती करते थे, लेकिन उससे परिवार का भरण-पोषण सही ढंग से नहीं हो पाता था. इसी परेशानी के बीच उन्होंने फूलों की खेती का निर्णय लिया. शुरुआत में उन्होंने छोटे स्तर पर गेंदा फूल उगाना शुरू किया, लेकिन धीरे-धीरे इसकी मांग बढ़ती गयी. आज वे अपने एक बीघा खेत में बड़े पैमाने पर गेंदा फूल की खेती कर रहे हैं. उनके खेतों से निकलने वाले फूलों की मांग सिर्फ गढ़वा या आसपास तक सीमित नहीं है, बल्कि बिहार तक पहुंच चुकी है. 25 हजार की लागत, दो लाख तक की कमाई रमाशंकर माली ने बताया कि एक बीघा में गेंदा फूल की खेती करने में लगभग 25 हजार रुपये की लागत आती है. इसमें बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी का खर्च शामिल होता है. अच्छी पैदावार होने पर इससे लगभग दो लाख रुपये तक की आमदनी हो जाती है. उन्होंने बताया कि इस खेती में चुनौतियां भी काफी हैं. गर्मी के दिनों में फूलों को बचाना सबसे कठिन काम होता है. तेज धूप में पौधे जल्दी मुरझा जाते हैं, इसलिए हर दो दिन पर सिंचाई करनी पड़ती है. अत्यधिक गर्मी के कारण फूलों का आकार थोड़ा छोटा हो जाता है, लेकिन बाजार में उनकी मांग लगातार बनी रहती है. सरकार से मदद की उम्मीद रमाशंकर माली कहते हैं कि उनके दो पुत्र और एक पुत्री हैं, जिनकी पढ़ाई-लिखाई और पूरे परिवार का खर्च इसी खेती से चलता है. उन्होंने कहा कि यदि सरकार की ओर से आर्थिक सहायता या तकनीकी सहयोग मिले तो वे अपने व्यवसाय को बड़े स्तर पर ले जा सकते हैं. उन्होंने कहा कि सरकार को ऐसे किसानों की मदद करनी चाहिए जो खेती के माध्यम से न सिर्फ अपने परिवार का जीवन चला रहे हैं, बल्कि समाज में नए बदलाव की प्रेरणा भी दे रहे हैं. लेकिन अब तक उन्हें कोई सरकारी सहायता नहीं मिली है. बागवानी मिशन में गढ़वा को शामिल करने की मांग करुआ कला गांव के फूल उत्पादक बृजेश तिवारी लंबे समय से गढ़वा को बागवानी मिशन में शामिल करने की मांग करते रहे हैं. उन्होंने कई बार सरकार और मंत्रियों को ज्ञापन देकर बताया कि यदि जिले में बागवानी को बढ़ावा दिया जाए तो यहां के किसान आर्थिक रूप से मजबूत हो सकते हैं.
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