हूल क्रांति दल का बाबूधन धराया
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :16 Dec 2015 1:53 AM (IST)
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दुमका : हूल झारखंड क्रांति दल नाम से संगठन चलाने वाले एक शख्स को दुमका पुलिस ने धर दबोचा है. इसका नाम बाबूधन मुरमू है, जो मूल रूप से मसलिया के सीतपहाड़ी का रहने वाला है. इन दिनों वह अपने ससुराल टोंगरा थाना क्षेत्र के बलियाजोर स्थित ससुराल में रह रहा था. उस पर किसी […]
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दुमका : हूल झारखंड क्रांति दल नाम से संगठन चलाने वाले एक शख्स को दुमका पुलिस ने धर दबोचा है. इसका नाम बाबूधन मुरमू है, जो मूल रूप से मसलिया के सीतपहाड़ी का रहने वाला है. इन दिनों वह अपने ससुराल टोंगरा थाना क्षेत्र के बलियाजोर स्थित ससुराल में रह रहा था. उस पर किसी एक पक्ष से पैसे लेकर विवादित जमीन पर जबरन दखल दिहानी करने का आरोप है. हाल के दिनों में उसके नेतृत्व में जबरन धानकटनी के भी मामले पुलिस तक पहुंचे थे.
बाबूधन मुरमू के खिलाफ दुमका जिले में सात मामले दर्ज हैं. इनमें से एक मामला 2003 का भी है, जिसमें तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष प्रो स्टीफन मरांडी को मसलिया प्रखंड के कुशबेदिया में तीर-धनुष के साथ घेर लेने तथा उनके एस्कार्ट को बंधक बना लेने की घटना को अंजाम दिया गया था. मामले में तो बाबूधन को तीन साल तक दुमका जेल में भी बिताना पड़ा था.
लूटो-खाओ के रूप में चलता था धंधा
श्री खेरवार ने बताया कि बाबूधन मुरमू के घर से लूटे गये धान बरामद किये गये हैं. पूरा संगठन लूटो-खाओ की योजना पर ही चलता था. हरवे-हथियारों का खौफ दिखाकर विधि व्यवस्था की समस्या भी उत्पन्न की जाती थी.
उन्होंने बताया कि बाबूधन की गिरफ्तारी मसलिया थाना कांड संख्या 117/15 के तहत हुई है. जिसमें 4 नवंबर को दुखियाडीह में जबरन धान काट लेने का मामला दर्ज हुआ था. कुछ सहयोगियों के नाम सामने आये हैं. सत्यापन किया जा रहा है. कुछ नामजद व कुछ गैर प्राथमिक आरोपित भी इसमें शामिल हैं.
संगठन में बेटा श्रवण व पत्नी ठकराइन भी
हूल झारखंड क्रांति दल नाम के इस संगठन में बाबूधन मुरमू ने अपनी पत्नी ठकराइन सोरेन तथा बेटे श्रवण मुरमू को भी शामिल कर रखा था. इसके अलावा उसके जान-परिचित के अन्य 16-17 लोग इस संगठन में हैं.
डीएसपी पीतांबर सिंह खेरवार ने बताया कि ज्यादातर ऐसे विवादित जमीन के मामले में वह हस्तक्षेप करता था, जो पोशपुत्र व दखल से जुड़ा होता था. ऐसे मामलों में किसी एक पक्ष से पैसा लेकर वह जबरन दखल दिलाता था. इस दौरान न तो कागजात देखे जाते थे और न ही यह देखा जाता था कि जिसे दखल दिलवा रहे हैं, उसका हक बनता भी है या नहीं.
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