चाकुलिया : नक्सली घटनाओं और खास कर निर्दोष ग्रामीणों की ताबड़तोड़ हत्या के लिए विख्यात श्यामसुंदरपुर थाना क्षेत्र में जामुआ गांव निवासी सीरियल किलर नक्सली फोगड़ा मुंडा के आत्मसमर्पण से नक्सली राज का अंत हो गया. क्षेत्र की ग्रामीणों ने राहत की सांस ली. पुलिस का सिरदर्द कम हुआ. मगर इसके साथ ही इस थाना क्षेत्र में माफिया राज का आगाज हुआ.
थाना क्षेत्र के बेतना के पास 7 सितंबर को चाकुलिया के रेंजर गोरख राम पर बालू व्यवसायी चामरू सोरेन द्वारा किया गया जान लेवा हमला इस बात का संकेत माना जा रहा है.
एक समय था जब, इस थाना क्षेत्र में नक्सली तबातोड़ हत्या करते थे. लेवी के लिए संवेदकों के कैंप पर हमला कर कर्मियों की हत्या करते थे. मगर पुलिस की सक्रियता के कारण इस युग का अंत हो गया. अब बालू तथा पत्थर माफियाओं द्वारा सरकारी पदाधिकारियों पर जान लेवा हमला करने का दौर शुरू हो गया है. यह थाना क्षेत्र बालू तथा पत्थर के अवैध कारोबार के लिए विख्यात रहा है. गुड़ाबांदा के पहाड़ों से तोड़े गये पत्थर तथा सुवर्णरेखा नदी से बालू का परिवहन इसी थाना क्षेत्र के रास्ते होता है.
क्षेत्र में चल रही तमाम योजनाओं में अवैध पत्थरों तथा अवैध बालू की आपूर्ति होती है. साल के जंगलों में अवैध बालू और पत्थर का भंडारण क्षेत्र के माफिया तत्वों के लिए आम बात हो गयी है. प्रशासन जांच करे तो दर्जनों जगहों पर अवैध रूप से रखे गये बालू का भंडार मिलेगा. विभिन्न योजना स्थलों पर अवैध पत्थरों का भंडार मिलेगा.
माना जा रहा है कि रेंजर गोरख राम पर जान लेवा हमला कर माफिया तत्वों ने प्रशासनिक महकमे में एक संदेश भेजा है कि इस क्षेत्र में इन अवैध धंधों पर अकुंश लगाने की कोशिश करने वाले पदाधिकारियों का यही हश्र होगा. डर से पदाधिकारी इस क्षेत्र में जांच करने नहीं आयें. ताकि माफियाओं का यह अवैध कारोबार चलता रहे. रेंजर गोरख राम पर इस तरह का जानलेवा हमला क्षेत्र की पहली घटना है. इसके पूर्व कई जगहों पर वन कर्मियों द्वारा बकझक होने के मामले प्रकाश में आये थे.
रेंजर गोरख राम पर जान लेवा हमला से उठा सवाल
नक्सली घटनाओं के लिए कुख्यात श्यामसुंदरपुर थाना क्षेत्र में फोगड़ा मुंडा के आत्म समर्पण के साथ ही नक्सली राज खत्म हो चुका है
चाकुलिया के रेंजर गोरख राम पर श्यामसुंदरपुर थाना क्षेत्र में हुए जानलेवा हमला से माफिया युग शुरू होने का संकेत
वन पदाधिकारियों की सुरक्षा पर सवाल
रेंजर गोरख राम हमला ने वन विभाग के निहत्थे पदाधिकारियों की सुरक्षा पर सवाल खड़ा कर गया है. विदित हो कि वन विभाग में वन कर्मियों की कमी है. रेंजर, वनपाल तथा वन रक्षियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं. जबकि वन पदाधिकारियों को अपनी जान जोखिम में डाल कर बीहड़ इलाके के वनों तथा पहाड़ों की रक्षा करनी पड़ती है.
वन विभाग में सुरक्षा के कोई उपाय नहीं हैं. लाठी लेकर वनरक्षी वनों की रक्षा करते हैं. हाल के वर्षों में जंगलों की अवैध कटाई तथा पत्थर के लिए पहाड़ों को ताेड़े जाने में भारी इजाफा हुआ है. प्रशासन जांच करे तो पिछले पांच साल के दौरान गुड़ाबांदा, घाटशिला, मुसाबनी तथा चाकुलिया के कई छोटे पहाड़ गायब गायब हो चुके हैं. अवैध खनन पराकाष्ठा पर है. इस पर रोक लगाने की जिम्मेवारी वन विभाग के निहत्थे पदाधिकारियों पर है.